शंकर जालान
कोलकाता। महानगर और आसपास के इलाकों में वृहस्पतिवार को आसमान साफ होते ही दुर्गा प्रतिमाओं को पंडाल तक पहुंचाने के काम शुरू हो गया। बीते कुछ दिनों से हो रही बारिश के कारण मूर्तिकारों व पंडाल बनाने में व्यस्त कारीगरों को परेशानी हो रही थी। वृहस्पतिवार से मौसम साफ होते ही मूर्तिकारों व पंडाल बनाने वाले कारीगरों ने राहत की सांस ली।
पंडालों के निर्माण में आई तेजी : बुधवार रात से बारिश थमने के बाद वृहस्पतिवार से पूजा पंडालों का निर्माण कार्य तेज हो गया। कारीगर निर्धारित समय पर पंडालों को तैयार करने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। पूजा कमिटियां भी अब जल्द पंडाल निर्माण का काम पूरा करा लेना चाहती है। ध्यान रहे कि बीते कुछ दिनों से हो रही बारिश का पूजा पंडाल के निर्माण पर विपरीत असर पड़ा था।
पूजा कमिटियों के सदस्यों ने बताया कि बारिश के समय पंडाल के निर्माण कार्य को रोकना पड़ा था। बारिश थमने के बाद अब तेजी से काम चल रहा है। आयोजकों के मुताबिक इनदिनों सजावटी सामग्रियों से पंडाल के भीतरी हिस्से की साज-सज्जा की जा रही है। कारीगरों ने बताया कि एक अक्तूबर की सुबह तक पंडाल को पूरी तरह से तैयार कर देना है, क्योंकि इसी दिन शाम से पूजा पंडालों के उद्घाटन का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
पंडालों की ओर चली दुर्गा : उत्तर कोलकाता स्थिथ कुम्हारटोली के मूर्तिकारों का गोला वृहस्पतिवार से खाली होना शुरू हो गया। आज बारिश थमने के बाद प्रतिमाओं को पंडाल की ओर जाने का सिलसिला शुरू हो गया। मूर्तिकारों ने बताया कि शनिवार दोपहर तक लगभग सभी मूर्तियां पंडालों तक पहुंच जाएंग। मालूम हो कि दर्जनों मूर्तिकारों के गोले में बीते चार-पांच महीने से बनाई जा रही देवी दुर्गा की प्रतिमा आज से विभिन्न पंडालों में पहुंचने लगी है। मूर्तिकारों का कहना है कि गोला से तो मूर्तियां पंडालों तक पहुंच गई, लेकिन प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम अभी बाकी है। यह ऐसा काम है जो गोला में नहीं किया जा सकता। इसके अलावा एक चाल और एक प्लेट पर बनी प्रतिमाओं को जोड़ने और अंतिम रूप देने के लिए पंडालों में जाना पड़ता है। इसके अलावा साधारण मूर्तियों के हाथों में अस्त्र-शस्त्र देने के लिए हमें कारीगरों को भेजना पड़ता है। जो कुछ मूर्तियां अभी तक कुम्हारटोली में हैं, वे शनिवार दोपहर तक पंडालों में पहुंच जाएगी। मूर्तिकारों ने बताया कि दो-तीन दिन आराम करने के बाद वे काली प्रतिमा के निर्माण में जुट जाएंगे।
पूजा पंडालों का उद्घाटन : शुक्रवार को कई चर्चित पूजा पंडालों का उद्घाटन होगा। यूथ एसोसिएशन (मोहम्मद अली पार्क) के पूजा पंडाल का उद्घाटन राज्यपाल एमके नारायणन करेंगे। इस मौके पर कई जानेमाने लोग बतौर अतिथि मौजूद रहेंगे। वहीं, पाथुरियाघाट पांचेर पल्ली (पाथुरियाघाट स्ट्रीट), विधाननगर सीके-सीएल ब्लॉक रेसिडेंड एसोसिएशन (साल्टलेक) समेत कई पूजा पंडालों का उद्घाटन होगा। इससे पहले बुधवार रात जोधपुर पार्क 95 पल्ली के पूजा पंडाल का उद्घाटन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया। राममोहन सम्मिलनी के पूजा पंडाल का उद्घाटन उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने किया।
Friday, September 30, 2011
Wednesday, September 28, 2011
पूजा परिक्रमा : उलट कर देखो की थीम पर पाथुरियाघाट की दुर्गापूजा
शंकर जालान
कोलकाता, 29 सितंबर। उलट कर देखो बदल गया कि थीम पर इस बार उत्तर कोलकाता
में पाथुरियाघाट पांचेरपल्ली सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने पूजा आयोजित
करने का मन बनाया है। समिति के सदस्यों का कहना है कि लगभग सभी पूजा
कमिटियां दर्शकों से यह अनुरोध करती है कि पंडाल में लगे सजावटी सामग्री
को हाथ न लगाए और पंडाल में कई स्थानों पर डोंट टच का बोर्ड लगा रहता है,
लेकिन हमारी समिति इसे विपरीच काम कर रही है। समिति के मुताबिक उनके
पंडाल में आए लोग देखने के साथ-साथ पंडाल को छू कर देख भी सकते हैं।
समिति के एक सदस्य तपन मुखर्जी ने बताया कि पंडाल के आस-पास सैकड़ों की
संख्या में ऐसी फ्रेम लगी होगी, जिसे दर्शक न केवल छू सकते हैं, बल्कि
उटल भी सकते हैं। मजे की बात यह है कि फ्रेम के उटलते ही उसका रंग और
आकृति बदल जाएगी। उन्होंने बताया कि सोमनाथ मुखर्जी के परिकल्पना को
साकार करने में डेकोरेटर के कारगीर, मूर्तिकार और बिजली सज्जा वाले
तन्मयता से लगे हैं।
उन्होंने बताया कि बीते 72 सालों से यहां पूजा आयोजित होती आ रही है,
लेकिन बीते दस-बारह सालों में पाथुरियाघाट पांचेरपल्ली की पूजा ने जो
ख्याति अर्जित की उसके बलबूते यह पूजा महानगर की गिनी-चुनी पूजा में
शुमार हो गई।
उन्होंने बताया कि बीते साल यानी 2010 में दक्षिण भारतीय संगीत की थीम पर
पूजा आयोजित की गई थी। इससे पहले 2009 में सुतानटी केंद्रित पंडाल, 2008
में माचिस की डिब्बी व तिल्ली का पंडाल काफी चर्चित हुआ था। वहीं,
मिट््टी, रस्सी, चावल-दाल, पाट, पुराने अखबार, पुराने कार्टुन, पत्थर के
टुकड़े और गमछों से बना पंडाल को देखने भी भारी संख्या में दर्शक
पाथुरियाघाट पहुंचे थे।
एक अन्य सदस्य ने बताया कि समिति को एशियन पेंट, श्रीलेदर, प्रतिदिन,
एमपी बिड़ला, स्टेट्समैन, कोलकाता पुलिस, रोटरी क्लब, ईटीवी समेत कई
संगठनों की ओर से बेहतर पंडाल और प्रतिमा के लिए सम्मानित किया जा चुका
है। उन्होंने इस बार की थीम के बारे में बताया कि पंडाल दर्शनीय होगा और
इसी से मेल खाती प्रतिमा व बिजली सज्जा होगी। उन्होंने बताया कि पंडाल और
प्रतिमा को हम साल-दर-साल बेहतर बनाने की कोशिश में जुटे रहते हैं, लेकिन
स्थानाभाव के कारण हमारे पास बिजली सज्जा के लिए अधिक संभावनाएं नहीं है।
उन्होंने बताया को सोमा इलेक्ट्रिक के कारीगर बिजली सज्जा को इंद्रधनुषी
बनाने में जुटे हैं।
उन्होंने बताया कि साढ़े सात लाख के बजट वाले पाथुरियाघाट के पूजा पंडाल
का उद्घाटन 30 सितंबर को कई जानेमाने लोगों की मौजूदगी में होगा और सात
अक्तूबर को प्रतिमा को विसर्जित किया जाएगा।
छोटे बजट की बड़ी पूजा : हावड़ा जिले के शिवपुर इलाके में आयोजित होने वाली
रामकृष्णपुर पल्ली एथलीट क्लब के दुर्गापूजा छोटे बजट की बड़ी पूजा के रूप
में जानी जाती है। बीते 12 सालों से यहां पूजा आयोजित हो रही है। पांच
दिवसीय दुर्गोत्सव के दौरान पूजा पंडाल में विविध प्रकार के धार्मिक व
सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। क्लब और ओर से अध्यक्ष
धर्मपाल निगानिया और कार्यकारी अध्यक्ष रमेश मुरारका ने बताया कि गोपी
डेकोरेटर को पंडाल, कार्तिक पाल को प्रतिमा और अनवर इलेक्ट्रिक को बिजली
सज्जा की जिम्मेवारी दी गई है। आयोजकों के मुताबिक दो अक्तूबर को पूजा
पंडाल का उद्घाटन और छह अक्तूबर को प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।
कोलकाता, 29 सितंबर। उलट कर देखो बदल गया कि थीम पर इस बार उत्तर कोलकाता
में पाथुरियाघाट पांचेरपल्ली सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने पूजा आयोजित
करने का मन बनाया है। समिति के सदस्यों का कहना है कि लगभग सभी पूजा
कमिटियां दर्शकों से यह अनुरोध करती है कि पंडाल में लगे सजावटी सामग्री
को हाथ न लगाए और पंडाल में कई स्थानों पर डोंट टच का बोर्ड लगा रहता है,
लेकिन हमारी समिति इसे विपरीच काम कर रही है। समिति के मुताबिक उनके
पंडाल में आए लोग देखने के साथ-साथ पंडाल को छू कर देख भी सकते हैं।
समिति के एक सदस्य तपन मुखर्जी ने बताया कि पंडाल के आस-पास सैकड़ों की
संख्या में ऐसी फ्रेम लगी होगी, जिसे दर्शक न केवल छू सकते हैं, बल्कि
उटल भी सकते हैं। मजे की बात यह है कि फ्रेम के उटलते ही उसका रंग और
आकृति बदल जाएगी। उन्होंने बताया कि सोमनाथ मुखर्जी के परिकल्पना को
साकार करने में डेकोरेटर के कारगीर, मूर्तिकार और बिजली सज्जा वाले
तन्मयता से लगे हैं।
उन्होंने बताया कि बीते 72 सालों से यहां पूजा आयोजित होती आ रही है,
लेकिन बीते दस-बारह सालों में पाथुरियाघाट पांचेरपल्ली की पूजा ने जो
ख्याति अर्जित की उसके बलबूते यह पूजा महानगर की गिनी-चुनी पूजा में
शुमार हो गई।
उन्होंने बताया कि बीते साल यानी 2010 में दक्षिण भारतीय संगीत की थीम पर
पूजा आयोजित की गई थी। इससे पहले 2009 में सुतानटी केंद्रित पंडाल, 2008
में माचिस की डिब्बी व तिल्ली का पंडाल काफी चर्चित हुआ था। वहीं,
मिट््टी, रस्सी, चावल-दाल, पाट, पुराने अखबार, पुराने कार्टुन, पत्थर के
टुकड़े और गमछों से बना पंडाल को देखने भी भारी संख्या में दर्शक
पाथुरियाघाट पहुंचे थे।
एक अन्य सदस्य ने बताया कि समिति को एशियन पेंट, श्रीलेदर, प्रतिदिन,
एमपी बिड़ला, स्टेट्समैन, कोलकाता पुलिस, रोटरी क्लब, ईटीवी समेत कई
संगठनों की ओर से बेहतर पंडाल और प्रतिमा के लिए सम्मानित किया जा चुका
है। उन्होंने इस बार की थीम के बारे में बताया कि पंडाल दर्शनीय होगा और
इसी से मेल खाती प्रतिमा व बिजली सज्जा होगी। उन्होंने बताया कि पंडाल और
प्रतिमा को हम साल-दर-साल बेहतर बनाने की कोशिश में जुटे रहते हैं, लेकिन
स्थानाभाव के कारण हमारे पास बिजली सज्जा के लिए अधिक संभावनाएं नहीं है।
उन्होंने बताया को सोमा इलेक्ट्रिक के कारीगर बिजली सज्जा को इंद्रधनुषी
बनाने में जुटे हैं।
उन्होंने बताया कि साढ़े सात लाख के बजट वाले पाथुरियाघाट के पूजा पंडाल
का उद्घाटन 30 सितंबर को कई जानेमाने लोगों की मौजूदगी में होगा और सात
अक्तूबर को प्रतिमा को विसर्जित किया जाएगा।
छोटे बजट की बड़ी पूजा : हावड़ा जिले के शिवपुर इलाके में आयोजित होने वाली
रामकृष्णपुर पल्ली एथलीट क्लब के दुर्गापूजा छोटे बजट की बड़ी पूजा के रूप
में जानी जाती है। बीते 12 सालों से यहां पूजा आयोजित हो रही है। पांच
दिवसीय दुर्गोत्सव के दौरान पूजा पंडाल में विविध प्रकार के धार्मिक व
सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। क्लब और ओर से अध्यक्ष
धर्मपाल निगानिया और कार्यकारी अध्यक्ष रमेश मुरारका ने बताया कि गोपी
डेकोरेटर को पंडाल, कार्तिक पाल को प्रतिमा और अनवर इलेक्ट्रिक को बिजली
सज्जा की जिम्मेवारी दी गई है। आयोजकों के मुताबिक दो अक्तूबर को पूजा
पंडाल का उद्घाटन और छह अक्तूबर को प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।
इस्कॉन मंदिर में होंगे दुर्गा के दर्शन
शंकर जालान
कोलकाता। मध्य कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट स्थित कॉलेज स्क्वायर में 1948 से आयोजित हो रही दुर्गापूजा का पंडाल इस बार मायापुर स्थित इस्कॉन मंदिर की हू-ब-हू आकृति का होगा। अद्भूत पंडाल को बताने में सैकड़ों कारीगर बीते दो महीने से लगे हैं। कॉलेज स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव कमिटी के वरिष्ठ सदस्य प्रभात सेन ने बताया कि इससे पहले जयपुर पैलेस, बंगलूरू का प्रशांति मंदिर, गुजरात का अक्षरधाम मंदिर, उत्तराखंड का लक्ष्मण झूला, पंजाब का स्वर्ण मंदिर, कनार्टक विधानसभा भवन और कूचबिहार की राजबाड़ी की शक्ल का पंडाल बनाया गया था।
उन्होंने बताया कि ये भव्य पंडाल न केवल चर्चित हुए थे, बल्कि इन पंडालों को देखने भारी तादाद में दर्शनार्थी भी आए थे।
सेन ने बताया कि कमिटी के पदाधिकारी और सदस्य डेकोरेटर को इस बात से भलीभांति अवगत करा देते हैं कि पंडाल की फिनिशिंग इतनी बेहतरीन होनी चाहिए कि लोगों को ऐसा महसूस न हो कि यह मूल मंदिर या इमारत नहीं बल्कि महज एक अस्थाई पंडाल है। उन्होंने बताया कि विराट व दर्शनीय पंडाल को बनाने में पाल डेकोरेटर के लोग बांस, तिरपाल, कपड़ा, प्लाईवुड और थर्माकोल का इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रतिमा के बारे में उन्होंने बताया कि उल्टाडांगा के सनातन रूद्र पाल उनके पूजा पंडाल के लिए परंपरागत मूर्ति बनाने में व्यस्त हैं। सेन के मुताबिक कमिटी के सदस्यों का मत है कि मूर्ति को लेकर कोई प्रयोग नहीं किया जाए, इसलिए हमारे पंडाल में सालों से परंपरागत मूर्तियां ही लाई जा रही हैं।
उन्होंने बताया कि शुरू से ही कॉलेज स्क्वायर की पूजा बेहतरीन व दर्शनीय आलोक सज्जा के लिए जानी जाती रही है। इस बार भी हुगली जिले के चंदननगर के कारीगर अपनी कार्य-कुशलता के मुताबिक इंद्रधनुषी रोशनी बिखेरेंगे। सेन ने बताया कि पूजा का कुल बजट करीब 35 लाख रुपए है और यह राशि चंदा और स्मारिका में प्रकाशित विज्ञापन के जरिए एकत्रिक की जाती है। इसके अलावा कई कंपनियां भी प्रयोजित करती हैं। उन्होंने बताया कि 30 सितंबर को राज्यपाल एमके नारायणन कॉलेज स्क्वायर के पूजा पंडाल का उद्घाटन करेंगे। इस मौके पर और कई जानेमाने लोग बतौर अतिथि मौजूद रहेंगे। आठ अक्तूबर को मां दुर्गा समेत गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी व सरस्वती की प्रतिमा को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाएगा।
कोलकाता। मध्य कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट स्थित कॉलेज स्क्वायर में 1948 से आयोजित हो रही दुर्गापूजा का पंडाल इस बार मायापुर स्थित इस्कॉन मंदिर की हू-ब-हू आकृति का होगा। अद्भूत पंडाल को बताने में सैकड़ों कारीगर बीते दो महीने से लगे हैं। कॉलेज स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव कमिटी के वरिष्ठ सदस्य प्रभात सेन ने बताया कि इससे पहले जयपुर पैलेस, बंगलूरू का प्रशांति मंदिर, गुजरात का अक्षरधाम मंदिर, उत्तराखंड का लक्ष्मण झूला, पंजाब का स्वर्ण मंदिर, कनार्टक विधानसभा भवन और कूचबिहार की राजबाड़ी की शक्ल का पंडाल बनाया गया था।
उन्होंने बताया कि ये भव्य पंडाल न केवल चर्चित हुए थे, बल्कि इन पंडालों को देखने भारी तादाद में दर्शनार्थी भी आए थे।
सेन ने बताया कि कमिटी के पदाधिकारी और सदस्य डेकोरेटर को इस बात से भलीभांति अवगत करा देते हैं कि पंडाल की फिनिशिंग इतनी बेहतरीन होनी चाहिए कि लोगों को ऐसा महसूस न हो कि यह मूल मंदिर या इमारत नहीं बल्कि महज एक अस्थाई पंडाल है। उन्होंने बताया कि विराट व दर्शनीय पंडाल को बनाने में पाल डेकोरेटर के लोग बांस, तिरपाल, कपड़ा, प्लाईवुड और थर्माकोल का इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रतिमा के बारे में उन्होंने बताया कि उल्टाडांगा के सनातन रूद्र पाल उनके पूजा पंडाल के लिए परंपरागत मूर्ति बनाने में व्यस्त हैं। सेन के मुताबिक कमिटी के सदस्यों का मत है कि मूर्ति को लेकर कोई प्रयोग नहीं किया जाए, इसलिए हमारे पंडाल में सालों से परंपरागत मूर्तियां ही लाई जा रही हैं।
उन्होंने बताया कि शुरू से ही कॉलेज स्क्वायर की पूजा बेहतरीन व दर्शनीय आलोक सज्जा के लिए जानी जाती रही है। इस बार भी हुगली जिले के चंदननगर के कारीगर अपनी कार्य-कुशलता के मुताबिक इंद्रधनुषी रोशनी बिखेरेंगे। सेन ने बताया कि पूजा का कुल बजट करीब 35 लाख रुपए है और यह राशि चंदा और स्मारिका में प्रकाशित विज्ञापन के जरिए एकत्रिक की जाती है। इसके अलावा कई कंपनियां भी प्रयोजित करती हैं। उन्होंने बताया कि 30 सितंबर को राज्यपाल एमके नारायणन कॉलेज स्क्वायर के पूजा पंडाल का उद्घाटन करेंगे। इस मौके पर और कई जानेमाने लोग बतौर अतिथि मौजूद रहेंगे। आठ अक्तूबर को मां दुर्गा समेत गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी व सरस्वती की प्रतिमा को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाएगा।
Tuesday, September 27, 2011
अली बाबा चालीस चोर की थीम पर दुर्गापूजा
शंकर जालान
कोलकाता। मछुआ बाजार सार्वजनीन दुर्गापूजा समिति इस बार अली बाबा और चालीस चोर के महत्व को उजागर करने के मकसद से पूजा पंडाल का निर्माण कर रही है। पंडाल के भीतरी हिस्से में म्यूजिकल सिस्टम (संगीत) व्यवस्था की गई है। बच्चों की रूचि को ध्यान में रखते हुए पंडाल के आसपास कार्टून, घोड़े समेत बच्चों को लुभाने वाले कई चित्र अंकित किए जा रहे हैं।
दुर्गापूजा समिति के एक प्रमुख सदस्य ने बताया कि 2011 के लिए गठित कमिटी में विजय उपाध्याय, विधायक स्मिता बक्शी, पार्षद रीता चौधरी, राजेश लाठ और प्रह्लाद राय गोयनका को शामिल किया गया है।
सदस्य के मुताबिक 30 फीट ऊंचे, 95 फीट लंबे और 34 फीट चौड़े पंडाल को बनाने में बांस, तिरपाल, कपड़ा, प्लास्टर आॅफ पेरिस, रस्सी, जूट, लकड़ी और झूड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सदस्य ने बताया कि मछुआ बाजार (फल मंडी) में 1953 से पूजा आयोजित हो रही है। शुरू-शुरू में पूजा साधारण रूप से की जाती थी, लेकिन बीते कुछ सालों में पूजा न केवल भव्य रूप से की जाने लगी, बल्कि चर्चा का विषय भी रही। बीते कुछ सालों पशु-पक्षियों के महत्व के मद्देनजर, रेत में फंसी नाव, बौद्धस्तूप, पिरामिड, कच्चे बांस, व्हाइट हाउस और जूट की रस्सी का पंडाल बनाकर समिति ने वाह-वाही लूटी और कोई पुरस्कार भी जीते।
समिति के मुताबिक राज्य सरकार के युवा विभाग, चैनल विजन और सृष्टि चैनल समेत कई संस्थानों की ओर से बेहतरीन साज-सज्जा के लिए सम्मान मिल चुका है।
थीम, प्रतिमा, बिजली सज्जा, उद्घाटन, बजट और विसर्जन के बारे में समिति के सदस्यों ने बताया कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के बादल प्रधान की परिकल्पना को साकार करने में सैकड़ों कारीगर बीते कई सप्ताह से लगे हुए हैं। उन्होंने बताया कि कुम्हारटोली के संजू पाल उनके पूजा पंडाल के लिए मां दुर्गा समेत लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश की प्रतिमा बनाने में जुटे हैं।
समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि बिजली सज्जा की जिम्मेवारी विद्युत इलेक्ट्रिक को दी गई है। उन्होंने बताया कि साढ़े आठ लाख के बजट वाली इस पूजा पंडाल का विधिवत उद्घाटन एक अक्तूबर को कई जानेमाने लोगों की मौजूदगी में होगा और एक सप्ताह तक पूजा-अर्चना करने के बाद आठ अक्तूबर को नम आंखों से मां दुर्गा को विदाई दी जाएगी।
कोलकाता। मछुआ बाजार सार्वजनीन दुर्गापूजा समिति इस बार अली बाबा और चालीस चोर के महत्व को उजागर करने के मकसद से पूजा पंडाल का निर्माण कर रही है। पंडाल के भीतरी हिस्से में म्यूजिकल सिस्टम (संगीत) व्यवस्था की गई है। बच्चों की रूचि को ध्यान में रखते हुए पंडाल के आसपास कार्टून, घोड़े समेत बच्चों को लुभाने वाले कई चित्र अंकित किए जा रहे हैं।
दुर्गापूजा समिति के एक प्रमुख सदस्य ने बताया कि 2011 के लिए गठित कमिटी में विजय उपाध्याय, विधायक स्मिता बक्शी, पार्षद रीता चौधरी, राजेश लाठ और प्रह्लाद राय गोयनका को शामिल किया गया है।
सदस्य के मुताबिक 30 फीट ऊंचे, 95 फीट लंबे और 34 फीट चौड़े पंडाल को बनाने में बांस, तिरपाल, कपड़ा, प्लास्टर आॅफ पेरिस, रस्सी, जूट, लकड़ी और झूड़ी का इस्तेमाल किया जा रहा है।
सदस्य ने बताया कि मछुआ बाजार (फल मंडी) में 1953 से पूजा आयोजित हो रही है। शुरू-शुरू में पूजा साधारण रूप से की जाती थी, लेकिन बीते कुछ सालों में पूजा न केवल भव्य रूप से की जाने लगी, बल्कि चर्चा का विषय भी रही। बीते कुछ सालों पशु-पक्षियों के महत्व के मद्देनजर, रेत में फंसी नाव, बौद्धस्तूप, पिरामिड, कच्चे बांस, व्हाइट हाउस और जूट की रस्सी का पंडाल बनाकर समिति ने वाह-वाही लूटी और कोई पुरस्कार भी जीते।
समिति के मुताबिक राज्य सरकार के युवा विभाग, चैनल विजन और सृष्टि चैनल समेत कई संस्थानों की ओर से बेहतरीन साज-सज्जा के लिए सम्मान मिल चुका है।
थीम, प्रतिमा, बिजली सज्जा, उद्घाटन, बजट और विसर्जन के बारे में समिति के सदस्यों ने बताया कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के बादल प्रधान की परिकल्पना को साकार करने में सैकड़ों कारीगर बीते कई सप्ताह से लगे हुए हैं। उन्होंने बताया कि कुम्हारटोली के संजू पाल उनके पूजा पंडाल के लिए मां दुर्गा समेत लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश की प्रतिमा बनाने में जुटे हैं।
समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि बिजली सज्जा की जिम्मेवारी विद्युत इलेक्ट्रिक को दी गई है। उन्होंने बताया कि साढ़े आठ लाख के बजट वाली इस पूजा पंडाल का विधिवत उद्घाटन एक अक्तूबर को कई जानेमाने लोगों की मौजूदगी में होगा और एक सप्ताह तक पूजा-अर्चना करने के बाद आठ अक्तूबर को नम आंखों से मां दुर्गा को विदाई दी जाएगी।
Monday, September 26, 2011
पहाड़ों के बीच विराजेगी दुर्गा
शंकर जालान
कोलकाता। उत्तर कोलकाता के काशी बोस लेन की दुर्गा पूजा पुरस्कारों के लिए जानी जाती है। वैसे तो पूजा बीते 71 सालों से हो रही है, लेकिन बीते 10-15 सालों के दौरान बेहतर पंडाल, कलात्मक प्रतिमा और इंद्रधनुषी बिजली सज्जा के लिए कमिटी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। कमिटी को अब तक एशियन पेंट, प्रतिदिन, एमपी बिड़ला, श्री लेदर, स्टेटमैन, जामिनी साड़ी समेत कई प्रतिष्ठित सम्मान हासिल हो चुके हैं। यहां की पूजा को लोग पुरस्कार वाली पूजा के नाम से जानते हैं। काशी बोस लेन स्थित मैदान में होने वाली दुर्गा पूजा में इस बार दर्शनार्थियों को पहाड़ों के बीच में देवी दुर्गा के दर्शन होंगे।
आयोजकों का मानना है कि मध्य व उत्तर कोलकाता में आयोजित होने वाली करीब दो सौ पूजा में उनके पंडाल, प्रतिमा और बिजली सज्जा की एक अलग पहचान रहती है।
काशी बोस लेन दुर्गा पूजा कमिटी के बैनर तले आयोजित होने वाले दुर्गोेत्सव का उद्घाटन महापंचमी (30 सितंबर) को होगा और रीति के मुताबिक विजया दशमी (छह अक्तूबर) को मां दुर्गा समेत भगवान गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। पूजा पंडाल का उद्घाटन कौन करेगा? इस प्रश्न का जवाव देते हुए कमिटी के प्रमुख सदस्य गोराचंद चंद्रा ने बताया कि ऋषिकेश के एक संत उद्घाटन करेंगे।
पंडाल कैसा होगा? किस चीज से बना होगा? थीम क्या है और इसे बनाने का जिम्मा किसे दिया गया है? इन सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि पंडाल को पहाडों जैसा बनाया जा रहा है। कुल ग्यारह पहाड़ों के बीच लोग को देवी दुर्गा के दर्शन होंगे।
उन्होंने बताया कि गौरांग कोइला की परिकल्पना को साकार करने में सैकड़ों कारीगर बीते कई सप्ताह से लगे हैं। चंद्रा के मुताबिक बांस, तिरपाल, कपड़ा, झुड़ी, चट आदि से बने 45 फीट ऊंचे, 40 फीट चौड़े और 50 फीट लंबा पंडाल देखने में बिल्कुल पहाड़ जैसा लगेगा। प्रतिमा के बारे में उन्होंने बताया कि बीते कुछ सालों से नदिया जिले के शंकर पाल उनके पंडाल के लिए प्रतिमा बनाते आ रहे थे, लेकिन इस बार यह भी गौरांग कोइला को दिया गया है।
बिजली सज्जा के बारे में उन्होंने बताया कि हुगली जिला स्थित चंदननगर के दिलीप इलेक्ट्रिक के कारीगर आलोक सज्जा का काम कर रहे हैं। बजट के बारे में उन्होंने बताया कि कुल बजट 15 लाख रुपए का है। यह राशि कहां से आती है, इसका खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि चंदा, स्मारिका प्रकाशन के अलावा कई बड़ी कंपनियां प्रायोजित करती है।
उन्होंने बताया कि बीते साल यानी 2010 में राजस्थानी मंदिरनुमा भव्य पंडाल बनाया गया था। नारियल की जटाओं के पंडाल के भीतरी हिस्से में कई दर्शनीय आकृति लगाई गई थी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा था।
कोलकाता। उत्तर कोलकाता के काशी बोस लेन की दुर्गा पूजा पुरस्कारों के लिए जानी जाती है। वैसे तो पूजा बीते 71 सालों से हो रही है, लेकिन बीते 10-15 सालों के दौरान बेहतर पंडाल, कलात्मक प्रतिमा और इंद्रधनुषी बिजली सज्जा के लिए कमिटी को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। कमिटी को अब तक एशियन पेंट, प्रतिदिन, एमपी बिड़ला, श्री लेदर, स्टेटमैन, जामिनी साड़ी समेत कई प्रतिष्ठित सम्मान हासिल हो चुके हैं। यहां की पूजा को लोग पुरस्कार वाली पूजा के नाम से जानते हैं। काशी बोस लेन स्थित मैदान में होने वाली दुर्गा पूजा में इस बार दर्शनार्थियों को पहाड़ों के बीच में देवी दुर्गा के दर्शन होंगे।
आयोजकों का मानना है कि मध्य व उत्तर कोलकाता में आयोजित होने वाली करीब दो सौ पूजा में उनके पंडाल, प्रतिमा और बिजली सज्जा की एक अलग पहचान रहती है।
काशी बोस लेन दुर्गा पूजा कमिटी के बैनर तले आयोजित होने वाले दुर्गोेत्सव का उद्घाटन महापंचमी (30 सितंबर) को होगा और रीति के मुताबिक विजया दशमी (छह अक्तूबर) को मां दुर्गा समेत भगवान गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाएगा। पूजा पंडाल का उद्घाटन कौन करेगा? इस प्रश्न का जवाव देते हुए कमिटी के प्रमुख सदस्य गोराचंद चंद्रा ने बताया कि ऋषिकेश के एक संत उद्घाटन करेंगे।
पंडाल कैसा होगा? किस चीज से बना होगा? थीम क्या है और इसे बनाने का जिम्मा किसे दिया गया है? इन सवालों का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि पंडाल को पहाडों जैसा बनाया जा रहा है। कुल ग्यारह पहाड़ों के बीच लोग को देवी दुर्गा के दर्शन होंगे।
उन्होंने बताया कि गौरांग कोइला की परिकल्पना को साकार करने में सैकड़ों कारीगर बीते कई सप्ताह से लगे हैं। चंद्रा के मुताबिक बांस, तिरपाल, कपड़ा, झुड़ी, चट आदि से बने 45 फीट ऊंचे, 40 फीट चौड़े और 50 फीट लंबा पंडाल देखने में बिल्कुल पहाड़ जैसा लगेगा। प्रतिमा के बारे में उन्होंने बताया कि बीते कुछ सालों से नदिया जिले के शंकर पाल उनके पंडाल के लिए प्रतिमा बनाते आ रहे थे, लेकिन इस बार यह भी गौरांग कोइला को दिया गया है।
बिजली सज्जा के बारे में उन्होंने बताया कि हुगली जिला स्थित चंदननगर के दिलीप इलेक्ट्रिक के कारीगर आलोक सज्जा का काम कर रहे हैं। बजट के बारे में उन्होंने बताया कि कुल बजट 15 लाख रुपए का है। यह राशि कहां से आती है, इसका खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि चंदा, स्मारिका प्रकाशन के अलावा कई बड़ी कंपनियां प्रायोजित करती है।
उन्होंने बताया कि बीते साल यानी 2010 में राजस्थानी मंदिरनुमा भव्य पंडाल बनाया गया था। नारियल की जटाओं के पंडाल के भीतरी हिस्से में कई दर्शनीय आकृति लगाई गई थी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा था।
Sunday, September 25, 2011
चाय उद्योग पर संकट के बादल
शंकर जालान
आजकल उत्तर बंगाल के चाय उद्योग पर मजदूरी आंदोलन के चलते संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विभिन्न चाय श्रमिकों के संगठनों के आंदोलन के चलते बागानों के मालिक भारी दबाव में हैं। आंदोलन का नेतृत्व दे रहे को-आर्डिनेशन कमेटी के संयोजक चित्त दे के मुताबिक उत्तर बंगाल के तराइ, डुवार्स और दार्जिलिंग के पार्वतीय क्षेत्र में बड़े चाय बागानों की संख्या 2788 है। इनके अलावा कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर जिलों में लघु चाय बागानों की अच्छी खासी तादाद है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में मजदूरों को मिल रही 67 रुपए की दैनिक मजदूरी महंगाई को देखते हुए नगण्य है। हमने इसे 165 रुपए करने की मांग की है। लेकिन मालिक अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। सीटू नेता जियाउर आलम ने कहा कि मालिक पक्ष मजदूरों का शोषण कर करोड़ों रुपए का मुनाफा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है, जबकि उसे इस मसले पर गंभीरता से सोचना चाहिए।
मालूम हो कि तराई-डुवार्स में लगभग दो लाख 22 हजार चाय श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से चाय उद्योग से जुड़े हैं। इस बीच, मजदूर नेता अलोक चक्रवर्ती ने कहा है कि मालिक पक्ष के साथ मजदूरी को लेकर श्रमिक संगठनों की कई बार बैठकें हुई है, लेकिन कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला। यदि मजदूरों की मांग नहीं मानी गई तो हम वृहद आंदोलन करेंगे। इस प्रसंग में चाय बागानों के संगठन के संयोजक अमितांशु चक्रवर्ती ने कहा कि दरअसल लोग केवल 67 रुपए मजदूरी को ही देख रहे हैं। इस राशि के अलावा मजदूरों को जो सुविधाएं दी रही हैं उसे नजरअंदाज किया जाता है। मिसाल के तौर पर मजदूरों को आवास व रियायती मूल्य पर राशन दिया जा रहा है। उसे मजदूरी में शामिल नहीं किया जाता। इनके साथ ही मजदूरों के नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था की गई है। कुल मिलाकर 135 रुपए का हिसाब आता है। जब मालिक पक्ष पर करोड़ों रुपए का मुनाफा करने का आरोप लगता है तो नेता लोग भूल जाते हैं कि महंगाई की मार जितनी आम जनता को झेलनी पड़ रही है उतनी ही चाय बागान मालिकों को भी। महंगाई के चलते उत्पादन की लागत दोगुनी हो गई है। इसलिए हमने तीन वर्ष में आठ रुपए की दर से मजदूरी बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। फिलहाल हड़ताल की वजह से हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। एक चाय बागान में प्रतिदिन आठ हजार से दस हजार किलो चायपत्ती का उत्पादन होता है। इसका मूल्य नौ से दस लाख रुपए होता है। डुवार्स में 154, तराई में 46 और दार्जिलिंग में 78 वृहद चाय बागान हैं। हड़ताल के कारण चाय बागानों के मालिकों को करोड़ों का चूना लगा है।
उनका तर्क है कि चाय श्रमिकों की मजदूरी एक ही बार में अधिक बढ़ाना उद्योग के लिए संभव नहीं है। उत्तर बंगाल में लघु चाय बागान करीब तीस हजार हैं, जिनमें प्रतिदिन 91 मिलियन किलो का उत्पादन होता है। करीब एक लाख एकड़ जमीन में फैले इन लघु चाय बागानों में प्रति वर्ष नौ करोड़ दस लाख किलो चायपत्ती का उत्पादन होता है। आंदोलन के प्रसंग में मजदूर संगठन से जुड़े एक अन्य नेता सुकरा मुंडा ने कहा कि 250 रुपए मजदूरी की मांग नहीं माने जाने पर हम वृहद आंदोलन के लिए तैयार हैं। यदि मालिक पक्ष को हड़ताल से नुकसान होता है तो हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
उनका कहा कि मजदूरों के साथ हुए समझौते के मुताबिक न्यूनतम मजदूरी के तहत रियायती दर पर राशन, पेयजल की आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवा, जलावन और इन सब का रखरखाव भी शामिल है, लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाता है कि यह व्यवस्था भी इतनी लचर है, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। पंद्रह दिनों की दिहाड़ी में से श्रमिकों को 67 रुपए की दर से केवल 12 रोज की ही मजदूरी दी जाती है। यह राशि 804 रुपए होती है। अब इसी राशि में मजदूर को अपना व अपनी बीवी व बच्चों का पेट पालने से लेकर उनकी शिक्षा पर खर्च करना पड़ता है। इसी में उसे दवा का खर्च भी उठाना पड़ता है, चूंकि बागान के अस्पताल में दवाएं बहुत कम ही रहती हैं। ज्यादातर दवाएं बाहर से ही खरीदनी पड़ती है।
इस दौर में मजूदरों का केवल एक ही सहारा होता है जब बागान में पत्ती की भरमार होती है। उस दौर में चायपत्ती तोड़ने के लिए उन्हें अतिरिक्त पैसे मिलते हैं। इस अतिरिक्त कार्य के लिए भी मजदूरी निर्धारित है। प्रथम छह किलो तक एक रुपए प्रति किलो और उससे अधिक तोड़ने पर डेढ़ रुपए प्रति किलो की दर से मजदूरी मिलती है। यह कार्य वर्ष में तीन से चार महीने ही रहता है, बाकी महीनों में मजदूर गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए अपना बोनस, ग्रैच्यूटी, पीएफ तक महाजनों के पास गिरवी रख देते हैं। मजदूर की पूरी जिंदगी कर्ज में डूबी रहती है। इस बीच यदि वह किसी गंभीर रोग का शिकार हो जाता है तो उसके लिए धीमी मौत का इंतजार करने के सिवा अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस राशन की दुहाई प्रबंधन देता है उसमें भी कई तरह की खामियां हैं। बागान श्रमिकों को 40 पैसे प्रति किलो की दर से चावल, गेहूं या आटा दिया जाता है। एक मजदूर को सप्ताह में एक किलो चावल, दो किलो 220 ग्राम गेहूं या आटा और पत्नी के लिए एक किलो चावल, एक किलो 440 ग्राम आटा, बच्चों के लिए 500 ग्राम चावल और 720 ग्राम आटा मिलता है। यह व्यवस्था भी बहुत से बागानों से में लचर है। आए दिन राशन को लेकर मजदूरों और प्रबंधन के बीच विवाद होता रहता है। पेयजल की आपूर्ति व्यवस्था भी सही नहीं है। कई जगह पाइप साठ से सत्तर साल पुराने हो चुके हैं। रोज पाइप की मरम्मत होती है और रोज टूटते हैं। बागानों में आज भी कच्चे कुएं का पानी प्रयोग में लाया जाता है। कहीं तो नदियों का पानी परिष्कृत किए बिना सीधे आवासों में पहुंचाया जाता है। मजदूरों की आवासीय सुविधा का हाल भी बेहाल है। एक आवासीय घर नियमानुसार 350 वर्ग फीट का होना चाहिए। हालांकि कई जगह ये घर 21 बटा 10 फीट के ही हैं। जबकि बहुत से मजदूरों को यह भी नसीब नहीं है। आवास को लेकर बागान में विवाद कोई नई बात नहीं है। घरों के टूटी हुई छत, टूटी हुई खिड़कियां ही सबकुछ बयान कर देती हैं। मजदूरों को आश्वासन की घुट्टी पिला दी जाती है।
शशि थापा नामक एक महिला मजदूर ने शुक्रवार को बताया कि कम मजदूरी की समस्या से पहले से जूझ रहे चाय मजदूरों के सामने एक नया संकट आ गया है। वह है भविष्य में छंटनी का संकट। इसकी मुख्य वजह है वह मशीन जिससे चायपत्तियां तोड़ने का काम लिया जा रहा है। आम तौर पर श्रमिकों और श्रमिक संगठन के नेताओं का मानना है कि इस मशीन का उपयोग उत्तर बंगाल के इस सबसे वृहद उद्योग मजदूरों की छंटनी के लिए किया जा सकता है। हालांकि चाय बागान मालिक इस परिवर्तन को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं।
मालिकों का कहना है कि मशीन का उपयोग श्रम दक्षता को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। श्रमिक छंटनी की आशंका बेबुनियाद है। ज्ञात हो कि एक श्रमिक दिन में जितनी पत्तियां तोड़ते हैं उससे यह मशीन बहुत की कम समय में दोगुणी चायपत्ती तोड़ने में सक्षम है। 18 श्रमिक संगठनों की को-आर्डिनेशन कमेटी के संयोजक चित्त दे का कहना है कि हालांकि शुरू में ऐसा लगता था कि यह मशीन श्रमिक की मदद कर रही है लेकिन अब मजदूरों को इससे नुकसान की आशंका सताने लगी है। इसका कुफल श्रमिक छंटनी के रूप में हमारे सामने आ सकता है। खासतौर से महिला श्रमिकों की शिकायत है कि उन्हें इस मशीन के जरिए काम करने में असुविधा हो रही है।
आजकल उत्तर बंगाल के चाय उद्योग पर मजदूरी आंदोलन के चलते संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विभिन्न चाय श्रमिकों के संगठनों के आंदोलन के चलते बागानों के मालिक भारी दबाव में हैं। आंदोलन का नेतृत्व दे रहे को-आर्डिनेशन कमेटी के संयोजक चित्त दे के मुताबिक उत्तर बंगाल के तराइ, डुवार्स और दार्जिलिंग के पार्वतीय क्षेत्र में बड़े चाय बागानों की संख्या 2788 है। इनके अलावा कूचबिहार, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर जिलों में लघु चाय बागानों की अच्छी खासी तादाद है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में मजदूरों को मिल रही 67 रुपए की दैनिक मजदूरी महंगाई को देखते हुए नगण्य है। हमने इसे 165 रुपए करने की मांग की है। लेकिन मालिक अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। सीटू नेता जियाउर आलम ने कहा कि मालिक पक्ष मजदूरों का शोषण कर करोड़ों रुपए का मुनाफा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है, जबकि उसे इस मसले पर गंभीरता से सोचना चाहिए।
मालूम हो कि तराई-डुवार्स में लगभग दो लाख 22 हजार चाय श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से चाय उद्योग से जुड़े हैं। इस बीच, मजदूर नेता अलोक चक्रवर्ती ने कहा है कि मालिक पक्ष के साथ मजदूरी को लेकर श्रमिक संगठनों की कई बार बैठकें हुई है, लेकिन कोई सार्थक नतीजा नहीं निकला। यदि मजदूरों की मांग नहीं मानी गई तो हम वृहद आंदोलन करेंगे। इस प्रसंग में चाय बागानों के संगठन के संयोजक अमितांशु चक्रवर्ती ने कहा कि दरअसल लोग केवल 67 रुपए मजदूरी को ही देख रहे हैं। इस राशि के अलावा मजदूरों को जो सुविधाएं दी रही हैं उसे नजरअंदाज किया जाता है। मिसाल के तौर पर मजदूरों को आवास व रियायती मूल्य पर राशन दिया जा रहा है। उसे मजदूरी में शामिल नहीं किया जाता। इनके साथ ही मजदूरों के नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था की गई है। कुल मिलाकर 135 रुपए का हिसाब आता है। जब मालिक पक्ष पर करोड़ों रुपए का मुनाफा करने का आरोप लगता है तो नेता लोग भूल जाते हैं कि महंगाई की मार जितनी आम जनता को झेलनी पड़ रही है उतनी ही चाय बागान मालिकों को भी। महंगाई के चलते उत्पादन की लागत दोगुनी हो गई है। इसलिए हमने तीन वर्ष में आठ रुपए की दर से मजदूरी बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है। फिलहाल हड़ताल की वजह से हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। एक चाय बागान में प्रतिदिन आठ हजार से दस हजार किलो चायपत्ती का उत्पादन होता है। इसका मूल्य नौ से दस लाख रुपए होता है। डुवार्स में 154, तराई में 46 और दार्जिलिंग में 78 वृहद चाय बागान हैं। हड़ताल के कारण चाय बागानों के मालिकों को करोड़ों का चूना लगा है।
उनका तर्क है कि चाय श्रमिकों की मजदूरी एक ही बार में अधिक बढ़ाना उद्योग के लिए संभव नहीं है। उत्तर बंगाल में लघु चाय बागान करीब तीस हजार हैं, जिनमें प्रतिदिन 91 मिलियन किलो का उत्पादन होता है। करीब एक लाख एकड़ जमीन में फैले इन लघु चाय बागानों में प्रति वर्ष नौ करोड़ दस लाख किलो चायपत्ती का उत्पादन होता है। आंदोलन के प्रसंग में मजदूर संगठन से जुड़े एक अन्य नेता सुकरा मुंडा ने कहा कि 250 रुपए मजदूरी की मांग नहीं माने जाने पर हम वृहद आंदोलन के लिए तैयार हैं। यदि मालिक पक्ष को हड़ताल से नुकसान होता है तो हम इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
उनका कहा कि मजदूरों के साथ हुए समझौते के मुताबिक न्यूनतम मजदूरी के तहत रियायती दर पर राशन, पेयजल की आपूर्ति, स्वास्थ्य सेवा, जलावन और इन सब का रखरखाव भी शामिल है, लेकिन जमीनी स्तर पर देखा जाता है कि यह व्यवस्था भी इतनी लचर है, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। पंद्रह दिनों की दिहाड़ी में से श्रमिकों को 67 रुपए की दर से केवल 12 रोज की ही मजदूरी दी जाती है। यह राशि 804 रुपए होती है। अब इसी राशि में मजदूर को अपना व अपनी बीवी व बच्चों का पेट पालने से लेकर उनकी शिक्षा पर खर्च करना पड़ता है। इसी में उसे दवा का खर्च भी उठाना पड़ता है, चूंकि बागान के अस्पताल में दवाएं बहुत कम ही रहती हैं। ज्यादातर दवाएं बाहर से ही खरीदनी पड़ती है।
इस दौर में मजूदरों का केवल एक ही सहारा होता है जब बागान में पत्ती की भरमार होती है। उस दौर में चायपत्ती तोड़ने के लिए उन्हें अतिरिक्त पैसे मिलते हैं। इस अतिरिक्त कार्य के लिए भी मजदूरी निर्धारित है। प्रथम छह किलो तक एक रुपए प्रति किलो और उससे अधिक तोड़ने पर डेढ़ रुपए प्रति किलो की दर से मजदूरी मिलती है। यह कार्य वर्ष में तीन से चार महीने ही रहता है, बाकी महीनों में मजदूर गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए अपना बोनस, ग्रैच्यूटी, पीएफ तक महाजनों के पास गिरवी रख देते हैं। मजदूर की पूरी जिंदगी कर्ज में डूबी रहती है। इस बीच यदि वह किसी गंभीर रोग का शिकार हो जाता है तो उसके लिए धीमी मौत का इंतजार करने के सिवा अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस राशन की दुहाई प्रबंधन देता है उसमें भी कई तरह की खामियां हैं। बागान श्रमिकों को 40 पैसे प्रति किलो की दर से चावल, गेहूं या आटा दिया जाता है। एक मजदूर को सप्ताह में एक किलो चावल, दो किलो 220 ग्राम गेहूं या आटा और पत्नी के लिए एक किलो चावल, एक किलो 440 ग्राम आटा, बच्चों के लिए 500 ग्राम चावल और 720 ग्राम आटा मिलता है। यह व्यवस्था भी बहुत से बागानों से में लचर है। आए दिन राशन को लेकर मजदूरों और प्रबंधन के बीच विवाद होता रहता है। पेयजल की आपूर्ति व्यवस्था भी सही नहीं है। कई जगह पाइप साठ से सत्तर साल पुराने हो चुके हैं। रोज पाइप की मरम्मत होती है और रोज टूटते हैं। बागानों में आज भी कच्चे कुएं का पानी प्रयोग में लाया जाता है। कहीं तो नदियों का पानी परिष्कृत किए बिना सीधे आवासों में पहुंचाया जाता है। मजदूरों की आवासीय सुविधा का हाल भी बेहाल है। एक आवासीय घर नियमानुसार 350 वर्ग फीट का होना चाहिए। हालांकि कई जगह ये घर 21 बटा 10 फीट के ही हैं। जबकि बहुत से मजदूरों को यह भी नसीब नहीं है। आवास को लेकर बागान में विवाद कोई नई बात नहीं है। घरों के टूटी हुई छत, टूटी हुई खिड़कियां ही सबकुछ बयान कर देती हैं। मजदूरों को आश्वासन की घुट्टी पिला दी जाती है।
शशि थापा नामक एक महिला मजदूर ने शुक्रवार को बताया कि कम मजदूरी की समस्या से पहले से जूझ रहे चाय मजदूरों के सामने एक नया संकट आ गया है। वह है भविष्य में छंटनी का संकट। इसकी मुख्य वजह है वह मशीन जिससे चायपत्तियां तोड़ने का काम लिया जा रहा है। आम तौर पर श्रमिकों और श्रमिक संगठन के नेताओं का मानना है कि इस मशीन का उपयोग उत्तर बंगाल के इस सबसे वृहद उद्योग मजदूरों की छंटनी के लिए किया जा सकता है। हालांकि चाय बागान मालिक इस परिवर्तन को सकारात्मक नजरिए से देखते हैं।
मालिकों का कहना है कि मशीन का उपयोग श्रम दक्षता को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। श्रमिक छंटनी की आशंका बेबुनियाद है। ज्ञात हो कि एक श्रमिक दिन में जितनी पत्तियां तोड़ते हैं उससे यह मशीन बहुत की कम समय में दोगुणी चायपत्ती तोड़ने में सक्षम है। 18 श्रमिक संगठनों की को-आर्डिनेशन कमेटी के संयोजक चित्त दे का कहना है कि हालांकि शुरू में ऐसा लगता था कि यह मशीन श्रमिक की मदद कर रही है लेकिन अब मजदूरों को इससे नुकसान की आशंका सताने लगी है। इसका कुफल श्रमिक छंटनी के रूप में हमारे सामने आ सकता है। खासतौर से महिला श्रमिकों की शिकायत है कि उन्हें इस मशीन के जरिए काम करने में असुविधा हो रही है।
सर्व धर्म समभाव की थीम पर संतोष मित्र स्क्वायर दुर्गापूजा
शंकर जालान
कोलकाता। बीते 10-12 सालों से बेहतरीन पंडाल बनाने और कई पुरस्कार जीतने वाली संतोष मित्र स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति इस बार सर्वधर्म समभाव पर दुर्गापूजा आयोजित कर रही है। समिति के प्रमुख प्रदीप घोष ने बताया कि बीते साल यानी 2010 में राइटर्स बिल्डिंग की तर्ज पर पूजा पंडाल बनाया गया था और इससे पहले 2009 में अमेरिका स्थित स्टेचू आॅफ लिबर्टी की आकृति का पंडाल बनाया गया था।
उन्होंने बताया कि इस साल मदन डेकोरेटर्स के सैकड़ों कारीगर इस बार सर्व धर्म समभाव पर पूजा पंडाल बना रहे हैं वहीं बिजली सज्जा देवाशीष इलेक्ट्रिक और प्रतिमा बनाने का काम मोहनवासी रुद्रपाल कर रहे हैं। घोष ने बताया कि पानी का जहाज, बिलासपुर ट्रेन हादसा, कारगिल युद्ध, अक्षरधाम मंदिर, संतोषपुर सड़क दुर्घटना, नैनो कारखाना समेत देश-दुनिया की कई प्रमुख घटनाओं को पंडाल का आकार दिया गया है। उन्होंने बताया कि संतोष मित्र स्क्वायर के पूजा पंडाल का उद्घाटन 30 सितंबर को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन के हाथों होगा। इस मौके पर सांसद दीपा दासमुंशी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट््टाचार्य समेत कई जाने माने लोग बतौर अतिथि मौजूद रहेंगे।
घोष ने बताया कि बड़े बजट की पूजा को साकार रूप देने में डेकोरेटर के एक सौ से ज्यादा करीगर बीते तीन महीने से पंडाल निर्माण में जुटे हैं। उन्होंने बताया कि इस बार 120 फीट चौड़ा, 135 फीट लंबा और 90 फीट ऊंचा पंडाल बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पंडाल निर्माण में प्लाईवुड, लकड़ी, कपड़ा और थर्माकोल का इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनके मुताबिक पूजा पंडाल में आए लोगों के सर्व धर्म समभाव का संदेश लोगों को मिलेगा ही। साथ ही विकास, सौंदर्यीकरण और हरियाली के महत्व को भी समझ पाएंगे। घोष ने बताया कि समिति के बैनर तले 1936 से पूजा आयोजित होती आ रही है, लेकिन पिछले 10-12 सालों से यहां की पूजा ने जो ख्याति अर्जित की है उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि संतोष मित्र स्क्वायर में जितने लोग पूजा देखने आते हैं उतने लोग शायद अन्यत्र नहीं जाते होंगे। यहां के बेकाबू भीड़ को देखते हुए प्रशासन को कई बार रैफ (रेपिड एक्शन फोर्स) तैनात करनी पड़ी है।
घोष ने बताया कि पानी के जहाज के शक्ल वाले पंडाल तो इतना चर्चित हुआ था कि विसर्जन के कई सप्ताह बाद तक लोग पंडाल देखने आते रहे। उसके बाद से समिति ने हर साल एक विशेष थीम को ध्यान में रखकर दर्शनीय व भव्य पंडाल बनाने का बीड़ा उठाया। घोष ने बताया कि इस बार भी प्रतिमा तो परंपरागत ही रहेगी, लेकिन हमारे पंडाल में रखी मूर्ति मूर्तिकार की अद्भुत कल्पना की परिचायक होगी।
बिजली सज्जा के बारे में उन्होंने बताया कि देवाशीष इलेक्ट्रिक के लोग इंद्रधनुषी रोशनी बिखेरने में सक्रिय रूप से लगे हैं। बिजली सज्जा के लिए कोई थीम तो नहीं निर्धारित की गई है, लेकिन जरूर हैं कि देखने वाले को स्तरीय लगेगी। उनके मुताबिक सात अक्तूबर को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। इससे पहले पूजा पंडाल में सिंदूर खेला का आयोजन होगा।
कोलकाता। बीते 10-12 सालों से बेहतरीन पंडाल बनाने और कई पुरस्कार जीतने वाली संतोष मित्र स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति इस बार सर्वधर्म समभाव पर दुर्गापूजा आयोजित कर रही है। समिति के प्रमुख प्रदीप घोष ने बताया कि बीते साल यानी 2010 में राइटर्स बिल्डिंग की तर्ज पर पूजा पंडाल बनाया गया था और इससे पहले 2009 में अमेरिका स्थित स्टेचू आॅफ लिबर्टी की आकृति का पंडाल बनाया गया था।
उन्होंने बताया कि इस साल मदन डेकोरेटर्स के सैकड़ों कारीगर इस बार सर्व धर्म समभाव पर पूजा पंडाल बना रहे हैं वहीं बिजली सज्जा देवाशीष इलेक्ट्रिक और प्रतिमा बनाने का काम मोहनवासी रुद्रपाल कर रहे हैं। घोष ने बताया कि पानी का जहाज, बिलासपुर ट्रेन हादसा, कारगिल युद्ध, अक्षरधाम मंदिर, संतोषपुर सड़क दुर्घटना, नैनो कारखाना समेत देश-दुनिया की कई प्रमुख घटनाओं को पंडाल का आकार दिया गया है। उन्होंने बताया कि संतोष मित्र स्क्वायर के पूजा पंडाल का उद्घाटन 30 सितंबर को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन के हाथों होगा। इस मौके पर सांसद दीपा दासमुंशी, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट््टाचार्य समेत कई जाने माने लोग बतौर अतिथि मौजूद रहेंगे।
घोष ने बताया कि बड़े बजट की पूजा को साकार रूप देने में डेकोरेटर के एक सौ से ज्यादा करीगर बीते तीन महीने से पंडाल निर्माण में जुटे हैं। उन्होंने बताया कि इस बार 120 फीट चौड़ा, 135 फीट लंबा और 90 फीट ऊंचा पंडाल बनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पंडाल निर्माण में प्लाईवुड, लकड़ी, कपड़ा और थर्माकोल का इस्तेमाल किया जा रहा है।
उनके मुताबिक पूजा पंडाल में आए लोगों के सर्व धर्म समभाव का संदेश लोगों को मिलेगा ही। साथ ही विकास, सौंदर्यीकरण और हरियाली के महत्व को भी समझ पाएंगे। घोष ने बताया कि समिति के बैनर तले 1936 से पूजा आयोजित होती आ रही है, लेकिन पिछले 10-12 सालों से यहां की पूजा ने जो ख्याति अर्जित की है उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि संतोष मित्र स्क्वायर में जितने लोग पूजा देखने आते हैं उतने लोग शायद अन्यत्र नहीं जाते होंगे। यहां के बेकाबू भीड़ को देखते हुए प्रशासन को कई बार रैफ (रेपिड एक्शन फोर्स) तैनात करनी पड़ी है।
घोष ने बताया कि पानी के जहाज के शक्ल वाले पंडाल तो इतना चर्चित हुआ था कि विसर्जन के कई सप्ताह बाद तक लोग पंडाल देखने आते रहे। उसके बाद से समिति ने हर साल एक विशेष थीम को ध्यान में रखकर दर्शनीय व भव्य पंडाल बनाने का बीड़ा उठाया। घोष ने बताया कि इस बार भी प्रतिमा तो परंपरागत ही रहेगी, लेकिन हमारे पंडाल में रखी मूर्ति मूर्तिकार की अद्भुत कल्पना की परिचायक होगी।
बिजली सज्जा के बारे में उन्होंने बताया कि देवाशीष इलेक्ट्रिक के लोग इंद्रधनुषी रोशनी बिखेरने में सक्रिय रूप से लगे हैं। बिजली सज्जा के लिए कोई थीम तो नहीं निर्धारित की गई है, लेकिन जरूर हैं कि देखने वाले को स्तरीय लगेगी। उनके मुताबिक सात अक्तूबर को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। इससे पहले पूजा पंडाल में सिंदूर खेला का आयोजन होगा।
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