Friday, December 2, 2011

...और सड़क पर आ जाएंगे खुदरा व्यापारी

शंकर जालान





कांग्रेस की अगुवाई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी देने की मंशा से लाखों खुदरा व्यापारी खफा हैं। इस बाबत व्यापारियों का आरोप है कि संप्रग सरकार ऐसा कर हम जैसे खुदरा व्यापारियों को सड़क पर लाना चाहती है। खुदरा व्यापारियों के मुताबिक एफडीआई को मंजूरी किसी नजरिए से भारत व भारत के खुदरा व्यापारियों के हित में नहीं है, इसलिए अन्य राजनीतिक दलों के अलावा संप्रग की सहयोगी पार्टियां भी इसका विरोध कर रही हैं। वहीं कुछ संगठन इसे हितकर मान रहे हैं।
खुदरा व्यापार से जुड़े एक किराना कारोबारी अमरलाल अग्रवाल ने बताया कि खुदरा बाजार में एफडीआई लागू हो गया तो इस क्षेत्र से स्वरोजगार अर्जित कर रहे कम से कम दस करोड़ भारतीय बेरोजगार हो जाएंगे। विदेशी निवेश से खुदरा बाजार तहस-नहस हो जाएगा। ऐसा होने पर भारतीय बाजार में विदेशी कंपनी अपनी मनमर्जी कीमत वसूलेंगी।
कपड़ा विक्रता दामोदर गनेरीवाल ने कहा कि इस बात की क्या गारंटी है कि विदेशी निवेशक सिर्फ कृषि उत्पाद तक ही अपने-आप को सीमित रखेंगे और दूसरे उत्पादों के व्यवसाय में दखल नहीं देंगे।
ट्रांसपोर्ट कारोबार से जुड़े विक्रांत सिंह ने एफडीआई पर चिंता जताते हुए कहा कि विदेशी निवेशक बड़े पैमाने के व्यवसाय के लिए धीरे-धीरे खुद की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था कर लेंगे रखेंगे। अगर ऐसा हुआ तो आम ट्रांसपोर्ट से जुड़े लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।
चीनी दुकान के मालिक सुरेंद्र चौधरी ने बताया कि वाममोर्चा व भाजपा समेत कई राजनीतिक पार्टियां एफडीआई का विरोध कर रही हैं और फिलहाल इस आंदोलन में व्यापारियों के साथ खड़ी दिख रही हैं, लेकिन हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कहीं राजनीतिक पार्टियों व्यापारियों को हथियार के रूप में तो नहीं इस्तेमाल कर रही है और व्यापारियों को आगे बढ़ाकर खुद राजनीतिक लाभ लेने की फिराक में जुटी हैं।
एक अन्य खुदरा व्यापारियों ने बताया कि वालमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी कंपनियों के आ जाने से उनकी रोजी रोटी के लिए खतरा पैदा हो सकता है, इसलिए एक जुट होकर एफडीआई का विरोध करना चाहिए और संप्रग सरकार को बाध्य करें कि वह इसे लागू न करे।
भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के पूर्वी क्षेत्र का कहना है कि विदेशी पूंजी के आने से कृषि बाजार व कृषि में सुधार होगा। किसानों को भी उनके उत्पादों का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। छोटे और मझोले कारोबारियों को भी इससे फायदा होगा, क्योंकि 30 फीसदी खरीदारी उन्हीं से होनी है। उनका तर्क है कि वेयर हाउसिंग, कोल्ड स्टोरेज और अन्य आपूर्ति श्रृंखला में बड़े पैमाने पर निवेश होगा, जिससे कृषि ढांचागत क्षेत्र के विकास में तेजी आएगी और ठीक इसी समय खाद्य पदार्थ की बर्बादी में कमी आएगी। मर्चेट्स चेंबर आॅफ कामर्स का कहना है कि वैश्विक खुदरा कंपनियां जैसे कि वाल मार्ट, टेस्को, टार्गेट अपने प्रबंध, गुणवत्ता और उचित कीमतों के लिए जानी जाती हैं। भारत में अब उनकी निवेश प्रक्रिया ज्यादा स्थाई रहेगी और वह भारत को दीर्घकालीन बाजार के रूप में देखेंगी और भारतीयों का विश्वास जीतने की कोशिश करेंगी।
फेडरेशन आफ वेस्ट बंगाल ट्रेड एसोसिएशंस का कहना है कि सिंगल ब्रांड में सौ फीसद एफडीआई और मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसद एफडीआई को मंजूरी से छोटे-खुदरा किराना दुकानदारों के अस्तित्व और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। देश की 33 फीसद आबादी जिसका जीवन यापन इसी खुदरा कारोबार के भरोसे है, बुरी तरह प्रभावित होगी। इस खुदरा कारोबार से करीब पांच करोड़ लोग प्रत्यक्ष रूप से और दस करोड़ लोग अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं और इसी खुदरा कारोबार से 40 करोड़ लोगों का जीवन यापन हो रहा है।

Thursday, December 1, 2011

कई सवाल छोड़ गए किशनजी

शंकर जालान





कट्टर माओवादी नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी अब नहीं रहे, लेकिन अपने पीछे एक बहस छोड़ गए। राज्य सरकार कह रही है कि अर्द्ध सैनिक बल व राज्य पुलिस के साझा अभियान के दौरान किशनजी की मौत हो गई। वहीं, माओवादियों के अन्य नेताओं समेत कुछ राजनीति पार्टियों का आरोप है कि सोची-समझी साजिश के तहत किशनजी की हत्या की गई है। राज सरकार व माओवादियों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह कहना फिलहाल मुश्किल है कि किशनजी की मुठभेड़ में मौत हुई है या गिरफ्तारी के बाद उनकी हत्या की गई है। दूसरे शब्दों में कहे तो किशनजी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गए हैं, जिनका जवाब शायद वक्त के गर्भ में छिपा है। सूत्रों के मुताबिक नि:शुल्क किशनजी के खत्म होने से माओवादियों को जोरजार झटका लगा है, बावजूद इसके इस सिलसिले में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी की कोई प्रतिक्रिया न आना संशय पैदा करती है। हालांकि किशनजी नहीं रहे वाली खबर आने के बाद तृणमूल कांग्रेस के नेता शिशिर अधिकारी ने जरूर कहा कि अब एक सप्ताह के भीतर माओवादियों का खात्मा हो जाएगा, लेकिन उनकी इस बात से और किसी नेता ने सहमति नहीं जताई। अलबत्ता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत दस अन्य वीवीआईपी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। इससे साफ होता है कि राज्य सरकार को यह डर है कि माओवादी जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।
जहां, क्रांतिकारी कवि व माओवादियों के शुभचिंतक वरवरा राव ने पश्चिम बंगाल सरकार से माओवादी नेता किशनजी की मौत पर श्वेत-पत्र जारी करने की मांग की है। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने किशनजी की मौत को फर्जी मुठभेड में हत्या का मामला बताते हुए केंद्र सरकार से इस मामले की जांच कराने व स्पष्टीकरण देने की मांग की है। भाकपा नेता गुरुदास दासगुप्ता ने केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम को एक पत्र लिखकर पूछा है कि क्या यह सच नहीं है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य किशनजी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में पश्चिमी मेदिनीपुर में बूरीसोल जंगल में उनकी जघन्य तरीके से हत्या कर दी। माओवादियों के अलावा विभिन्न संगठन से जुड़े लोग व राजनेता इस मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए इसकी जांच की मांग कर रहे है।
वरवरा राव ने कहा-किशनजी के शरीर पर जख्म के कई निशान मिले हैं जो दर्शाते हैं कि मारने के पूर्व उनको काफी यातना दी गई थी। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि पकड़े जाने के 24 घंटे के बाद फर्जी मुठभेड़ में किशनजी को मारा गया। राव ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के नियम के तहत किशनजी की मौत के लिए जिम्मेवार लोगों धारा 302 के अंतर्गत मामला दायर करने की भी मांग की। वरवरा राव ने इस बाबत राज्य सचिवालय में राज्य के गृह सचिव जीडी गौतम को एक ज्ञापन सौंपा।
राव ने कहा कि आंध्र प्रदेश की सरकार ने इसी तरह कई माओवादियों को मार दिया था, लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नियम के मुताबिक मारे गए माओवादियों के शवों को वह सरकार पोस्टमार्टम भी कराती थी। उन्होंने कहा कि आजाद (एक अन्य माओवादी नेता, जो कुछ साल पहले मुठभेड़ में मारा गया था) के शव को भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नियम के तहत दिल्ली स्थित उसके आवास पर भेजा गया था।
उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान सरकार पूर्व के वाममोर्चा सरकार की तरह काम कर रही है। उन्होंने कहा-मैं समझता हूं कि वर्तमान परिस्थिति में फासीवादी, साम्राज्यवादी व सामंतवादी सरकार के साथ बातचीत की जरूरत है।
केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल (सीआरपीएफ) के महानिदेशक विजय कुमार ने उस आरोप को खारिज कर दिया, जिसमें कहा जा रहा है कि फर्जी मुठभेड़ में किशनजी की मौत हुई है। उन्होंने कहा कि यह बेहद साफ और सफल अभियान था, जिसमें हमारे जवानों ने एक मिनट भी नष्ट नहीं किया।
मेदिनीपुर क्षेत्र के पुलिस के डीआईजी विनीत गोयल के मुताबिक यह अभियान पूर्व नियोजित था। खुफिया सूत्रों से हमें खबर मिली थी कि माओवादियों का एक दस्ता इस इलाके में छिपा हुआ है। हमने कार्रवाई की और हमें सफलता मिली। पुलिस सूत्रों ने बताया कि किशनजी के शव के पास एक एके-47 व एक एके-एम राइफलें बरामद की गई थी। समझा जाता है कि एके-47 का इस्तेमाल किशनजी करता था और एके-एम का सुचित्रा। मौके से एक बैग में 82 हजार रुपए नकद के अलावा 160 जीबी की एक हार्ड डिस्क, एक कंबल, पत्र, अहम कागजात, जंगलमहल का नक्शा और दर्दनिवारक दवाएं भी बरामद की गईं।

पश्चिम बंगाल / परिवर्तन के छह महीने

शंकर जालान





पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस की गठजोड़ सरकार ने बीतों दिनों (२० नवंबर २०११) छह महीने पूरे कर लिए। वाममोर्चा को सत्ता से बाहर हुए यानि राज्य में परिवर्तन के २४ महीने पूरे हो गए। कहना गलत न होगा कि इन २४ महीनों में ही लोगों का विश्वास नई सरकार से डगमगाने लगा। जानकारों ने मुताबिक से लोग वाममोर्चा से ३४ साल में उबे थे और बड़ी उम्मीद से तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के हाथों में राज्य के बागडोर सौंपी थी, लेकिन ३४ साल बनाम ३४ हफ्ते तो क्या २४ हफ्ते में ही लोगों को दूध का दूध और पानी का पानी होता दिखने।
ममता के हठ और तुनकमिजाज से जगजाहिर है, लेकिन ऐसा लग रहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे कुछ गंभीर होंगी और जिस तरह से राज्य में परिवर्तन यानी बदलाव आया है ठीक उसी तरह ममता अपनी कार्य प्रणाली में भी बदलाव लाएंगी। बीते छह महीनों के क्रिया-कलाप के मद्देनजर यह कहने में कोई छिछक नहीं होगी कि जिस उम्मीद व आशा से राज्य की जनता ने ममता को सिर-माथे पर बैठाया या यूं कहें कि राज्य के मुख्यमंत्री बनने का मौके दिया था, उन पर लगभग पानी फिर गया है।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि जनता का ममता से इतनी जल्दी मोह भंग होने के पीछ कई ऐसे कारण हैं, जिसे ममता नरज अंदाज कर रही है। मसलन सब कुछ खुद करने की उनकी मंशा, जहां-तहां औचक दौरा, कार्यक्रमों में भारी-भरकम आर्थिक पैकेजों का एलान, अन्य मंत्रियों के काम में दखलअंदाजी, माओवादियों व गोरखालैंड समस्या और तो और थाने में जाकर अपनी समर्थकों को जबरन छुड़ा लाना। ममता भले ही ऐसा कर फूली नहीं समां रही हो, लेकिन जनता को ये कारनामे लोगों को नागवार लग रहे हैं। दबी जुबान से लोग यह कहने लगे हैं कि काहे का परिवर्तन ? कैसा परिवर्तन ? किसका परिवर्तन ?
चुनाव के पहले लेखिका महाश्वेता देवी ममता बनर्जी का ईद-गिर्द दिखती थी और ममता की तारीफ करते नहीं थकती थी। लोगों को लगता था कि एक विद्धान लेखिका खुलकर किसी पार्टी के समर्थक में बोल रही थी, ममता की पार्टी को वोट देने की अपील कर रही है, तो लेखिका की तौर पर उनकी बात माननी चाहिए। मंच में महाश्वेता और ममता के बीच मां- बेटी से रिश्ता नजर आता था, अभी छह महीने भी नहीं बीते कि महाश्वेता ने न केवल ममता के खिलाफ जहर उगलना शुरू किया, बल्कि उन्हें फांसीवाद की संज्ञा भी दे दी। हालांकि इसके एक दिन बाद ही महाश्वेता देवी एक बयान जारी कर कहा - उन्हें ममता सरकार पर पूरा भरोसा है। आम लोगों को भले ही इसमें कोई खास बात न नजग आती हो, लेकिन जानकारों के मुताबिक महाश्वेता देवी द्वारा ममता को फांसीवादी कहना तृणमूल के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं।
ममता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए की बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों में बुनियाद फर्क होता है। राजनीति से जुड़ा व्यक्ति अपने लाभ के लिए गलत का भी साथ दे सकता है, लेकिन अपवाद को छोड़ दे तो बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करते। इस बाबत ममता बनर्जी को सांसद कबीर सुमन का ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही इस बात पर भी गौर करना चाहिए की उनके मंत्रिमंडल में तीन ऐसे मंत्री हें जो पूर्ण रूप से राजनेता नहीं है। राज्य के उच्चा शिक्षा मंत्री ब्रात्स बसु मूल रूप से नाटककार हैं और राजनीति से परे उनकी अलग समझ और पहचान। अमित मित्रा जो फिलहाल वित्त मंत्री की कुर्सी संभाले हुए हैं अर्थ शास्त्री हैं और फिक्की से सिचव रह चुके हैं। इसी तरह वाममोर्चा के शसन काल में राज्य के मुख्य सचिव रहे आईएएस अधिकारी मनीष गुप्त को ममता ने विकास व योजना विभाग की जिम्मेवारी सौंपी हैं। बसु, मित्र व गुप्त ऐसे लोग हैं, जो कभी भी ममता के खिलाफ मुखर हो सकते हैं। रही बात कांग्रेस के मंत्री व विधायकों की तो वे मौके की तलाश हैं। आग लगते ही वे उसमें घी डालने से पीछे नहीं हटेंगे।
ममता अपनी सहयोगी कांग्रेस से खासी नाराज हैं कि उसकी अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने राज्य को भारी आर्थिक तंगी से उबरने के लिए अब तक कोई खास सहायता नहीं दी है। ममता ने कहा कि केंद्र ने अब तक राज्य को एक पैसा भी नहीं दिया है। इससे पहले पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर उन्होंने केंद्र से नाता तोड़ने का भी एलान किया था। लेकिन बाद में अपना पांव पीछे खींचते हुए तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि अब अगर दोबारा कीमतें बढ़ीं तो वह सरकार से बाहर निकल जाएगी।
युवा कांग्रेस अध्यक्ष मौसम नूर और सांसद दीपा दासमुंशी की अगुवाई में निकले एक मौन जुलूस ने ममता को नाराज कर दिया है। कांग्रेस ने राज्य में अपने कार्यकर्ताओं पर बढ़ते हमले व पुलिस की चुप्पी के विरोध में यह जुलूस निकाला था। इससे नाराज ममता ने साफ कह दिया कि उनकी पार्टी यानी तृणमूल कांग्रेस राज्य में सरकार चलाने के लिए कांग्रेस पर निर्भर नहीं है। लेकिन कांग्रेस केंद्र में सरकार चलाने के लिए तृणमूल पर निर्भर है।
दूसरी ओर, कांग्रेस की नाराजगी की अपनी वजहें हैं। हाल में राज्य के कांग्रेस विधायकों व नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली जाकर राहुल गांधी व शकील अहमद से मुलाकात कर शिकायत की कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस के लोग पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य कहते हैं कि हम सरकार-विरोधी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता हमारे लोगों पर हमले कर रहे हैं। हम महज इसी मुद्दे को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि हम राज्य सरकार में साझीदार हैं और यह गठजोड़ जारी रहेगा। लेकिन हमने कहीं ऐसा कोई बांड नहीं भरा है कि कांग्रेस राज्य में अकेले कोई आंदोलन नहीं कर सकती।
लेकिन तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि कांग्रेस के लोग ही राज्य के विभिन्न इलाकों में तृणमूल कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। मालदा के गाजोल में कांग्रेसियों के हाथों पार्टी के एक सदस्य की हत्या का भी आरोप लगाया। ममता का आरोप है कि कांग्रेस अपनी गतिविधियों से माकपा के हाथ मजबूत कर रही है।
दूसरी बड़ी समस्या माओवाद की है। कहना गलत नहीं होगा कि ज्यों-ज्यों दिन व्यतीत होते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और माओवादियों के बीच खटास बढ़ती जा रही है। दूसरे शब्दों में कहे तो अपनी-अपनी जिद के कारण अब ममता और माओवादी खुलकर आमने-सामने आ गए हैं। माओवादियों ने इकतरफा युद्धविराम का उल्लंघन कर और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की हत्या कर राज्य सरकार को कड़े कदम उठाने पर बाध्य कर दिया है। इसी के मद्देनजर राज्य सरकार ने अब उनके खिलाफ अभियान तेज करने का संकेत दिया है। इसी कड़ी में राज्य सरकार ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी मनोज वर्मा को माओवाद विरोधी बल (सीआईएफ) का एसपी बना दिया है। इसबीच, पुलिस ने पुरुलिया जिले में साझा सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए माओवादियों के बरामद किए और पश्चिम मेदिनीपुर जिले के लालगढ़ इलाके में बारूदी सुरंग बनाने में इस्तेमाल होने वाले विष्फोटक भारी मात्रा में जब्त किए।
ममता और माओवादियों के खींचतान के बाबत जानकारों का कहना है कि ममता का यह कहना कि सत्ता में आते ही छह सप्ताह के भीतर माओवादी समस्या का समाधान कर दिया जाएगी, छह सप्ताह तो दूर छह महीना बितने के बाद ममता अपने वायदे को पूरा नहीं कर पाई। इस मामले में ममता लगभग टांय-टांय फिस हो गई।

Friday, November 25, 2011

साधू महान महाराज- गणित और विज्ञान से धर्म व आध्यात्म की ओर

शंकर जालान




कहते हैं धर्म व आध्यात्म बिल्कुल ही विज्ञान और गणित से इतर विषय हैं। बावजूद इसके कुछ प्रतिभाएं ऐसी होती है, जो इन दोनों क्षेत्रों में समान रूप से उपलब्धि हासिल करती हैं। रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित विवेकानंद यूनिवर्सिटी के साधु महान महाराज ऐसी ही प्रतिभाओं में से एक हैं, जिन्हें हाल ही में गणित के लिए देश के सबसे बड़े शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
सीधे-साधे और मिलनसार स्वभाव के साधु महान महाराज का वास्तविक नाम विद्यानाथानंद है। मीडिया, पत्रकार और निज प्रचार से दूर रहने वाले साधु महान महाराज बीते दो दशक से हाइपरबेलिक ज्यामिती और टोपोलॉजी पर काम कर रहे हैं। ४२ वर्षीय महान महाराज की खासियत यह है अंग्रेजी, हिंदी व बांग्ला भाषाओं पर उनका समान अधिकार। वे बिना हिचके फर्राटेदार तरीके से इन तीनों भाषाओं में बात कर सकते हैं।
पुरस्कार मिलने पर कैसा महसूस हो रहा है महाराजजी ? इसके जवाब में उन्होंने शुक्रवार से कहा कि सम्मान मिला यह अच्छी बात है। इससे उत्साह में वृद्धि होती है, लेकिन मुझे इस बात का भी ध्यान रखना है कि पुरस्कार मुझे नहीं मेरी विद्या को मिला है। बातचीत में उन्होंने कहा कि जो लोग पुरस्कार मिलने के बाद ऐसा सोचते हैं कि यह उनका निज का सम्मान है उनकी सोच पर मुझे तरस आता है।
अतीत के बारे में पूछने पर महाराजजी ने कहा मैं वतर्मान में जी रहा हूं और भविष्य की सोच रहा हू। इसलिए भूतकाल यानी अतीत मेरे लिए कोई विशेष मायने नहीं रखता। मैं अतीत के बारे में केवल यह कह सकता हूं कि मेरा जन्म ५ अप्रैल १९६८ को हुआ था। उनके साथियों ने बताया कि स्वामी विद्यानाथानंद ने सेंट जेवियर्स से स्कूली शिक्षा ग्रहण की और कानपुर स्थित आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढाई। तत्पश्चात गणित की तरफ रूझान बढ़ने पर उन्होंने आईआईटी (कोनपुर) से पांच वर्षीय एमएससी का कोर्स किया।
एमएससी करने के बाद महान महाराज पढाने के लिए अमेरिका के ब्रेकले स्थित कैलिफोनिया यूनिवर्सिटी चले गए। वहां पर वे गणित के उच्च विद्धानों के संपर्क में आए। कैलिफोनिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर साधु महाराज भारत लौट आए। स्वदेश लौटकर वे चैन्नई स्थित इंस्टीट्यूट आफ मैथेमेटिकल साइसेंस में कुछ दिनों तक रिसर्च फेलो के पद पर रहे, लेकिन यह उन्हें रास नहीं आया। क्योंकि अमेरिका के ब्रेकले में रहने के दौरान ही वे वहां के रामकृष्ण मठ वेदांत सोसाइटी के संपर्क मं आए और केंद्र के प्रभारी स्वामी अपरानंद से उनकी मुलाकात हुई। स्वामी अपरानंद ने बातचीत के क्रम में साधु महान महाराज को स्वामी विवेकानंद व उनके गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस के आदर्शों, शिक्षा, सेवा आदि के बारे में बताया। परमहंस व विवेकानंद के बारे में जानने के बाद उनका झुकाव आध्यात्म की तरफ हुआ। ब्रेकले से आने के बाद वे न केवल मठवासी बल्कि संन्यासी भी हो गए।
विद्यानाथानंद से महान महाराज बनने पर उनकी नियुक्ति रामकृष्ण मिशन विवेकानंद कॉलेज (चैन्नई) और फिर रामकृष्ण मिशन विद्या मंदिर (बेलूरमठ) में कर दी गई। करीब ६ साल पहले यानी २००५ में रामकृष्ण मिशन विवेकानंद यूनिवर्सिटी शुरू होने के बाद वे इससे जुड़ गए। महान महाराज के प्रयास से ही २००८ में यूनिवर्सिटी में स्कूल आफ मैथेमेटिकल साइंसेस की स्थापना हुई।
साधु महान महाराज के करीबियों के मुताबिक महान महाराज को मिला शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार उनकी वर्षों की सेवा व साधना का प्रतिफल है, जो उन्होंने चुपचाप इस क्षेत्र में किया है।
संस्थान से जुड़े और महान महाराज को नजदीक से जानने वालों ने बताया कि उनकी कई प्रकाशित कृतियां हैं, जिसमें उनके ज्ञान, शोध, लगन व सेवा भाव का परिचय मिलता है। १९९४ से ही वे देश-विदेश की कई ख्यातिप्राप्त शिक्षण व शोध संस्थानों की ओर से विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए बुलाते जाते रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल के किसी व्यक्ति को पहली बार शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से नवाजा गया है। यही नहीं पहली बार किसी साधु ने वैज्ञानिक के रूप में यह सम्मान हासिल किया है।

Friday, November 18, 2011

कोलकाता फिल्मोत्सव-२०११/ इस बार कुछ अलग

शंकर जालान




वैसे तो १९९५ से पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता शहर जिसे देश की सांस्कृतिक राजधानी का भी दर्जा प्राप्त हैं में १९९५ से साल में एक बार फिल्मोत्सव का आयोजन होता आ रहा है। इस गणित से कोलकाता फिल्मोत्सव का यह १७वां साल है, लेकिन कहना गलत नहीं होगा कि संपन्न हुए बीते १६ फिल्मोत्सव की तुलना में इस बार यानी २०११ में (११ से १७ नवंबर) फिल्मोत्सव कुछ बदला-बदला से नजर आया। इस बदलाव पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि उन्होंने फिल्मोत्सव को खास लोगों के साथ-साथ आम लोगों के लिए आयोजित किया है। इस पर उनका तर्क है कि आम अथवा साधारण लोग फिल्मोत्सव का लुफ्त उठा सके, इसीलिए मात्र दस रुपए में फिल्मों की टिकट उपलब्ध कराई गई।
जानकारों का कहना है कि भले ही मुख्यमंत्री अपनी सफाई में कुछ भी कहे या तर्क दें, असलियत में फिल्मोत्सव में कई कमियां रही। मसलन उद्घाघटन समारोह के दौरान ही कुछ खामियां दिखी। जैसे कि पहली दफा उद्घाटन समारोह तय समय से आधा घंटा देर से आरंभ हुआ। प्रेस वालों को भी उद्घाटन समारोह में सामने की बजाए स्टेडियम के ऊपर कोने की एक गैलरी में बिठा दिया गया। मंच के ठीक सामने टॉलीवुड और बॉलीवुड के कलाकारों के अलावा बाहर से आए विदेशी प्रतिनिधि व वाणिज्यिक संस्थाओं के पदाधिकारियों को बिठाया गया। करीब डेढ़ घंटे तक चले उद्घाटन समारोह के दौरान ज्यादातर समय मुख्यमंत्री को लोगों का अभिवादन करते ही देखा गया। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा-नेताजी इंडोर स्टेडियम को उद्घाटन समारोह-स्थल के रूप में इसलिए चुना गया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग फिल्मोत्सव का आनंद ले सके।
17वें कोलकाता फिल्मोत्सव के उद्घाटन के लिए बॉलीवुड के स्टार शाहरुख खान और बीते जमाने की मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर को खास तौर पर आमंत्रित किया गया था। उद्घाटन समारोह में शाहरुख, शर्मिला और ममता बनर्जी के अलावा ढेर सारी मशहूर हस्तियां उपस्थित थीं। उद्घाटन समारोह में ममता बनर्जी ने शाहरुख और शर्मिला को शाल ओढ़ाकर सम्मानित तो किया ही, सुप्रिया देवी, सावित्री चटर्जी, अपर्णा सेन, संध्या राय, हराधन बनर्जी, रंजीत मल्लिक, संदीप राय, गौतम घोष और प्रसेनजीत चटर्जी को भी सम्मानित किया। समारोह में गायिका उषा उत्थुप, गायक नचिकेता, अभिनेता देव, अभिनेत्री देवश्री राय समेत राज्य सरकार के अनेक मंत्री व मेयर शोभन चटर्जी भी उपस्थित थे।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी के आंमत्रण के बावजूद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री व कला प्रेमी बुद्धदेव भट्टाचार्य व जानेमाने फिल्म निदेशक मृणाल सेन समेत कई महशूर हस्तियां उद्घाटन समारोह में नहीं पहुंची। हालांकि बुद्धदेव ने इस आमंत्रण के लिए ममता बनर्जी को धन्यवाद देते हुए समायभाव के कारण उद्घाटन समारोह में शिरकत करने के प्रति असमर्थता जताई है। ममता ने टेलीफोन पर महानगर के पॉम एवेन्यू स्थित बुद्धदेव भट्टाचार्य के आवास पर उनको न्यौता दिया था। इस बाबत चर्चा है कि राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद ममता ने फिल्मोत्सव की परंपरा में भी बदला लाने की कोशिश की। लोगों का मानना है कि ममता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सर्वप्रथम १९९५ में वाममोर्चा के शासनकाल में ज्योति बसु के मुख्यमंत्री व बुद्धदेव भट्टाचार्य के संस्कृति विभाग के मंत्री रहते ही कोलकाता में फिल्मोत्सव की शुरुआत की गई थी।
इस बार आठ दिवसीय फिल्मोत्सव में ५० देशों की १५० फिल्में दिखाई गई। फिल्मों के प्रदर्शन के लिए रवींद्र सदन, नंदन, शिशिर मंच, स्टार थिएटर, न्यू एंपायर समेत कुल ११ सिनेमागृहों का चयन किया गया था। नेताजी इंडोर स्टेडियम में उद्घाटन समारोह के दौरान नीदरलैंड्स की मशहूर फिल्म ‘द मैजिशियंस’ प्रदर्शित की गई।
ममता ने अपने संबोधन में शाहरुख खान को अपना भाई बताते हुए कहा कि कोलकाता को विश्व में नंबर वन बनाने की उनकी योजना है, क्योंकि इस शहर ने एक से एक प्रतिभाशाली लोगों को जन्म दिया है। ममता ने कोलकाता फिल्मोत्सव को ‘ग्रेट फेस्टिवल’ करार देते हुए कहा-यह शहर सत्यजीत राय, तपन सिन्हा, देवकी बोस और न जाने कितने प्रतिभाशाली लोगों का शहर है।
अभिनेता शाहरुख खान ने कहा कि कोलकाता सही मायने में देश की सांस्कृतिक राजधानी है। यहां कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर, सत्यजीत राय, मृणाल सेन, ऋतिक घटक, किशोर कुमार, सचिन देव बर्मन, राहुल देव बर्मन समेत हमारी फिल्मी दुनिया की अनेक हस्तियां रही हैं, जिनसे हमारा सिनेमा आज एक नई दहलीज पर खड़ा है। शाहरुख ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति अपना आभार भी जताया।
अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा-कोलकाता मेरा घर है। मेरा जन्म यहीं हुआ। इसी शहर में मेरा फिल्मी कैरियर शुरू हुआ। आज से 35 वर्ष पहले सत्यजीत राय के साथ मैं सिनेमा से जुड़ी। इस शहर के साथ मेरी अनेक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि भूगोल व राजनीति के दायरे से बाहर ही संस्कृति का विकास हो सकता है। शर्मिला ने कहा- सिनेमा हम लोगों की सांस्कृति जिंदगी की तरह है। इंटरनेट की सुविधा के कारण अब हम विश्व की उल्लेखनीय फिल्मों को डाउनलोड करके देख सकते हैं। सांस्कृतिक दुनिया को समृद्ध करने के लिए अब हमें नई तकनीक को अपने साथ जोड़ना होगा।

Sunday, November 13, 2011

भले आदमी, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री हैं मनमोहन सिंह : आडवाणी

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता, पूर्व उपप्रधानमंत्री और
संभवत: भावी प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का कहना है कि नि:संदेह मनमोहन
सिंह भले आदमी हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है कि वे अब तक के सबसे कमजोर
प्रधानंत्री साबित हुए हैं। अपनी 40 दिन और 7600 किलोमीटर की जन चेतना
यात्रा पर निकले आडवाणी बीते दिनों दो दिवसीय (20-21 अक्तूबर) दौरे पर
कोलकाता पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने एक जनसभा को संबोधित किया और
संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों से मुखातिब हुए। आडवाणी ने अपने व्यस्त
कार्यक्रम के बावजूद शुक्रवार के लिए शंकर जालान से बातचीत की। पेश हैं
चुनिंदा अंश।

- देश की वर्तमान स्थिति पर आपका क्या कहना है ?
0 फिलहाल देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। बेरोजगारी, अशिक्षा और आतंकवाद
से त्रस्त भारत में अब घोटालों की बाढ़ आ गई है। जहां तक मेरी जानकारी और
मेरा अनुभव है आजादी के बाद यानी 1947 से 2011 तक इन 64 सालों में देश का
सबसे बुरा हाल बीते कुछ सालों में हुआ है। बीते दो-ढाई साल के दौरान
उजागर हुए एक के बाद एक घोटालों ने तो देश को आर्थिक संकट में डाला ही,
साथ ही जनता की नजर में राजनेताओं के प्रति शक पैदा कर दिया। आलम यह है
कि जनता समझने लगी -राजनेता माने भ्रष्टाचारी।


- इसके लिए आप किसे दोषी मानते हैं?
0 निश्चित तौर पर कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन
(संप्रग) सरकार और उसकी गलत नीतियों को। मेरा मानना है कि जिस सरकार में
टू जी स्पेट्रम, आदर्श सोसाइटी, राष्ट्र मंडल खेल और एअर इंडिया समेत कई
घोटाले हुए हो उसे प्रगतिशील नहीं विनाशशील सरकार की संज्ञा देनी चाहिए।
मैं फिर कहता हूं कि यह बिल्कुल सही है कि मनमोहन सिंह एक भले आदमी है,
तो यह भी कदापि झूठ नहीं कि सबसे कमजोर प्रधानमंत्री भी। इतिहास गवाह है
जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक नजर दौड़ाएं तो साफ दिखाई देगा कि
सचमुच मनमोहन सिंह कमजोर प्रधानमंत्री हैं।


- जन चेतना यात्रा आपकी छठी यात्रा है, इसका मकसद क्या है?
0 सीधे, साफ, स्पष्ट शब्दों और संक्षित में कहूं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ
देश की जनता को एकजुट करना।


- जन चतेना यात्रा और अपनी पिछली यात्राओं के बारे में कुछ विस्तार से बताएं?
0 देखिए, मैंने पहली यात्रा 1990 में निकाली थी, जिसका मकसद था अयोध्या
में रामलला के मंदिर के लिए लोगों को साथ लेना। सीधे तौर पर वह यात्रा
धर्म से जुड़ी थी और उसे भारी समर्थन भी मिला था। अब मैं देश के लिए 40
दिवसीय जन चेतना यात्रा पर हूं। इस यात्रा को पहली और पिछली सभी यात्राओं
से कहीं ज्यादा समर्थन मिल रहा है। इससे यह साफ हो जाता है कि आम आदमी
भ्रष्टाचार से त्रस्त है। 10 अक्तूबर को शुरू हुई जन चेतना यात्रा 20
नवंबर को समाप्त होगी और इस दौरान मैं 7600 किलोमीटर की दूरी तय करूंगा
और अपनी बात को लेकर देश के गांव-गांव, जिले-जिले में जाऊंगा। मैंने 1997
में स्वर्ण जयंती यात्रा के नाम से जो यात्रा निकाली थी, उसे में अच्छा
समर्थन मिला था।


- 1990 की रामलला यात्रा और 2011 की जन चेनता यात्रा में क्या फर्क है?
0 सबसे बड़ा फर्क तो 21 साल का अंतर है। इस दौरान मेरे राजनीतिक अनुभव में
इजाफा हुआ है। मैं समझ व महसूस कर रहा हूं- धर्म और राष्ट्र के लिए भारत
की जनता भाजपा के साथ है।


- देश का हर पांचवा आदमी अशिक्षित है, ऐसे में आपको लगता है कि लोग काले
धन, घोटाले, भ्रष्टाचार की बात व इसके कुप्रभाव को समझ पाएंगे और आगामी
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे?
0 यह सही है कि देश का औसत आदमी पढ़ा-लिखा नहीं है। बावजूद इसके ज्यादातर
लोग राजनीति समझ रखते हैं। मेरा विश्वास है कि आगामी लोकसभा चुनाव में
जनता कांग्रेस को नकार देगी और भाजपा को एक बार भी मौका।


- ऐसा आप इतने विश्वास से कैसे और किस आधार पर कह रहे हैं?
0 आधार बिल्कुल साफ है। भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक
गठबंधन (राजग) सरकार ने छह सालों में जितना काम किया, उतना कांग्रेस ने
साठ सालों में नहीं किया। अभी भी जिन-जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है,
उनकी स्थिति उन राज्यों से कहीं बेहतर है, जहां कांग्रेस की सरकार है।


- जन चेतना यात्रा का मकसद प्रधानमंत्री की कुर्सी पाना तो नहीं है? क्या
आपको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखा जा सकता है?
0 जन चेतना यात्रा का मकसद प्रधानमंत्री बनना कतई नहीं है। प्रधानमंत्री
वही बनेगा, जिसे पार्टी नेतृत्व चाहेगा। आपको बता दूं 2009 में हुए
लोकसभा चुनाव में मुझे प्रधानमंत्री के रूप में प्रमोट किया गया था, वह
निर्णय पार्टी का ही था और अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह फैसला भी
पार्टी ही करेगी।


- हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक ने अण्णा हजारे की टीम की सदस्य किरण
बेदी को आरोपों के घेरे में खड़ा किया है। आप इस पर क्या कहेंगे?
0 मैं फिलहाल इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहना चाहता।


- अण्णा हजारे के मौन व्रत के पीछे क्या कोई रहस्य है?
0 यह मैं कैसे बता सकता हूं। अनशन पर रहना या मौन रहना व्यक्ति का अपना
अधिकार है। इस पर कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं।


-सुना जा रहा है कि आपकी जन चेतना यात्रा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(आरएसएस) का समर्थन नहीं है, इसमें कितनी सच्चाई है?
0 मैं केवल इतना कहूंगा- यह सब मीडिया की उपज है। मुझे न तो इसकी
जानकारी है और न ही यात्रा के दौरान ऐसा महसूस हो रहा है।


-राइट टू रिकॉल पर आपकी क्या राय है?
0 मैं राइट टू रिकॉल के पक्ष में नहीं हूं। एक-दो छोटे देशों को छोड़कर
बाकी किसी देश ने इसे व्यवहार में नहीं लाया। मेरा मानना है कि भारत जैसे
विशाल देश में इसे लागू करना अस्थिरता को जन्म देना है। हां, मैं हर हाल
में चुनाव सुधार के पक्ष में हूं। विशेष कर चुनावों में इस्तेमाल किए जा
रहे धन बल को रोकने के संदर्भ में।


- कभी राजग के साथ रही ममता बनर्जी फिलहाल संप्रग के साथ है। राज्य में
हाल में हुए विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा को हराकर सत्ता पर काबिज हुई
हैं। आप पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन को किस नजर से देखते हैं?
0 मैं मानता और जानता था कि ममता बनर्जी स्पष्टवादी हैं। उन्हें जो
नागवार लगता है वे साफ-साफ कर देती हैं, लेकिन संप्रग सरकार के कार्यकाल
में हो रहे घोटालों पर उनकी चुप्पी संदेहजनक है। जहां तक परिवर्तन की बात
है मुझे प्रदेश स्तर के नेताओं से पता चला है कि केवल सत्ता बदली है
स्थिति नहीं।


- आप भ्रष्टाचार के खिलाफ जन चेतना यात्रा पर हैं और आपकी पार्टी के नेता
व कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में। यह
विरोधाभास क्यों?
0 देखिए, भाजपा कभी भी भ्रष्टाचार के पक्ष में नहीं रही। यदुरप्पा के
खिलाफ जैसे ही लोकायुक्त की रिपोर्ट आई पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पद
छोड़ने को कह दिया। आगे की जांच जारी है।

बढ़ी दूरियां

शंकर जालान



राज्य में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान या यूं कहे कि
वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल के आखिरी क्षणों में जिन बुद्धिजीवियों ने
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का भरपूर समर्थन किया था। अब उन
बुद्धिजीवियों से ममता की दूरियां बढ़ने लगी है। सूत्रों की माने तो
माओवादी प्रभावित जिलों पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा से साझा
सुरक्षा बलों को हटाने में ममता की नाकामी और प्रमुख ट्रेड यूनियन नेता
प्रफुल्ल चक्रवर्ती की गिरफ्तारी समेत कई मुद्दों से बुद्धिजीवी ममता से
खासे नाराज हैं। इनमें लेखिका महाश्वेता देवी सबसे ऊपर हैं, जो कभी ममता
की तारीफों का पुल बांधा करती थी। बतौर महाश्वेता देवी- मुख्यमंत्री को
यह समझना चाहिए कि जनता के विश्वास पर खरा उतरने के लिए चुनाव से पहले
किए गए वादों को पूरा करना कितना जरूरी है। ट्रेड यूनियन नेता प्रफु ल्ल
चक्रवर्ती की गिरफ्तारी को भी बुद्धिजीवी हजम नहीं कर पा रहे हैं। शिल्पी
सांस्कृतिक कर्मी बुद्धिजीवी मंच के पदाधिकारियों का कहना है कि इस
गिरफ्तारी से उनको झटका लगा है। मंच गिरफ्तारी की निंदा करता है। मंच की
मांग है प्रफुल्ल के खिलाफ दायर तमाम झूठे मामलों को तुरंत वापस लिया
जाया।
वहीं कुछ लोगों का कहना है कि ममता की कार्य प्रणाली के बारे में अभी कोई
टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, लेकिन अगर यही हालत रही तो समर्थन कमजोर
जरूर हो जाएगा। कोई भी सरकार अलोकतांत्रिक फैसले नहीं ले सकती। सरकार को
ऐसे फैसलों से बचना चाहिए।