विधानसभा चुनाव-2011
शंकर जालान
पश्चिम बंगाल में अप्रैल और मई में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों व पार्टी समर्थकों में खासा उत्साह है। वहीं, महानगर के विकलांगों और किन्नरों में इस चुनाव को लेकर कोई उत्साह नहीं है। उन्हें हर चुनाव की तरह इस बार भी फिर छले जाने का अंदेशा है। विकलांगों व किन्नरों का नाम मतदाता सूची में दर्ज होने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार चुनाव के बाद इन्हें भूल जाते हैं। क्या आपको मालूम हो कि अगले महीने राजय में विधानसभा का चुनाव होने वाला है? चुनाव को लेकर आप क्या सोचते हैं? किस उम्मीदवार को जीताना चाहते है? किसकी सरकार चाहते है? वोट मांगने आए नेताओं से क्या गुजारिश करना चाहते हैं? इन सवालों का उत्तर जानने के लिए जब शहर के कई विकलांगों व किन्नरों से बातचीत की गई तो इन लोगों ने कहा कि चुनाव को लेकर उनमें कोई उत्साह नहीं है। हर दल के उम्मीदवार चुनाव के पहले वोट मांगने आते हैं और वोट देने के बदले बड़े-बड़े आश्वासन दे जाते हैं, लेकिन चुनाव का नतीजा आने के बाद जीतने वाला उम्मीदवार अन्य कामों में व्यस्त हो जाता है व हारे हुए के हाथ में कुछ नहीं होता और हम जैसे लोग चुनाव के नाम पर फिर से छले जाते हैं।
जदूलाल मल्लिक लेन का निवासी 32 वर्षीय विकलांग रामकुमार भट््ट ने बताया कि विभिन्न चुनाव मौके पर आए वोट मांगने आए विभिन्न दलों के उम्मीदवार यहीं कहते हैं कि जीतने के बाद हम सदन में विकलांगों को विशेष सुविधा देने की बात उठाएंगे, लेकिन हकीकत में होता कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि करीब 14 साल पहले सड़क दुर्घटना में मेरा एक पैर जाता रहा और तब से मैं बैशाखी के सहारेचल रहा हूं। भट््ट ने कहा विकलांग का कार्ड बनाने के लिए मैंने न जाने कितनी बार स्थानीय पार्षद, विधायक और सांसद के कार्यालय का चक्कर लगाए, लेकिन आज तक मेरा कार्ड नहीं बन पाया। उन्होंने कहा कि हमें किसी दल के किसी उम्मीदवार से कुछ नहीं कहना है, क्योंकि चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद नेताओं के पास हम जैसे विकलांग और गरीब लोगों के लिए सोचने का वक्त ही कहां रह जाता है। भट््ट ने बताया कि इस चुनाव को लेकर उनके मन में कोई उत्साह नहीं है और न ही किसी दल से कोई उम्मीद।
रवींद्र सरणी के रहने वाले संजय अग्रवाल, मदन चटर्जी लेन के रहने वाले अनूप पोद्दार, सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट के अतुल दोषी, काली कृष्ण टैगोर स्ट्रीट के चंद्रशेखर शर्मा समेत कई विकलांगों ने भी कहा कि चुनाव का उनके जीवन में कोई महत्त्व नहीं रह गया है।
इसी तरह पार्वती घोष लेन की रहने वाले किन्नर रमा बाई, तुलसी बाई, कौशल्या बाई, रजनी बाई समेत कई किन्नरों से लोकसभा चुनाव के बारे में पूछने पर पहले तो इन लोगों ने कुछ भी कहने से मना किया। काफी पूछने पर इन किन्नरों ने सामूहिक रूप से कहा कि हमें चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। कोई भी नेता हमारे लिए कुछ करने वाला नहीं है। सभी लोग हमें गलत नजर से देखते हैं। यह पूछ जाने पर कि आप लोग चुनाव शब्द से ही नाराज हो रहे है और मध्य प्रदेश में आप ही के समाज की शबनम मौसी चुनाव लड़ी भी है और जीती भी है। इसके अलावा देश भर में कई किन्नरों ने चुनाव में भाग्य आजमाया है। इसके जवाब में इन किन्नरों ने कहा कि शबनम मौसी के चुनाव जीतने के पहले देश भर में किन्नरों की जो स्थिति थी उसके बाद भी हम लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इन लोगों ने कहा कि जब भगवान ने हमारे साथ मजाक किया है तो किसी नेता की क्या मजाल कि वे हमारी स्थिति सुधार सके।
Monday, March 21, 2011
...और उन्हें किसी पार्टी ने नहीं दिया टिकट
विधानसभा चुनाव-2011
शंकर जालान
अपने मुंह मिया मीठ्ठू यानि निजी प्रचार को महत्व देने वाले तृणमूल कांग्रेस के विधायक दिनेश बजाज को किसी पार्टी का टिकट नहीं मिल सका। बीते चुनाव में जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर महज छह सौ से अधिक वोटों से जीतने वाले बजाज की पार्टी विरोधी और प्रचार लोभी नीति के कारण तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इस बार उन्हें टिकट देना उचिच नहीं समझा। सूत्रों के मुताबिक बीते पांच साल के दौरान कई बार बजाज ने पार्टी के दिशा-निर्देश की अनदेखी करते हुए अपनी इच्च्छा, प्रचार, सुविधा और लाभ को ध्यान में रखते हुए काम किया। इसे से खफा ममता बनर्जी ने इस बार उन्हें टिकट से दूर रखा। सूत्रों ने बताया कि बजाज को यह पहले ही आभास हो चुका था कि उनकी करतूतों की जानकारी ममता बनर्जी को है, लिहाजा इस बार उन्हें तृणमूल कांग्रेस के टिकट से वंचित रहना पड़ा सकता है। इसलिए लिए उन्होंने टिकट मिलने से लालसा से वाममोर्चा और भाजपा से नजदीकियां बढ़ाई, लेकिन वाममोर्चा ने जोड़ासांकू से जानकी सिंह को उम्मीदवार बनाकर उनके (बजाज) के मंसूबों पर पानी फेर दिया। वहीं, भाजपा ने भी लगभग यहां से मीना देवी पुरोहित का नाम तय कर लिया है। हालांकि इस बाबत आधिकारिक जानकारी नहीं है, लेकिन भाजपा सूत्रों ने मुताबिक भाजपा ने जोड़ासांकू से मीनादेवी पुरोहित को उम्मीदवार बनाने के मन बना लिया है।
सूत्रों के मुताबिक, विरोधी दलों से लगातार संपर्क में रहने और निजी प्रचार के उद्देश्य से लगाए गए बड़े-बड़े होर्डिंग की वजह से बजाज को टिकट नहीं मिल पाया। स्थानीय लोगों ने आश्चर्य जताते हुए बताया कि लोकप्रिय, जनप्रिय कहलाने वाले विधायक बजाज के समर्थन क्यों ने एक भी व्यक्ति या सगंठन आगे नहीं आया कि बजाज को टिकट मिलना चाहिए या ममता बनर्जी को वर्तमान विधायक को टिकट देना चाहिए। इसे से पता चल जाता है कि आखिरकार विधायक कितने लोकप्रिय थे?
शंकर जालान
अपने मुंह मिया मीठ्ठू यानि निजी प्रचार को महत्व देने वाले तृणमूल कांग्रेस के विधायक दिनेश बजाज को किसी पार्टी का टिकट नहीं मिल सका। बीते चुनाव में जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर महज छह सौ से अधिक वोटों से जीतने वाले बजाज की पार्टी विरोधी और प्रचार लोभी नीति के कारण तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इस बार उन्हें टिकट देना उचिच नहीं समझा। सूत्रों के मुताबिक बीते पांच साल के दौरान कई बार बजाज ने पार्टी के दिशा-निर्देश की अनदेखी करते हुए अपनी इच्च्छा, प्रचार, सुविधा और लाभ को ध्यान में रखते हुए काम किया। इसे से खफा ममता बनर्जी ने इस बार उन्हें टिकट से दूर रखा। सूत्रों ने बताया कि बजाज को यह पहले ही आभास हो चुका था कि उनकी करतूतों की जानकारी ममता बनर्जी को है, लिहाजा इस बार उन्हें तृणमूल कांग्रेस के टिकट से वंचित रहना पड़ा सकता है। इसलिए लिए उन्होंने टिकट मिलने से लालसा से वाममोर्चा और भाजपा से नजदीकियां बढ़ाई, लेकिन वाममोर्चा ने जोड़ासांकू से जानकी सिंह को उम्मीदवार बनाकर उनके (बजाज) के मंसूबों पर पानी फेर दिया। वहीं, भाजपा ने भी लगभग यहां से मीना देवी पुरोहित का नाम तय कर लिया है। हालांकि इस बाबत आधिकारिक जानकारी नहीं है, लेकिन भाजपा सूत्रों ने मुताबिक भाजपा ने जोड़ासांकू से मीनादेवी पुरोहित को उम्मीदवार बनाने के मन बना लिया है।
सूत्रों के मुताबिक, विरोधी दलों से लगातार संपर्क में रहने और निजी प्रचार के उद्देश्य से लगाए गए बड़े-बड़े होर्डिंग की वजह से बजाज को टिकट नहीं मिल पाया। स्थानीय लोगों ने आश्चर्य जताते हुए बताया कि लोकप्रिय, जनप्रिय कहलाने वाले विधायक बजाज के समर्थन क्यों ने एक भी व्यक्ति या सगंठन आगे नहीं आया कि बजाज को टिकट मिलना चाहिए या ममता बनर्जी को वर्तमान विधायक को टिकट देना चाहिए। इसे से पता चल जाता है कि आखिरकार विधायक कितने लोकप्रिय थे?
Sunday, March 20, 2011
किसी दल से कोई उम्मीद नहीं है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को
विधानसभा चुनाव-2011
शंकर जालान
विधानसभा चुनाव के मौके पर वाममोर्चा व तृणमूल कांग्रेस समेक अन्य राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार हर वर्ग के लोगों से उनके पक्ष में वोट देने की अपील कर रहे हैं। इसके यह भी कह रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो विकास की रफ्तार तेज होगी और राज्य में शांति बहाल की जाएगी। उद्योग स्थापित कर बेरोजगारी कम करने का प्रयास किया जाएगा। शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा। मजदूरों की स्थिति सुधारी जाएगी। उम्मीदवार इस अब मतदाताओं को रिझाने में जुटे हुए हैं। कुछ हद तक वे कई वर्ग के लोगों को मनाने में सफल भी हो जाते हैं, लेकिन मजदूरों को इस बात की शिकायत है कि चुनाव के बाद उम्मीदवार उन्हें भूल जाते हैं। कई मजदूरों का कहना है कि माकपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या भाजपा की झोली में उनका वोट जाने के बावजूद चुनाव खत्म होने के बाद किसी राजनीतिक दल या विधायक को हमारी याद नहीं आती। इस सिलसिले में होली और रविवार की छुट््टी के मद्देनजर कई मजदूरों से बात की गई तो लगभग सभी ने कहा कि हमें किसी पार्टी या उम्मीदवार से कोई खास उम्मीद नहीं है। सभी महज वोट के लिए हमारा इस्तेमाल करते हैं। अगर सच कहे तो हमारी भलाई के लिए कोई दल ईमानदारी से पहल नहीं करता है। चुनाव के वक्त जरूर बड़े-बड़े आश्वासन देते हैं, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद हमारी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं। पोस्ता बाजार स्थित चीनी की दुकान में काम करने वाले 55 वर्षीय रघुनाथ यादव ने कहा कि किसी जुलूस में जाना हो या सभा में शामिल होना हो या झंडा पकड़ना हो तो हर पार्टी को हमारी याद सबसे पहले आती है, लेकिन जहां हमारे हक के लिए जायज बात करने का मौका आता है, तो ज्यादातर पार्टियां या नेता हमारे हक को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अगले महीने की 27 तारीख को महानगर में चुनाव है। चुनाव के मद्देनजर अभी हर रोज किसी न किसी पार्टी के समर्थक और उम्मीदवार वोट मांगने की अपील लेकर आ रहे हैं और बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, लेकिन पिछले चुनाव के अनुभव यह बताते हैं कि कोई भी पार्टी हो या उम्मीदवार उनकी सुनने वाले नहीं है। नूतन बाजार में नींबू की दुकान में काम करने वाले 38 वर्षीय उदय कुमार ने बताया कि बीतो दो-तीन दिनों हर रोज शाम के वक्त किसी न किसी पार्टी की चुनावी सभा में मजबूरीवश जाना पड़ा रहा है और लगता है यह सिलसिला चुनाव तक चलेगा। उदय कुमार के मुताबिक, पार्टी के स्थानीय नेता दोपहर के वक्त ही आकर मालिक से यह कह जाते हैं कि शाम के वक्त अमुक स्थान पर चुनावी सभा है मजदूरों को भेजना है और मालिक उन्हें सहर्ष स्वीकृत दे देते हैं। उन्होंने बताया कि दिनभर दुकानदारी करो औैर शाम के वक्त पार्टी की चुनावी सभा में शामिल हो। उन्होंने बताया कि सुबह से दोपहर बाद तक कड़ी मेहनत करो और शाम वक्त जब जरा सुस्ताने का मौका मिलता तब मालिक के कहे मुताबिक, सभा में शामिल हो जाओ। उन्होंने बताया कि मन तो तब खराब होता है जब अपने काम के लिए या किसी से मिलने-झुलने के लिए मालिक से छुट््टी मांगने पर अनुमति नहीं मिलती और कहते हैं कि दुकान में कौन रहेगा, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के कहने पर वे तुरंत भेज देते हैं। इसी तरह तिरट््टी बाजार में काम करने वाले सत्यनारायण, राजाकटरा के सुंदरलाल, मछुआ बाजार में काम करने वाले परम लाल ने भी शिकायात भरे लहजे में कहा कि काम कराने के वक्त हर पार्टियों को हमारी याद सबसे पहले आती है, लेकिन जब कभी हमारे काम या हित की बात आती है तो पार्टियों के लोग बहानेबाजी करने लगते हैं। मालूम हो कि विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की सूची घोषित होते ही वाममोर्चा समेत तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया है। होली के दिन भी वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार प्रचार करते नजर आए। मालिकतला विधानसभा क्षेत्र से माकपा उम्मीदवार रूपा बागची, बेहला पूर्व से तृणमूल कांग्रेस के शोभन चटर्जी समेत कई अन्य उम्मीदवारों को रविवार को प्रचार करते देखा गया।
शंकर जालान
विधानसभा चुनाव के मौके पर वाममोर्चा व तृणमूल कांग्रेस समेक अन्य राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार हर वर्ग के लोगों से उनके पक्ष में वोट देने की अपील कर रहे हैं। इसके यह भी कह रहे हैं कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो विकास की रफ्तार तेज होगी और राज्य में शांति बहाल की जाएगी। उद्योग स्थापित कर बेरोजगारी कम करने का प्रयास किया जाएगा। शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा। मजदूरों की स्थिति सुधारी जाएगी। उम्मीदवार इस अब मतदाताओं को रिझाने में जुटे हुए हैं। कुछ हद तक वे कई वर्ग के लोगों को मनाने में सफल भी हो जाते हैं, लेकिन मजदूरों को इस बात की शिकायत है कि चुनाव के बाद उम्मीदवार उन्हें भूल जाते हैं। कई मजदूरों का कहना है कि माकपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या भाजपा की झोली में उनका वोट जाने के बावजूद चुनाव खत्म होने के बाद किसी राजनीतिक दल या विधायक को हमारी याद नहीं आती। इस सिलसिले में होली और रविवार की छुट््टी के मद्देनजर कई मजदूरों से बात की गई तो लगभग सभी ने कहा कि हमें किसी पार्टी या उम्मीदवार से कोई खास उम्मीद नहीं है। सभी महज वोट के लिए हमारा इस्तेमाल करते हैं। अगर सच कहे तो हमारी भलाई के लिए कोई दल ईमानदारी से पहल नहीं करता है। चुनाव के वक्त जरूर बड़े-बड़े आश्वासन देते हैं, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद हमारी खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं। पोस्ता बाजार स्थित चीनी की दुकान में काम करने वाले 55 वर्षीय रघुनाथ यादव ने कहा कि किसी जुलूस में जाना हो या सभा में शामिल होना हो या झंडा पकड़ना हो तो हर पार्टी को हमारी याद सबसे पहले आती है, लेकिन जहां हमारे हक के लिए जायज बात करने का मौका आता है, तो ज्यादातर पार्टियां या नेता हमारे हक को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अगले महीने की 27 तारीख को महानगर में चुनाव है। चुनाव के मद्देनजर अभी हर रोज किसी न किसी पार्टी के समर्थक और उम्मीदवार वोट मांगने की अपील लेकर आ रहे हैं और बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, लेकिन पिछले चुनाव के अनुभव यह बताते हैं कि कोई भी पार्टी हो या उम्मीदवार उनकी सुनने वाले नहीं है। नूतन बाजार में नींबू की दुकान में काम करने वाले 38 वर्षीय उदय कुमार ने बताया कि बीतो दो-तीन दिनों हर रोज शाम के वक्त किसी न किसी पार्टी की चुनावी सभा में मजबूरीवश जाना पड़ा रहा है और लगता है यह सिलसिला चुनाव तक चलेगा। उदय कुमार के मुताबिक, पार्टी के स्थानीय नेता दोपहर के वक्त ही आकर मालिक से यह कह जाते हैं कि शाम के वक्त अमुक स्थान पर चुनावी सभा है मजदूरों को भेजना है और मालिक उन्हें सहर्ष स्वीकृत दे देते हैं। उन्होंने बताया कि दिनभर दुकानदारी करो औैर शाम के वक्त पार्टी की चुनावी सभा में शामिल हो। उन्होंने बताया कि सुबह से दोपहर बाद तक कड़ी मेहनत करो और शाम वक्त जब जरा सुस्ताने का मौका मिलता तब मालिक के कहे मुताबिक, सभा में शामिल हो जाओ। उन्होंने बताया कि मन तो तब खराब होता है जब अपने काम के लिए या किसी से मिलने-झुलने के लिए मालिक से छुट््टी मांगने पर अनुमति नहीं मिलती और कहते हैं कि दुकान में कौन रहेगा, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के कहने पर वे तुरंत भेज देते हैं। इसी तरह तिरट््टी बाजार में काम करने वाले सत्यनारायण, राजाकटरा के सुंदरलाल, मछुआ बाजार में काम करने वाले परम लाल ने भी शिकायात भरे लहजे में कहा कि काम कराने के वक्त हर पार्टियों को हमारी याद सबसे पहले आती है, लेकिन जब कभी हमारे काम या हित की बात आती है तो पार्टियों के लोग बहानेबाजी करने लगते हैं। मालूम हो कि विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की सूची घोषित होते ही वाममोर्चा समेत तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों ने जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया है। होली के दिन भी वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार प्रचार करते नजर आए। मालिकतला विधानसभा क्षेत्र से माकपा उम्मीदवार रूपा बागची, बेहला पूर्व से तृणमूल कांग्रेस के शोभन चटर्जी समेत कई अन्य उम्मीदवारों को रविवार को प्रचार करते देखा गया।
Wednesday, March 16, 2011
...और सबकी नजर अब जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र पर
शंकर जालानकोलकाता, 16 मार्च। पश्चिम बंगाल में अप्रैल-मई में होने वाला विधानसभा चुनाव इस बार कई मायने में अहम है। एक ओर जहां तृणमूल कांग्रेस परिवर्तन का दावा कर रही है। वहीं, वाममोर्चा विकास के मुद्दे की उम्मीद के साथ की आठवीं बार फिर राइटर्स पर उनका कब्जा करने की बात कह रहा है। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच इस बार के विधानसभा में परिसीमन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूं तो परिसीमन का असर पूरे राज्य और लगभग सभी 294 विधानसभा सीटों पर पड़ा है, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजधानी यानी कोलकाता के हृदयस्थल वृहत्तर बड़ाबाजार में इसका खासा असर पड़ा है। 2006 में हुए विधानसभा चुनाव में वृहत्तर बड़ाबाजार में जोड़ाबागान, जोड़ासांकू और बड़ाबाजार नामक तीन विधानसभा क्षेत्र थे, लेकिन इस बार जोड़ाबागान और बड़ाबाजार विधानसभा सीटें परिसीमन की भेंट चढ गई है। लिहाजा केवल जोड़ासांकू क्षेत्र रह गया है। बीते विधानसभा चुनाव में जोड़ाबागान से माकपा के परिमल विश्वास, जोड़ासांकू से तृणमूल कांग्रेस दिनेश बजाज और बड़ाबाजार से वाममोर्चा समर्थित राजद से मोहम्मद सोहराब ने जीत दर्ज की थी। इस बार बड़ाबाजार और जोड़ाबागान नामक कोई विधानसभा सीट या क्षेत्र नहीं है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वृहत्तर बड़ाबाजार का नेतृत्व, विकास और विधानसभा में इस इलाके की समस्याओं को उठाने की जिम्मेवारी जोड़ासांकू के विधायक की होगी। इसलिए भाजपा हो या कांग्रेस या फिर तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य राजनीति दल भी इस क्षेत्र के उम्मीदवार का नाम एलान करने के पहले अनुकूल-प्रतिकुल स्थिति को भांपना चाहते हैं। हालांकि इन सबसे अलग माकपा ने यहां से न केवल जानकी सिंह को उम्मीदवार बनाने की घोषणा की है, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके (जानकी सिंह) के पक्ष पर प्रचार भी शुरू कर दिया है।तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच गठबंधन क्या मोड़ लेगा यह कहना फिलहाल मुश्किल है। समाचार लिखे जाने तक इस सिलसिले में स्थिति साफ नहीं हो पाई थी। भाजपा भी फिलहाल जोड़ासांकू क्षेत्र के उम्मीदवार के बारे में अभी पत्ता खोलने के मूड़ में नहीं है। यहां इतना जरूर माना जा रहा है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठबंधन हो या नहीं, तृणमूल कांग्रेस जोड़ासांकू सीट अपने कोटे में ही रखेगी और लगभग यह भी तय है कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी की मंशा वर्तमान विधायक दिनेश बजाज को इस बार टिकट देने की नहीं है। इस बारे में तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का कहना है कि बीते पांच सालों के दौरान वर्तमान विधायक बजाज ने निजी प्रचार को महत्त्व देने के साथ-साथ कई ऐसे कार्यों को अंजाम दिया है, जो पार्टी के दिशा-निर्देश के मुताबिक उन्हें नहीं करने चाहिए थे। सूत्रों का यह भी कहना है कि ममता बनर्जी काफी पहले ही बजाज को पार्टी से निकाल सकती थीं, लेकिन विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के विधायकों की तकनीकी संख्या ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। सूत्रों ने बताया कि बजाज को यह आभास हो गया था कि तृणमूल कांग्रेस से इस बार उन्हें टिकट नहीं मिलने वाला है, इसलिए उन्होंने वाममोर्चा से संपर्क बढ़ाया था, लेकिन वाममोर्चा को वह घटना याद थी, जब दिेनेश बजाज के पिता सत्यनारायण बजाज को 2001 में फारवर्ड ब्लॉक से उम्मीदवार बना दिया गया था और इसके बाद उन्होंने पाला बदल लिया और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इसी के मद्देनजर वोममार्चा ने बजाज के संपर्क गंभीरता से नहीं लिया और ममता बनर्जी को बजाज की करतूत का एक और सुराग मिल गया। सुना जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस का एक वर्ग यहां से काशीपुर के विधायक तारक बनर्जी को उम्मीदवार बनाना चाहता है। वहीं पार्टी का एक वर्ग वार्ड नंबर 44 की पार्षद रेहाना खातून को। पार्टी सूत्रों के मुताबिक नि:संदेह तारक बनर्जी रेहाना खातून से वरिष्ठ और अनुभवी हैं, लेकिन अगर बात जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र की कि जाए गए बनर्जी की तुलना में रेहाना खातून भारी पड़ेंगी। हालांकि इस बाबत अंतिम फैसला पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को लेना है। सूत्रों ने बताया कि माकपा ने महिला (जानकी सिंह) को उम्मीदवार बनाया है। सुना जा रहा है कि भाजपा भी यहां से महिला को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। इस बाबत वार्ड नंबर 22 की पार्षद व पूर्व डिप्टीमेयर मीनादेवी पुरोहित के नाम पर विचार-विमर्श हो रहा है। इसीलिए ममता बनर्जी भी यहां से महिला उम्मीदवार खड़ा करना चाहती है। इस गणित से भी रेहाना खातून के दावेदारी बनती है।चर्चा यह भी कि हाल ही में राजद से नाता तोड़ जनता दल (यू) में शमिल हुए बड़ाबाजार के वर्तमान विधायक मोहम्मद सोहराब के लिए भाजपा यह सीट छोड़ सकती है। इस बाबत भाजपा सूत्रों का कहना है कि बिहार में भाजपा और जनता दल (यू) साथ-साथ है तो बंगाल में होने में क्या हर्ज है। वहीं, सूत्रों ने यह भी बताया कि तृणमूल कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने की चर्चा से मायूस दिनेश बजाज ने वाममोर्चा से संपर्क बढ़ाया था, लेकिन वहां से सकारात्मक उत्तर नहीं मिलने पर अब उनका ध्यान भाजपा की तरफ है। इस बाबत प्रदेश भाजपा के नेता रितेश तिवारी से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि आज तक इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। हां हो सकता है कि कल यह बात सच साबित हो जाए।
Tuesday, March 15, 2011
आंस मूंद कर वोट नहीं डालना चाहते नए मतदाता
शंकर जालान कोलकाता, राज्य में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक ओर जहां विभिन्न राजनीतिक पार्टियों अपनी रणनीति बनाने में जुटी हैं। दूसरी ओर, यह चर्चा शबाब पर है कि चुनावी नतीजों का ऊंट इस बार किस करवट बैठेगा। हालांकि समाचार लिखे जाने तक वाममोर्चा ने 292 और भाजपा ने 106 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी थी, जाकि कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के गठांधन पर सशंय बरकरार था। इस बीच, जो लोग पहली बार वोट डालेंगे यानी पहली बार मताधिकार का प्रयोग करने वाले नए मतदाताओं का कहना है कि वे आंख मूंद कर वोट डालने के पक्ष में नहीं हैं। इस बाबत जोड़ासांकू, श्यामपुकुर, काशीपुर और चौरंगी विधानसभा क्षेत्र के कई नए मतदाताओं से बातचीत की गई तो इन लोगों ने सपाट शब्दों में उत्तर दिया कि वे अपने मताधिकार का प्रयोग करने से पहले भली-भांति सोच-विचार करेंगे। पिता, भाई, मां और भाभी तरह किसी के कहने या दवाब में आकर वोट नहीं डालेंगे। इन लोगों के चेहरे पर मतदाता बनने की खुशी साफ झलक रही थी, लेकिन नए मतदाताओं इस दिशा में भी सचेत थे कि उनका वोट गलत पार्टी या गलत उम्मीदवार के पक्ष में न चला जाए। जोड़ासांकू और श्यामपुकुर विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न स्कूलों के उन छात्र-छात्राओं से जो पहली बार मतदान का करेंगे से पूछा गया कि कैसा उम्मीदवार चाहते हैं? आपकी नजर में एक विधायक की क्या प्राथमिकता होनी चाहिए? इसके जवाब में जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र के नए मतदाताओं अरविंद अग्रवाल (सनातन धर्म विद्यालय), राजीव तिवारी (कमला शिक्षा सदन), रश्मि दम्मानी (सावित्री पाठशाला) और अनूप सोनकर (श्री डीडू माहेश्वरी पंचायत विद्यालय), श्यामपुकुर विधानसभा क्षेत्र के अमित शर्मा (एसबी मार्डन हाई स्कूल), श्वाती सिंह (बालकृष्ण विठ्ठलनाथ बालिका विद्यालय), सुब्रत भट्टाचार्य (श्यामबाजार एबी स्कूल) और तरुण दास (शलेंद्र सरकार स्कूल) ने कहा कि जीत-हार बाद की बात है। सबसे पहले हर पार्टियों को साफ-सुथरी छवि वाले, कर्मठ और ईमानदार लोगों को टिकट देना चाहिए। अगर हर राजनीतिक पार्टी अपनी इस जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाती है तो फिर मतदाताओं के लिए बहुत कुछ साफ हो जाता है। इन लोगों ने कहा कि उम्मीदवार ऐसा होना चाहिए, जिसपर आम आदमी अंगूली नहीं उठा सके। रही बात चुनाव जीतकर विधायक बनने की तो हम ऐसे उम्मीदवार को जीताना पसंद करेंगे, जो बाहुबलि नहीं बुद्धिबलि हो। लोगों के सुख-दुख में साथ देने वाला है। क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता देने वाला हो। इन लोगों के कहा कि वे आंख मूंद पर मतदान करने की बजाए सोच-समझ कर मतदान करने में विश्वास करते हैं। इनके मुताबिक इन्हें पहली बार जो जिम्मेवारी मिली उसके निर्वाह में कोई चूक न हो जाए इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे। क्या परिवर्तन संभव है और है तो क्यों? वर्तमान सरकार में क्या खामियां लग रही है? जो पार्टी सत्ता हासिल करने का दावा कर रही है क्या वह वर्तमान सरकार के बेहतर काम कर पाएगी? इन सवालों के जवाब में काशीपुर व चौरंगी विधानसभा के नए मतदाताओं ने बताया कि सत्ता परिवर्तन से जरूरी है नीति का बदलाव। काशीपुर विधानसभा क्षेत्र के प्रदीप त्रिपाठी (पुजारी), शंकर गोयनका (कपड़ा व्यापारी), राहुल चौधरी (चायपत्ती दुकान का कर्मचारी), रवींद्र प्रसाद (किराना दुकान में काम करने वाला) और चौरंगी विधानसभा इलाके के सरोज गुप्ता ( दवा दुकान में काम करने वाली), दीप्ति नायर (आभूषण दुकान का कर्मचारी), रत्नेश बालासरिया (मिठाई दुकान का मालिक) व चंद्रशेखर रतेरिया (दर्जी) ने बताया कि वाममोर्चा की सरकार बीते 35 सालों से राज्य में सत्तासीन है और यह लाजिमी है कि इतने लंबे शासनकाल में कुछ गलतियां हो गई है, लेकिन सरकार बदलने से ज्यादा अच्छा है कि सरकार को उसकी गलती का एहसास दिलाया जाए। इन लोगों ने कहा कि जो पार्टी परिवर्तन का दावा कर रही है उसकी नेत्री के अलावा उस पार्टी के अन्य किसी नेता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही यह दावा में खोखला ही लगता है कि अगर तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई में सरकार बनी तो उससे कोई चूक नहीं होगी। इन लोगों के मुताबिक नए उम्मीदवारों को विजयी बनाना उनकी प्राथमिकता रहेगी। इसका कारण पूछने पर इन लोगों ने कहा कि नए लोगों को कुछ करने की इच्छा रहती है और उनका विश्वास है कि पुराने उम्मीदवारों की तुलना में नए उम्मीदवार ज्यादा कारगर साबित होंगे।
Monday, March 14, 2011
विरोधी खेमों की रणनीति पर टिकी है राजनीति दलों की निगाह
शंकर जालान कोलकाता, राज्य में विधानसभा चुनाव का एलान हो गया है। छह चरणों में होने वाले मतदान की शुरुआत 18 अप्रैल से होगी और अंतिम चरण का मतदान 10 मई को होगा। मतगणना 13 मई को होगी। मजे की बात यह है कि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य राजनीति दलों की निगाह इनदिनों विरोधी खेमों की रणनीति पर टिकी है। हालांकि इन सबसे अलग वाममोर्चा ने रविवार को अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। राज्य के कुल 294 विधानसभा सीटों में से वाममोर्चा ने रविवार को 292 उम्मीदवारों का एलान कर दिया। शेष दो सीटों के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा बाद में की जाएगी। पहले चरण के लिए 24 मार्च से नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत हो जाएगी। इस बीच भाजपा से 106 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच गठजोड़ पर समाचार लिखे जाने तक सहमति नहीं बन पाई थी। दोनों दल अपनी-अपनी बातों पर अड़िग है। कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के नेता इस मुद्दे पर अपने पत्ते खोलने से कतरा रहे हैं। फिलहाल दोनों पार्टियों के नेता अपने खेमे से ज्यादा विरोधी खेमे की रणनीति पर गौर किया जा रहा है। मालूम हो कि कोलकाता में मतदान 27 अप्रैल को होना है। इस लिहाज से तैयारियों का वक्त हो चुका है, लेकिन अभी तक कोई भी पार्टी चुनावी रणनीति के संबंध में अपने पत्ते खोलने को तैयार नहीं है। सबसे ज्यादा कौतूहल कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठजोड़ व उसके संभावित उम्मीदवारों को लेकर है। लेकिन इस मुद्दे पर दोनों ही पाटिर्यों में खामोशी देखी जा रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं और कई नाम सामने आ रहे हैं। चर्चा है कि इस बार तृणमूल कांग्रेस प्रमुख कुछ नामचीन हस्तियों को जिले के विभिन्न क्षेत्रों से उम्मीदवार बना सकती है, जिसकी घोषणा जल्द की जाएगी। चर्चा है कि इन सीटों पर फिल्म जगत या रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी को उम्मीदवार बनाया जा सकता है। राजनीति के जानकारों का कहना है अब तक हुई चर्चा और बातचीत के मुताबिक कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठजोड़ की संभावना कम नजर आ रही है। संभवत: कोलकाता नगर निगम चुनाव की तरह ही कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार विधानसभा चुनाव में भी एक-दूसरे के विरोध में चुनावी मैदान में उतरेंगे, जिसका सीधा फायदा वाममोर्चा के उम्मीदवारों को होगा। जानकारों ने बताया कि तृणमूल कांग्रेस गठजोड़ के मुद्दों को सिर्फ इस लिए टाल रही है कि वाममोर्चा अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दे। ताकि उसके आधार पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार करने में सहयोग मिल सके। जानकारों के मुताबिक ममता बनर्जी वाममोर्चा की सूची को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों की सूची तैयार करेगी ताकि वह अल्पसंख्यक, महिला और अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को उम्मीदवार बनाने में वाममोर्चा को पछाड़ सके।
Thursday, March 10, 2011
कुछ नेताओं के लिए धंधा बन गई है राजनीति - सोमनाथ चटर्जी
पश्चिम बंगाल में रिकॉर्ड वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे माकपा के वरिष्ठ नेता दिवंगत ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों से काफी चिंतित हैं। उनका कहना है कि आजकल सत्ता में बने रहने और कुर्सी से चिपके रहने के लिए नेता हर वह हथकंड़ा अपना रहे हैं, जो उनके (नेताओं) के लिए फायदेमंद है। आजकल नेता देश नहीं, खुद के बारे में सोचने लगे हैं। कभी जनता सेवा, समाज सेवा और देश सेवा के लिए राजनीति में आने वाले लोग अब निज व परिवार सेवा को महत्व देने लगे हैं। यहीं कारण है कि जनता की नजर में आज नेताओं की वह इज्जत नहीं रह गई है, जो दस-बीस साल पहले होती थी या होनी चाहिए थी। ३० साल से ज्यादा समय तक सांसद और पांच साल तक लोकसभा अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी से शुक्रवार के लिए शंकर जालान ने कोलकाता स्थित उनके निवास पर लंबी बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।० राजनीति में ईमानदारी कितनी जरूरी है?-ईमानदारी राजनीति ही क्यूं, हर क्षेत्र, हर काम और हर व्यवसाय में जरूरी है। हां इतना अवश्य कहूंगा कि बीते कुछ सालों के दौरान कई राजनेताओं ने ईमानदारी ताक पर रख दी है। आजकल राजनेता प्रतिष्ठा को नहीं, पैसे को महत्व देने लगे हैं। दुखद यह है कि अन्य क्षेत्र के लोगों की तुलना में नेताओं को ज्यादा ईमानदर होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। आज कुछ नेताओं को लिए राजनीति धंधा बन गई है।० पहले लोग राजनीति में देश सेवा की भावना से आते थे, लेकिन अब पैसा कमाने के लिए ऐसा क्या हो रहा है?-भौतिकवादी सुविधा हासिल करने और रातों-रात अमीर बनने की लालशा इसका मुख्य कारण है। हर नेता यह सोचना लगा है कि जीत मिली है। जनता ने जीताकर विधानसभा या लोकसभा भवन भेज दिया है। जितना कमा सको कमा लो, जितना लूट सको लूट लो। क्या मालूम भविष्य में फिर मौका मिले या न मिले। ज्यादातर नेता चुनाव जीतने के बाद जनता से किए गए वायदे को पूरा करने की बजाए अपना घर भरने में लग जाते हैं।० आखिर इस बदलाव का कारण क्या है?-राजनेताओं के लिए कोई मानदंड नहीं है। कोई भी अपराधी चुनाव लड़ व जीत सकता है। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है। मेरा मानना है कि जब तक राजनेताओं के लिए न्यूनतम मानदंड नहीं तय होगा, तब तक इस पर अंकुश लगाना संभव नहीं है। ० भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति कैसे संभव है?-जनता के जरिए। भ्रष्टाचार पर रोक कोई कानून, कोई व्यवस्था या कोई नेता फिर कोई पार्टी तब तक नहीं लगा सकती जब तक जनता जागरूक नहीं होगी। जनता को अपना वोट डालने से पहले सौ बार सोचना चाहिए कि वह किसे वोट दे। कौन सा उम्मीदवार अन्य उम्मीदवारों की तुलना में नेक और ईमानदार है। जनता अगर ऐसा करने लगेगी और अपराधी व अल्प शिक्षित उम्मीदवार को वोट देने से पहरेज करेगी। तो देर-सबेर राजनीतिक पार्टियां भी अपराधी व कम पढ़े-लिखे लोगों को चुनावी टिकट देने से कतराने लगेगी। ० आपकी नजर में फिलहाल कौन-कौन नेता ईमानदार है?-हंसते हुए, यह क्या सवाल पूछ लिया आपने। मोटे तौर पर कहे तो जो पकड़ा गया वह चोर व बईमान बाकी सब ईमानदार।० दिवंगत हो चुके नेताओं में आप किसे ईमानदार मानते हैं?-कई नेता थे, जिनको लोग ईमानदार, साफ-सुथरी छवि वाले, समाज सुधारक, लोकहितकारी के रूप में याद करने हैं। मेरी नजर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, समाजवादी नेता जयप्रकाश व विनोवा भावे और माकपा के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु है। ० आपको लोग सच्चे और ईमानदार नेता के रूप में जानते हैं? इस पर आप की क्या प्रतिक्रिया है?-देखिए, मेरा राजनीति में आना एक संयोग था। बचपन से मेरी राजनीति में कोई रूचि नहीं थी। मेरी वकालत अच्छी-खासी चल रही थी। मुझे खेल से लगाव था। मुझे राजनीति में मेरी इच्छा के विपरीत ज्योति बसु ने लाया या यूं कहे कि जबरदस्ती लाया तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ४२ साल की उम्र में १९७१ में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता। इससे पहले मैंने कभी छात्र या युवा राजनीति में हिसा नहीं लिया था। दूसरे शब्दों में कहे तो जीवन के ४२ बसंत देखने के बाद राजनीति में आया और सीधा संसद पहुंचा। जीवन का काफी अनुभव हो चुका था। ज्योति बसु ने भी यही बताया और सिखाया था कि ईमानदारी के मार्फत ही राजनीति के मैदान पर अधिक समय तक टीका जा सकता है। मैं ज्योति बसु को अपना राजनीतिक गुरू मानता हूं और उनके इस कथन को सदैव याद रखता हूं कि अगर व्यक्ति ईमानदार हो तो समाज सेवा व देश सेवा के लिए राजनीति से बेहतर कोई मंच नहीं है। ० राजनीति में ईमानदारी की आप को क्या-क्या कीमत चुकानी पड़ी है?-विशेष कुछ नहीं। जरा-बहुत चुकानी भी पड़ी है तो वह इतनी उल्लेखनीय नहीं है कि उसका जिक्र किया जाए। ३५-४० साल के राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। मेरी नजर में चढ़ाव को उपलब्धि माना जा सकता है, लेकिन ढलान यानी उतार की कीमत चुकाना नहीं।० वर्तमान व्यवस्था में ईमानदार नेता होना क्या अयोग्यता का परिचायक नहीं है?-यह प्रश्न ही दुखद है। ज्यादातर नेताओं ने ऐसा काम किया है कि लोगों का नेताओं से विश्वास उठ गया है।लोग नेताओं को नेता नहीं लेता (पैसा लेने वाला) कहने में कोई संकोच नहीं करते। ऐसी स्थिति के लिए जनता नहीं पूरी तरह नेता जिम्मेवार हैं। भ्रष्टाचारी नेताओं को शर्म करनी चाहिए कि उनकी करतूत का खामियाजा न केवल जनता बल्कि देश को भुगतना पड़ता है। उनके गलत आचरण की वजह से लोग ईमानदार नेताओं को भी शक की नजर से देखने लगे हैं या अयोग्य कहने लगे हैं। ० आजकल चुनाव जीतते ही नेता महंगी गाड़ियों में घूमने लगते हैं, ऐसे में जनता में क्या संदेश जाता है?- गलत संदेश जाता है, लेकिन नेता यह नहीं समझते। उनकी नजरों में ऐसा करना वे अपनी शान समझते हैं। सत्ता और कुर्सी के नशे में चूर बड़ी-बड़ी व महंगी गाडियों में चलने वाले नेता यह सोचते हैं कि इससे जनता पर उनका प्रभाव और रूवाब बढ़ रहा है, लेकिन असलियत में ऐसा नहीं है।० देश की ताजा राजनीतिक स्थिति पर कुछ कहिए?-बहुत दुखद है। यह कहना मुश्किल है कि आने वाले सालों में देश की क्या स्थिति होगी। हम जितना विकास की ओर जा रहे हैं नेता उतने ही भ्रष्टाचारी बनते जा रहे हैं। नेता घोटाला करने से बाज नहीं आते, इसका एक कारण कानून प्रक्रिया का सुस्त होना भी है। अदालतों व जांच एजंसियों पर राजनेताओं का प्रभाव या हस्तक्षेफ भी अन्य महत्वपूर्ण कारणों में से एक है।० क्या पश्चिम बंगाल में परिवर्तन संभव है?-मेरी नजर में केवल सत्ता परिवर्तन को परिवर्तन कहना सही नहीं होगा। सरकार बदलने से ही बदलाव आ जाएगा ऐसा सोचने वाले खुद को धोखे में रख रहे हैं। सही मायने में बदलाव तभी आएगा जब व्यवस्था (सिस्टम) और नीति बदलेगी। नेता निज हित को दरकिनार कर लोकहित में काम करने लगेंगे तभी सूरत बदलेगी, चाहे किसी भी पार्टी की सरकार क्यों न बने।० आप ने बतौर सांसद और लोकसभा अध्यक्ष में क्या फर्क महसूस किया?-काफी फर्क है। बतौर संसद पहुंचने पर केवल अपने क्षेत्र का विकास और पार्टी व संसद की गरिमा का ध्यान रखना होता है, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बाद जिम्मेवार बहुत बढ़ जाती है। सदन का सही तरीके से संचालन करना, सभी दलों के सांसदों के साथ उचित व्यवहार करना, संसद के कीमती समय का ख्याल रखना समेत कई तरीके की जिम्मेवारी बढ़ जाती है ये जिम्मेदारियां एक सांसद पर नहीं होती। ० क्या कभी राज्यपाल बनने का प्रस्ताव मिला है?- मिले तो कई थे, लेकिन मैंने ठुकरा दिया। अब यह मत पूछिएगा क्यों।० कभी राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव मिला तो क्या करेंगे।-जब मिलेगा तब सोचा जाएगा।
Subscribe to:
Posts (Atom)