Friday, July 8, 2011

पश्चिम बंगाल खुली स्वास्थ्य सेवाओं की पोल

शंकर जालान




बीते दिनों घटी महानगर कोलकाता के उत्तरी अंचल में स्थिति डा. विधानचंद्र राय शिशु अस्पताल सह मेडिकल कालेज (सरकारी) में दिल दहला देने वाली घटना ने न केवल पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी जग जाहिर कर दिया है कि राज्य के सरकारी अस्पताल खुद बीमार है। मात्र ४८ घंटों के दौरान १९ बच्चों की मौत ने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो स्वास्थ्य मंत्री भी हैं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। ध्यान रहे कि २० मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही ममता ने महानगर की कई सरकारी अस्पतालों का औचक दौरा किया था और लचर स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने का वादा भी। अस्पतालों के दौरों के एक महीना बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, लिहाजा कई माताओं की गोद अवश्य सुनी हो गई।
महानगर में यह पहली बार नहीं है जब एक साथ इतनी बड़ी संख्या में इलाजरत शिशुओं की मौत हुई है। नौ वर्ष पहले यानी 2002 में भी तीन दिन के भीतर इसी अस्पताल में 32 बच्चों ने दम तोड़ा था। इस बार ४८ घंटों में १९ बच्चों की मौत हुई है। इतनी बड़ी संख्या में इलाजरत शिशुओं की मौत की जिम्मेदारी लेने के लिए अस्पताल का कोई भी अधिकारी तैयार नहीं है। बहरहाल अस्पताल के अधीक्ष डा. डीके पाल ने कार्रवाई से आशंकित होकर खुद ही इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन वे भी सीधे तौर पर जिम्मेदारी मानने को तैयार नहीं है। हद तो तब हुई जब यहां एक वरिष्ठ अधिकारी ने चिकित्सकीय लापरवाही या गड़बड़ी की बात स्वीकार करने की बजाए पर इसे एक सामान्य घटना बता दिया। अधिकारी ने कहा कि यह एक बाल चिकित्सालय है यहां रोजाना ही दो-चार-छह शिशुओं की मौत होती है, लेकिन एक साथ इतनी अधिक संख्या में मौत बड़ी और सनसनीखेज खबर है। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दावा किया कि मारे गए किसी नवजात या शिशु के अभिभावक ने चिकित्सकीय लापरवाही की कोई अधिकृत शिकायत दर्ज नहीं कराई है, लेकिन फिर भी मामले की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी गई है। वहीं अस्पताल व मेडिकल कालेज प्रबंधन के अधिकारियों के परस्पर विरोधाभासी बयानों से भी मामला उलझता जा रहा है। अस्पताल के मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल मृणाल चटर्जी ने कहा कि अस्पताल में न ही बुनियादी सुविधाओं की कमी है न ही चिकित्सकों का अभाव। वहीं अस्पताल के अधीक्षक डा. डीके पाल ने बुनियादी ढांचे में कमी की बात स्वीकारी । पाल ने इस्तीफे की पेशकश की है लेकिन सरकार ने अभी तक इस बारे में कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है।
चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक अस्पताल का अपना ब्लड बैंक नहीं है और कई जरूरी उपकरणों की भी कमी है। जानकारों ने सवाल खड़ा किया कि १२५ डाक्टरों और २०० नर्सो की फौज वाले डॉ. विधानचंद्र राय शिशु अस्पताल में बार-बार इतनी बड़ी तादाद में बच्चे क्यों मौत के मुंह में समा जाते हैं और इसके लिए सीधे तौर पर कोई जिम्मेदार भी नहीं ठहराया जाता।
राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी माकपा के राज्य सचिव विमान बसु ने राज्य के मुख्यमंत्री व स्वास्थ्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए विधानचंद्र राय शिशु अस्पताल में एक साथ हुई १९ शिशुओं की मौत के लिए राज्य की नई तृणमूल सरकार की कड़ी आलोचना की है।
दूसरी ओर, बच्चों के परिजनों का आरोप है कि डॉक्टरों ने इलाज में लापरवाही बरती जबकि अस्पताल प्रशासन खुद को निर्दोष बता रहा है। परिजनों का कहना है कि चिकित्सकों की अनदेखी के कारण उनके घर के चिराग बुझ गए। दिल को रुलाने वाली इस घटना से गुस्साए परिजनों ने पहले तो डॉक्टरों पर नाराजगी जताई , उसके बाद सड़क पर जाम लगाया और फिर कोई सुनवाई न होते देख बेकाबू होकर अस्पताल में जमकर तोड़फोड़ की। हालात काबू करने के लिए पुलिस ने कई बार लाठियां चलाईं। इस बीच स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार जांच के आदेश दिए हैं। इस बाबत दो डॉक्टरों की एक टीम बनाकर उसे २४ घंटों के भीतर रिपोर्ट दर्ज करने को कहा गया है।
ध्यान रहे कि विधानचंद्र राय शिशु अस्पताल कोलकाता और आसपास के इलाक़े में बच्चों का एकमात्र बड़ा सरकारी अस्पताल है। इस अस्पताल में आसपास के गांवों और कस्बों से बीमार बच्चों को भेजा जाता है.
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि जिन बच्चों की मौत हुई है वो गंभीर हालत में अस्पताल में लाए गए थे और इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई है। दूसरी ओर बच्चों के परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने इलाज़ में लापरवाही बरती है जिसके कारण बच्चों की मौत हुई है।
अभिभावकों का कहना है कि यह अस्पताल एक बार फिर बच्चों की कब्रगाह साबित हुआ। मौत की नींद सोए १९ शिशुओं में १६ की आयु एक से पांच दिन की थी, इन्हें राज्य के विभिन्न क्षेत्रों से इलाज के लिए यहां लाया गया था।
हास्पिटल में गुरुवार सुबह तकरीबन १० बजे हड़कंप मच गया, जब लोगों को पता चला कि अस्पताल में भर्ती १५ बच्चों की एक साथ मौत हो गई है। खबर मिलते ही इलाजरत तमाम शिशुओं के परिजन और रिश्तेदार अस्पताल पहुंचे। माताओं के विलाप के बीच परिजनों (पुरुष सदस्यों) और अन्य लोगों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए तोड़फोड़ शुरू कर दी। दोपहर करीब १२ बजे दो और शिशुओं की मौत की खबर के बाद स्थानीय नागरिक भी पीडि़तों के साथ शामिल हो गए। चिकित्सक मृणालकांति चटर्जी ने कहा, १२ बच्चों की मौत बुधवार को हुई, छह बच्चों ने वृहस्पितवार और एक बच्चे ने शुक्रवार तड़के दम तोड़ा। उन्होंने कहा, अधिकांश बच्चे कम नजन (अंडरवेट) थे। इन्हें किडनी, लीवर की गड़बड़ी, रक्ताल्पता, सेप्टिसीमिया जैसी गंभीर तकलीफों के बाद विभिन्न अस्पतालों से इलाज के लिए यहां लाए गए थे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना को बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि गठित टीम की रिपोर्ट आने पर दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा ताकि दूसरे लोग इससे सबक ले सके।
एक निजी टेलिवजीन से बातचीत में ममता बनर्जी ने अस्पतालों में चिकित्सा की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करने के लिए वाम मोर्चा के शासन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि अस्पताल में चिकित्सा की बुनियादी जरूरतों का ध्यान नहीं रखा गया है। इस तरह की घटनाएं वाममोर्चा के शासनकाल में पहले भी हो चुकी हैं।
उन्होंने माना कि बुनियादी जरूरतों को शीघ्र पूरा नहीं किया जा सकता। नई मशीनों को खरीदने के लिए प्रक्रियाओं का पालन करना होता है जिसमें समय लगता है।
हालांकि मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार ने चिकित्सा ढांचे को व्यवस्थित करने के लिए अल्प एवं मध्यावधि योजनाओं का खाका तैयार किया है।
ममता बनर्जी चाहे जो दलील दे, लेकिन जिन माताओं ने अपने लाल (बच्चे) खोए हैं, उन्हें विश्वास में लेना उनकी लिए डेढ़ी खीर से कम नहीं होगा। वे मां जिनकी गोद सुनी हो गई है वे यह कभी नहीं भूल पाएंगी कि अग्निकन्या के गद्दी संभालने के सवा महीने के भीतर ही उनके जिगर का टुकड़ा राज्य के लचर स्वास्थ्य व्यवस्था की भेंट चढ़ गया।
राज्य सरकार और अस्पताल प्रबंधन चाहे जितनी सफाई दे। विपक्ष इस घटना के लिए जितनी चाहे सरकार की आलोचना करे, लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है उन माताओं के बच्चों की मौत से अश्वधामा जैसा धावा मिला है, जो न कभी भरेगा और न ही सुखेगा।
दूसरी ओर, मध्य कोलकाता के चित्तरंजन एवेन्यू स्थित मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक महिला मरीज के पैर की अंगूली चूहे ने खा ली। वहीं, नदिया जिले के कल्यानी इलाके में किडनी तस्करी का गिरोह चलाने के आरोप में 2 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने उन्हें कल्याणी स्टेशन से पकड़ कर पुलिस के हवाले किया। आरपीएफ का कहना है कि ये दोनों किडनी तस्करी का गिरोह चलाते थे।

Friday, July 1, 2011

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, जो वादा किया वे निभाना...

शंकर जालान


34 साल के वाममोर्चा के शासनकाल को ध्वस्त करते हुए पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए अब चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादे निभाने का वक्त आ गया है। ममता ने दावा किया था कि माओवाद, गोरखालैंड, सिंगुर समेत कई गंभीरर समस्याओं को वे न केवल बहुत जल्द सुलझा लेंगी बल्कि राज्य में विकास की तेजी को भी जारी रखेगी। बतौर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते 20 जून को एक महीना का कार्यकाल पूरा किया और इन चार सप्ताह यानी 30 दिन के दैरान ममता ने मानो तूफानी अंदाज में काम किया। उन्होंने तेजी के साथ कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। छापामार अंदाज में औचक निरीक्षण किया। अधिकारियों, उद्योगपतियों के साथ बैठक की। अपने चेंबर (कक्ष) को सुसज्जित करने में हुए खर्च बाबत दो लाख की राशि का चेक राज्य के मुख्य सचिव समर घोष का सौंपना। राज्य की खस्ताहाल स्थिति को देखते हुए निजी खाते (चित्रों की बिक्री से हुई आय) से एक करोड़ रुपए मुहैया करना। कई नयी घोषणाएं करना। गोरखलैंड जैसी समस्याओं को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाना। सत्ता के सफर में इसे ममता की कामयाबी कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बीते 20 मई को मुख्यमंत्री की शपथ लेने के साथ कैबिनेट की पहली बैठक में उन्होंने सिंगुर में अनिच्छुक किसानों की 400 एकड़ जमीन लौटा देने की घोषणा की। तीन महीने के भीतर गोरखालैंड और माओवाद समस्या दूर करने की बात कही। इन सबसे भी खास बात यह रही कि 30 मई को पंद्रहवीं विधानसभा में पहला भाषण देने के साथ-साथ सदन में विपक्ष को महत्व देने का निर्देश भी दिया।
जून की पहली तारीख को माओवाद प्रभावित इलाकों में अधिक से अधिक एससी व एसटी को दो रुपया किलो चावल देने के लिए आय की सीमा बढ़ाने की घोषणा। रिटायर होते ही शिक्षकों को पेंशन उपलब्ध कराने की घोषणा। शिक्षकों को माह की पहली तारीख से वेतन भुगतान की शुरूआत। स्कूली शिक्षा में वन विंडो सिस्टम लागू करने की घोषणा। कालीघाट स्थित अपने निवास पर जनता दरबार लगाना। ममता के इन सब कारनामों के कारण ही अगर यह कहा जाता कि ममता जैसा कोई नहीं... तो कुछ गलत नहीं होगा।
सरकारी अस्पतालों व पुलिस बैरक के अचानक दौरे को कुछ लोग तानाशाही कह रहे हैं, तो कई लोगों का कहना है कि
ममता बनर्जी ने दोस्ताना संबंध वाले बॉस की छवि स्थापित करने के लिए ऐसा किया।
पश्चिम बंगाल की ही नहीं, पूरे देश में वे सभ्भवत: पहली मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ऐसा किया है।
राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री ने सरकार की जनहितकारी छवि पेश करने के लिए शीर्ष प्रशासनिक स्तर पर बदलाव भी किए। इसके साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों को अपने पहले संदेश में उन्होंने कहा कि यदि कोई राजनीतिक नेता हस्तक्षेप करता है, तो आप सीधे तौर पर उनसे (ममता) से संपर्क करें।
हां, जब लड़ी तो कट्टर राजनैतिक दुशमनों की तरह मगर जा सौजन्यता पेश करने की बात आई तो उसमें भी मिसाल पेश कर दिया। संपन्नता के बावजूद सादगी में भरोसा, जरूरत पड़ी तो तीखे तेवर मगर गरीबों के लिए ममता की प्रतिरूप ममता बनर्जी सचमुच में बेनजीर हैं। अचानक काफिले से छिटककर रोड के किनारे किसी खोमचे वाले से हालचाल पूछने चली जाती हैं। यह भी भूल जाती हैं कि वे मुख्यमंत्री भी हैं। ये कुछ बातें हैं जो ममता की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए उन्हें देश के अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री से अलग करती हैं। ममता पुलिस को हिदायत देती रहती हैं कि उनके लिए ट्रैफिक रोककर आम आदमी की मुश्किलें न बढ़ाए। सिगनल लाल होने पर खुद भी आम आदमी की तरह सिगनल हरा होने का इंतजार करती रहती हैं। खुद को विशिष्ट की जगह आम लोगों की तरह बनाए रखने का यह जज्बा ही बताता है कि सचमुच ममता जैसा कोई नहीं।
राजनीतिक के जानकारों का कहना है कि ममता ने जिस तन्मयता, एकाग्रता और सोच से ३४ सालों से सत्तासीन वाममोर्चा को राज्य सचिवालय (राइटर्स बिल्डिंग) से बेदखल किया ठीक उसी तरह अब वह (ममता) जनता और नेता के बीच की दूरी पाटने में जुटी हैं।
कुछ लोग ममता बनर्जी को नायक फिल्म के मुख्य कलाकार अनिल कपूर के रूप में देख रहे हैं। लोगों का कहना है कि अनिल कपूर ने एक दिन के लिए मुख्यमत्री का पदभार संभाला था और पूरी व्यवस्था को बदल कर रखी दी थी बेशक वह एक फिल्म के दृश्य था, लेकिन ममता बनर्जी जिस गंभीरता से काम ले रही है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने में तो नहीं, लेकिन एक साल में ममता पश्चिम बंगाल की पूरी व्यवस्था अवश्य बदल देगी।
लोगों की बीच यह चर्चा है कि ममता की ईंमानदारी और सादगी पर तो उन्हें कभी शक था ही नहीं, लेकिन विधानसभा चुनाव के पहले तक इतनी उग्र लगने वाली ममता चुनावी नतीजे आने के बाद एकाएक इतनी संतुलित कैसे हो गई।

Friday, June 24, 2011

आजाद भारत में गुलाम पहनावा

क्लबों में ड्रेस कोड


लक्ष्मी पुत्र व सरस्वती पुत्र आमने-सामने


शंकर जालान


क्लबों में ड्रेस कोड को लेकर पिछले दिनों देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कोलकाता शहर में काफी हंगामा व प्रदर्शन हुआ था। प्रसिद्ध चित्रकार शुभप्रसन्ना को क्लब के अनुरूप पोशाक नहीं पहने रहने के कारण प्रवेश से रोक दिया गया। इसके बाद शहर के बुद्धिजीवियों और संपन्न यानी लक्ष्मीपुत्रों और क्लब संस्कृति के प्रेमियों के एक बहस छिड़ गई। जहां, बुद्धिजीवी वर्ग के लोग ड्रेस कोड को आजाद भारत में गुलाम पहनावे बता रहे हैं। वहीं क्लब प्रेमियों के मुताबिक क्लबों में ड्रेस कोड होना गलत नहीं है। इसके पीछे उनका तर्क है कि क्लब आम लोगों के लिए नहीं, केवल सदस्यों के लिए होता है। इसीलिए अगर क्लब के सदस्यों को ड्रेस कोड से कोई परहेज नहीं है तो अन्य लोगों को भी नहीं होनी चाहिए।
ड्रेस कोड का मामला कोई नया नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि पहली बार विवादों में आया हो। मशहूर क्रिकेटर व भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सुनील गवास्कर को भी ड्रेस कोड के कारण लाड्स के घुसने से रोक दिया गया था। महानगर कोलकाता में दर्जनों ऐसे क्लब है, जिसके अपने-अपने नियम-कानून व ड्रेस कोड हैं।
दक्षिण कोलकाता के २४१, आचार्य जगदीश चंद्र बोस रोड स्थित द कलकत्ता क्लब लिमिटेड में बीते दिनों ड्रेस कोड की वजह से चित्रकार शुभप्रसन्ना को घुसने नहीं दिया गया। इससे पहले भी कई मशहूर हस्तियों को ड्रेस कोड बंधन के कारण क्लब में प्रवेश करने से वंचित किया गया था। इनमें हाल ही दिवंगत हुए मशहूर चित्रकार एमएफ हुसैन, पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी व सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार शामिल हैं। इसके अलावा मध्य कोलकाता के स्ट्रांड रोड स्थित कलकत्ता स्वीमिंग क्लब में भी युवा समाजजेवी संदीप भूतोड़िया को कुर्ता-पायजामा पहने रहने के कारण घुसने से रोक दिया गया था।
ध्यान रहे कि कलकत्ता क्लब का स्थापनी रंगभेद व जाति भेद के खिलाफ ब्रिटिश जमाने में की गई थी। इसके स्थापना के पीछे की कहानी यह है कि ब्रिटिश काल में एक बार विशिष्ट भारतीय राजन मुखर्जी को कलकत्ता के एक और पुराने व प्रतिष्ठित क्लब बंगाल क्लब के डाइनिंग रूम में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। उन्हें रोके जाने का एक मात्र कारण यह था कि वे भारतीय थे। मुखर्जी तत्कालीन भारत के वायसराय लार्ड मिंटो के अतिथि थे। उन्हीं के बुलावे पर वे बंगाल क्लब पहुंचे थे। इस घटना से नाराज कुछ भारतीय व युरोपियन लोगों ने एक नए क्लब की स्थापना करने की योजना बनाई। इस तरह १९०७ में कलकत्ता क्लब की स्थापना की गई। इसकी स्थापना उस नीति के मद्देनजर की गई कि यहां सदस्यता के लिए रंगभेद या जाति भेद नहीं पाना जाएगा। कलकत्ता क्लब में भारतीय व यूरोपियनों को समान रूप से प्रवेश करने की इजाजत होगी। थ्रोटोन नामक आर्किटेक्ट द्वारा तैयार की गई डिजाइन वाले इस क्लब का औपचारिक उद्घघाटन ३ फरवरी १९१५ को बंगाल के तत्कालीन गवर्नर सर थॉमस कार्मिकेल ने किया था। उस वक्त ड्रेस कोड के तहत यह तय किया गया कि क्लब में पारंपरिक भारतीय परिधान पहनकर किसी भी व्यक्ति को प्रवेश करने पर पाबंदी होगी। क्लब में प्रवेश करने के लिए पश्चिमी पोशाक यानी शर्ट, पैंट व जूता पहनना अनिवार्य होगा।
मालूम हो कि २००७ में भी यह क्लब महिलाओं की सदस्यता पर पाबंदी को लेकर विवादों में आया था, लेकिन महिलाओं के विरोध के बाद पाबंदी हटा ली गई थी।
पिछले दिनों हुए झमेले व क्लब के ड्रेस कोड की व्याख्या करते हुए क्लब के सचिव कर्नल बी. मुखर्जी ने कहा कि क्लब में कुर्ता, दक्षिण भारतीय स्टाइल की धोती, बिना बटन की कमीज, चप्पल व सैंडल पहनकर प्रवेश की इजाजत नहीं है। उन्होंने गर्व के साथ कहा- हम केवल शर्ट, पतलून व जूते पहनकर आने वालों को ही प्रवेश देते हैं।
गौरतलब है कि १०४ साल पुराने महानगर के आभिजात्य कलकत्ता क्लब में धोती कुर्ते के कारण प्रवेश से वंचित विशिष्ट चित्रकार शुभप्रसन्ना ने क्लब के पदाधिकारियों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए और कहा कि वे लोग कौन हैं और किन परिवारों और बैक ग्राउंड से आए हैं, उन्हें पूरी जानकारी है लेकिन वे इस विवाद को जन्म नहीं देना चाहते लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि किसी आजाद मुल्क में गुलामी के समय के ड्रेस कोड को मानने की इतनी बड़ी प्रतिबद्धता क्लब पदाधिकारियों की ओर से दिखाई जा रही है। वरिष्ठ कलाकार शुभप्रसन्ना के अपमान से गुस्साए बुद्धिजीवियों ने कलकत्ता क्लब के सामने जुटे और गुलामी के दौर के ड्रेस कोड को रद्द करने की मांग की। प्रदर्शन करने वालों में विभास चक्रवर्ती, जय गोस्वामी, तरुण सान्याल, अर्पिता घोष प्रमुख थे। क्लब के समक्ष विरोध प्रदर्शित कर रहे बुद्धिजीवी प्रतुल मुखोपाध्याय ने कहा कि कलकत्ता क्लब या कोई क्लब हमारी संस्कृति से अपने आप को अलग कैसे कर सकता है। धोती कुर्ता जिसे बंगाली का पोशाक कहा जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है। मुखोपाध्याय ने कहा कि आज के दौर में इस तरह की शर्ते हास्यास्पद जान पड़ती हैं और इन्हें जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। शुभप्रसन्ना को क्लब में प्रवेश करने की अनुमति न दिए जाने को विशिष्ट फिल्मकार गौतम घोष ने भी अनुचित कहा है। नाट्यकर्मी सांवली मित्र, वरिष्ठ लेखिका महाश्वेता देवी तथा फिल्म अभिनेत्री अपर्णा सेन ने भी सम्पूर्ण प्रकरण को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
ड्रेस कोड के सिलसिले में हिंदुस्तान क्लब के पूर्व अध्यक्ष सीताराम शर्मा के शब्दों पर ड्रेस कोड होना कोई गलत नहीं है। वे कहते हैं कि कोई भी क्लब सार्वजनिक या आम लोगों के लिए नहीं होता है। क्लब एक निजी संस्थान है और उसमें केवल सदस्यों को प्रवेश की अनुमति होती है। इसलिए अगर सदस्यों को ड्रेस कोड पर कोई आपत्ति नहीं है तो बाहरी लोगों को इस मामले में बोलने का कोई हक नहीं है। हर क्लब को अपने कायदे-कानून बनाने का हक है। क्या हिंदुस्तान क्लब में भी कोई ड्रेस कोड है? इसके जबाव में उन्होंने कहा कि नहीं। हां हाफ पैंट पहन कर स्वीमिंग पुल के पास जरूर जा सकते है, लेकिन डाइनिंग रूम में हाफ पैंट की इजाजत नहीं है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान क्लब की स्थापना १९४६ में हुई थी। उस वक्त कलकत्ता में जितने में क्लब थे सारे विदेशी थी और सभी में ड्रेस कोड था, इसीलिए हिंदुस्तान क्लब के ड्रेस कोड से अलग रखा गया।
वहीं, युवा समाजसेवी संदीप भूतोड़िया ड्रेस कोड को सिरे से गलत मानते हैं। उन कहना है कि स्वतंत्र भारत में इस तरह की गुलामी का बड़े पैमाने पर विरोध करना चाहिए। उन्होंने बताया कलकत्ता क्लब का जिक्र करते हुए कहा कि शुभप्रसन्ना के मामले में भले ही क्लब प्रबंधन बड़ी-बड़ी बात करे, लेकिन मैं खुद भुक्तभोगी हूं और इस बात का साक्षी भी की कलकत्ता क्लब समय-समय और अपनी इच्छा के मुताबिक नियमों में बदलाव करते रहता है। उन्होंने कहा कि बीते साल क्लब ने उन्हें किसी सम्मान समारोह में आंमत्रित किया था। उन्होंने क्लब प्रबंधन को साफ शब्दों में कह दिया था कि वे ज्यादातर कुर्ता-पायजामा पहनते हैं और समारोह के दिन भी कुर्ता-पायजामा पहनकर ही आएंगे, तो प्रबंधन ने उन्हें स्वीकृति दे दी। भूतोडि़या के मुताबिक क्लब के इस ढुलमुल रवैए को आप क्या कहेंगे। उन्होंने कहा कि यह कहते हुए शर्म आती है कि कलकत्ता स्वीमिंग क्लब के प्रवेश द्वार पर यह लिखा रहता था- कुत्ते व भारतीयों का प्रवेश वर्जित। इसी तरह टालीगंज क्लब में भी प्रवेश के लिए कुत्तों व आया (नौकरानी) की मनाही है। उन्होंने कहा भले की ड्रोस कोड वाले क्लबों की स्थापना आजादी के पहले हुई हो, लेकिन अब जब आजादी को ६४ साल हो गए हैं, तो इस तरह की पाबंदी का कोआ औचित्य नहीं है।
इस संदर्भ में कलकत्ता क्लब के अध्यक्ष डॉ. मनोज साहा ने टेलीफोन पर बात करते हुए कहा कि क्लब का कानून-कायदा सबसे ऊपर है। चाहे पीएम (प्रधानमंत्री) हो या सीएम (मुख्यमंत्री) अगर क्लब में प्रवेश करना है तो ड्रेस कोड मानना होगा। क्या आजाद भारत में गुलाम पहनावे यानी ड्रेस कोड का होना उचित है? इसका उत्तर देते हुए साहा ने कहा कि इसमें आजादी व गुलामी की कोई बात नहीं है।

Sunday, June 19, 2011

ममता जैसा कोई नहीं...

शंकर जालान




जब लड़ी तो कट्टर राजनैतिक दुशमनों की तरह मगर जब सौजन्यता पेश करने की बात आई तो उसमें भी मिसाल पेश कर दिया। संपन्नता के बावजूद सादगी में भरोसा, जरूरत पड़ी तो तीखे तेवर मगर गरीबों के लिए ममता की प्रतिरूप ममता बनर्जी सचमुच में बेनजीर हैं। अचानक काफिले से छिटककर रोड के किनारे किसी खोमचे वाले से हालचाल पूछने चली जाती हैं। यह भी भूल जाती हैं कि वह मुख्यमंत्री भी हैं। पुलिस को हिदायत देती रहती हैं कि उनके लिए ट्रैफिक रोककर आमआदमी की मुश्किलें न बढ़ाए। सिगनल लाल होने पर खुद भी आम आदमी की तरह सिगनल हरा होने का इंतजार करती रहती हैं। खुद को विशिष्ट की जगह आम लोगों की तरह बनाए रखने का यह जज्बा ही बताता है कि सचमुच ममता जैसा कोई नहीं।
लगभग दो सप्ताह यानी १४ दिनों के मुख्यमंत्री काल में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने १४ से अधिक ऐसे कार्यों को अंजाम दिया है, जो इससे पहले किसी राज्य के किसी मुख्यमंत्री ने नहीं दिया। मसलन हर रोज ममता कोई ऐसा काम कर रही है, जिससे उसे प्रचार तो मिल ही रहा है, जनता के बीच उसकी लोकिप्रयता भी बढ़ रही है।
राजनीतिक के जानकारों का कहना है कि ममता ने जिस तन्मयता, एकाग्रता और सोच से ३४ सालों से सत्तासीन वाममोर्चा को राज्य सचिवालय (राइटर्स बिल्डिंग) से बेदखल किया ठीक उसी तरह अब वह (ममता) जनता और नेता के बीच की दूरी पाटने में जुटी हैं।
कुछ लोग ममता बनर्जी को नायक फिल्म के मुख्य कलाकार अनिल कपूर के रूप में देख रहे हैं। लोगों का कहना है कि अनिल कपूर ने एक दिन के लिए मुख्यमत्री का पदभार संभाला था और पूरी व्यवस्था को बदल कर रखी दी थी बेशक वह एक फिल्म के दृश्य था, लेकिन ममता बनर्जी जिस गंभीरता से काम ले रही है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि एक दिन, एक सप्ताह या एक महीने में तो नहीं, लेकिन एक साल में ममता पश्चिम बंगाल की पूरी व्यवस्था अवश्य बदल देगी।
बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद के शपथ लेते ही राजभवन से राइटर्स बिल्डिंग तक का सफर पैदल तय कर नई मिसाल पेश की। इससे पहले उन्होंने राजभवन शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत करने पहुंचे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, माकपा के राज्य सचिव विमान बोस समेत वाममोर्चा के नेताओं के समक्ष जाकर हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया।
इसके बाद बुलेड प्रूफ गाड़ी और हुटर लेने से मना करते हुए पुलिस महकमे को सकते में डाल दिया। और तो और कालीघाट स्थित अपने निवास से दफ्तर आने के क्रम में ममता बनर्जी ने एसएसकेएम अस्पताल, पुलिस बाडी गाइट लाइन, एमआर बांगूर अस्पताल और शंभूनाथ पंडित अस्पताल का दौरा कर वहां का जायजा लिया और यह भी जानने का प्रयास किया कि सरकारी अस्पतालों में किस तरह काम-काज हो रहा है। ध्यान रहे कि ममता बनर्जी मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ राज्य की स्वास्थ्य मंत्री भी है। और वे हर हाल में राज्य के सरकारी अस्पतालों के कायाकल्प के प्रति कृतिसंकल्प दिख रही है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि राज्य की खस्ता हाल स्थिति को देखते हुए उन्होंने अपने निजी कोष से राज्य के मुख्य सचिव समर घोष को एक करोड़ रुपए के चेक सौंप कर अपने त्याग की भावना का परिचय दिया। यहीं नहीं अपने कक्ष की साज-सज्जा पर खर्च हुए करीब दो लाख रुपए का भार में उन्होंने अपने कंधे पर लिया।
ममता के करीबी सूत्रों के मुताबिक उन्होंने सचिवालय में अपने दफ्तर में अपनी इच्छानुसार बदलाव करवाए हैं। इसमें लगभग 2 लाख रूपए का खर्च आया है। सचिवालय सूत्रों के अनुसार ममता ने हाल में ही में बेची गई उनकी पेंटिंग से यह राशि अर्जित की थी।
लोगों की बीच यह चर्चा है कि ममता की ईंमानदारी और सादगी पर तो उन्हें कभी शक था ही नहीं, लेकिन विधानसभा चुनाव के पहले तक इतनी उग्र लगने वाली ममता चुनावी नतीजे आने के बाद एकाएक इतनी संतुलित कैसे हो गए।
इसके अतिरिक्त माओवादी समस्या, दार्जिलिंग समस्या के सटीक समाधान की दिशा में ममता अग्रसर हो रही है। एक ओर जहां हुगली जिले के सिंगूर के किसानों को ४०० एकड़ जमीन वापस कर उनके दिलों में और जगह बना रहा है। वहीं टाटा मोटर्स के प्रमुख रतन टाटा को शेष ६०० एकड़ जमीन पर कारखाना लगाने का न्यौता देकर औद्योगिक विकास की गति भी जारी रखना चाहती है।

चीफ मिनिस्टर के च्वायंस का चेंबर

शंकर जालान




पश्चिम बंगाल की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य सचिवालय ( राइटर्स भवन ) में अपने च्वायंस का चेंबर यानी खुद की पसंद का कक्ष बनवाया है। इस पर आई लागत का खर्च उन्होंने खुद वहन किया है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की बाद ममता के निर्देश पर लोक निर्माण विभाग के के 25 से 30 मस्त्रियों ने लगातार आठ दिनों तक रात-दिन एक कर इसे सजाया है। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य के समय की हर चीज को हटाकर ममता बनर्जी के पसंद के सामानों से सजाया गया है। मुख्यमंत्री के कार्यालय को उनके पसंद के अनुसार ही आफ व्हाइट रंग दिया
गया है, जो पहले लाइट पीले रंग का था। साथ बुद्धदेव भंट्टाचार्य के समय की कीमती लकड़ी के टेबुल को हटाकर वहां अधगोल बड़ा टेबुल लगाया गया है, जिसपर सफेद रंग चढ़ा है। इसके साथ ही दस चाकलेट रंग के पालिश की हुई
लकड़ी की कुर्सी भी रखी गईं है। फ्लोर से लाल कारपेट हटाकर प्लाइवुड लगाया गया है। पुराने फर्नीचर को हटाकर मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार नए लगाए गए हैं। पुराने ट्यूबलाइट को भी बदलकर फ्लूरोसेंट लैंप लगाए गए हैं।
वहीं मुख्यमंत्री ने अपने टेबुल पर एक बड़ा लैंप लगाने को भी कहा है। साथ ही दीवारों को मनीषियों के तस्वीरों से सजाया जाएगा, जिसे ममता बनर्जी आने वाले दिनों अपने घर से लाएंगी। इनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चित्तरंजन दास, विधानचंद्र राय, महात्मा गांधी, कवि नजरुल, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे मनीषियों की तस्वीर शामिल हैं। इसके अलावा हरे रंग व हरियाली को भी यहां तरजीह दी गई है। इसके लिए मनीप्लांट के साथ विभिन्न बोनसाई, छोटे-छोटे फूलों के पौधें भी रखे गए हैं। मालूम हो कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ममता बनर्जी सीएम के
एंटी चेंबर में बैठकर कार्य कर रही थीं।

बंगाल की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल, केंद्र रखेगा ख्याल

शंकर जालान



यह कहना गलत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में गठित नई सरकार को आर्थिक संकट विरासत में मिला है। चुनाव से पहले ही आर्थिक संकट की बात सामने आ गई थी, लेकिन तत्कालीन वित्तमंत्री असीम दासगुप्ता इसे आर्थिक समस्या बताते रहे और यथा समय इसके दूर होने की बात दोहराते रहे। सत्ता संभालते ही ममता को दो लाख करोड़ रुपये के ऋण का बोझ व सरकारी खजाना खाली होने का अहसास हुआ। पहले उन्होंने राज्य की जर्जर आर्थिक स्थिति से केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को अवगत कराया। राज्य के वित्त मंत्री अमित मित्रा को भी उन्होंने समस्या का समाधान खोजने का निर्देश दिया। बाद में कोलकाता में श्री मुखर्जी के साथ राज्य की आर्थिक समस्या पर ममता की बैठक हुई, जिसमें राज्य के वित्त मंत्री भी शामिल हुए। मुखर्जी ने मुख्यमंत्री को केंद्र से हर तरह से आर्थिक सहयोग करने का आश्वासन दिया। केंद्र से पश्चिम बंगाल को ऋण से लेकर आर्थिक अनुदान तक की मदद मिलेगी। श्री मित्रा ने इसके संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार लघु बचत योजना के तहत केंद्र से 500 करोड़ रुपये का ऋण लेगी। जरूरत पड़ने पर नियमानुसार बाजार से भी धनराशि जुटाई जाएगी। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार पर केंद्र का अनुदान ठुकरा देने का आरोप लगाया। सूत्रों के मुताबिक पूर्ववर्ती सरकार ने 3 सिंतबर 2010 को केंद्र से 2 हजार 985 करोड़ की आर्थिक मदद मांगी थी। बाद में मदद की राशि में कटौती कर 2 हजार 385 करोड़ मांगा गया लेकिन 4 दिसंबर 2010 को सरकार ने केंद्र को स्पष्ट रूप से कह दिया था कि उसे मदद की जरूरत नहीं है। पूर्व वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने श्री मित्रा के इस तर्क के जवाब में कहा कि सितंबर और नवंबर 2010 में उन्होंने केंद्र से जो आर्थिक मदद मांगी थी, वह अगले वर्ष 2011 में खर्च के लिए था लेकिन चुनाव के कारण वोट आन अकाउंट को ध्यान में रखकर उन्होंने आर्थिक मदद लेने से इनकार किया। श्री दासगुप्ता ने कहा कि 1992 से पश्चिम बंगाल को कोयले की रायल्टी से वंचित किया जा रहा है। कोयले की रायल्टी के बाबत केंद्र पर सरकार का 5 हजार करोड़ रुपया बकाया है। राज्य में लघु बचत योजना के तहत जो करोड़ों की राशि जमा होती है, उसपर राज्य को सहज ऋण उपलब्ध होता है। पूर्ववर्ती सरकार केंद्र पर इस योजना के तहत ऋण माफ करने के लिए दबाव डाल रही थी। ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद आर्थिक समस्या दूर करने पर जो तस्वीर उभर कर सामने आयी है, उसमें केंद्र राज्य को हर तरह से आर्थिक सहयोग करेगा। चाहे वह ऋण के रूप में हो या अनुदान के रूप में, ममता वह ग्रहण करेंगी। पूर्व वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता ने ममता सरकार के प्रति केंद्रीय वित्त मंत्री के सकारात्मक रूख को देखते हुए कहा है कि वाममोर्चा सरकार बहुत पहले से केंद्र से मदद मांग रही थी लेकिन उसे नहीं मिली।
वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य को औद्योगिक विकास की पटरी पर वापस लाने के लिए निवेशकों को आकर्षित करने की कोशिशें शुरू कर दी है। सिंगुर से टाटा मोटर्स के हटने के बाद माकपा ने ममता को उद्योग विरोधी के रूप में प्रचारित किया था। यह और बात है कि इसका विधानसभा चुनाव में उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन से ममता को जनता का विपुल समर्थन मिला और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस विधानसभा चुनाव पूर्ण बहुमत से जीत गईं।
माकपा ने ममता को जिस तरह उद्योग विरोधी बताया था, उसका मलाल आज भी सुश्री बनर्जी को है। उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा है कि मुख्यमंत्री यह संदेश देना चाहती हैं कि वह उद्योग विरोधी नहीं है। राज्य के औद्योगिक विकास को लेकर वे गंभीर हैं और राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए उद्योगपतियों व पूंजीपतियों का विश्वास जीतना चाहती हैं। राइटर्स सूत्रों के मुताबिक सुश्री बनर्जी ने वित्त मंत्री अमित मित्रा और उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी को देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों से संपर्क करने को कहा है। दोनों रतन टाटा से लेकर मुकेश व अनिल अंबानी तक से संपर्क साध रहे हैं। जून के दूसरे या तीसरे सप्ताह उद्योगपतियों का सम्मेलन बुलाने की भी योजना है जिसमें देश के प्रमुख उद्योगपतियों को आमंत्रित किया जाएगा। सुश्री बनर्जी सम्मेलन में उद्योगपतियों को बंगाल में निवेश का न्योता देंगी।
मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद सुश्री बनर्जी ने सिंगुर में अनिच्छुक किसानों को भूमि लौटाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शेष 600 एकड़ भूमि में टाटा मोटर्स यदि कारखाना लगाना चाहे है तो इसका स्वागत किया जाएगा। सुश्री बनर्जी ने टाटा के साथ टकराव में नहीं जाने का संकेत दिया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद टाटा ने उन्हें जो बधाई संदेश भेजा था उसका सुश्री बनर्जी ने औपचारिक रूप से जवाब दिया है।

गोरखालैंड : कहना मुश्किल कौन जीता, कौन हारा ?

शंकर जालान



उत्तर बंगाल के पर्वतीय इलाके में गोरखालैंड की मांग करते गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (गोजमोमो) के हजारों कार्यकर्ता और इसी बीच अचानक प्रत्याशी के आते ही जय गोरखालैंड की गूंज होने लगती। गजब का उत्साह और उल्लास पर्वतीय इलाके में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले। कुछ भी कर गुजरने को आमादा गोजमुमो कार्यकर्ताओं को देखकर लग रहा था कि यह चुनाव किसी के लिए महत्वपूर्ण हो चाहे नहीं, लेकिन गोरखालैंड प्रेमियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहेगा। नारे गूंजते थे और पीले टीके लगाकर, ढोलक बजाती महिलाओं के नाचने-गाने का सिलसिला चलता रहता था। यह उत्साह किसी और चीज के लिए नहीं बल्कि गोरखालैंड के लिए था। वर्षो पुराने सपने को लोग सच होते देख रहे थे। तय था कि पर्वतीय इलाके में गोजमुमो ही रहेगा और हुआ भी यही। भारी मतों या यह कहें कि जनता ने उम्मीदवारों को एकतरफा वोट दिया। चुनावी नतीजे आने और राज्य में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस की गठजोड़ वाली सरकार बनने के बाद राज्य सचिवालय में इस मुद्दे पर हुई वार्ता कई मसले पर अच्छी और कई पर अनिर्णायक रही। गोजमुमो के पदाधिकारियों व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच हुई बातचीत में यह किसी को भी समझ में नहीं आया कि कौन जीता और कौन हारा। अलबत्ता गोजमुमो के महासचिव के सामने की संयुक्त प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री ने कह दिया कि गोरखालैंड की समस्या का समाधान हो गया है। मजे की बात यह रही किन गोजमुमो महासचिव रोशन गिरि ने चुप्पी साधे रखी। इधर, पर्वतीय इलाके में भी सरगर्मी शुरू हो गई और गोजमुमो के नेताओं पर स्थानीय दलों के नेताओं ने कई गंभीर आरोप भी लगाए।
धयान रहे कि अलग राज्य गोरखालैंड के गठन के लिए मांग नई नहीं है। आजादी के पूर्व 1907 में मैन एसोसिएशन ने इसकी मांग उठाई थी, लेकिन उस समय गोरखाओं की आबादी यहां हजारों में ही थी। इसके बाद फिर वर्ष 1980 में प्रांत परिषद का गठन हुआ और इस दल ने यहां आंदोलन किया, लेकिन इसे लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया। इसी वर्ष गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के प्रमुख सुभाष घीसिंग ने अस्त्रधारी आंदोलन किया और इस दौरान वृहद आंदोलन हुआ। इससे लोगों के जुड़ने का सिलसिला चला और इसे भारी जनसमर्थन मिला। इस बीच भारी हिंसा भी हुई थी और इसमें सैकड़ों जानें गई थी और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। उस समय सुभाष घीसिंग को हिल्स टाईगर की संज्ञा दी गई थी। इसी बीच 23 अगस्त 1988 को गोरामुमो, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ त्रिपक्षीय वार्ता हुई। इस दौरान दार्जिलिंग गोरखा पार्वत्य परिषद का गठन हुआ। परिणाम हुआ कि गोरखालैंड के नाम पर आंदोलन कर रहे लोगों को निराशा हाथ लगी। लंबे समय तक हिल्स पर राज करने के बाद वर्ष 2005 में सरकार और गोरामुमो के बीच फिर वार्ता हुई। इस दौरान हिल्स में छठी अनुसूची लागू कराने को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया गया, लेकिन संसद के दोनों सदन में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया। इसी दौरान जनता घीसिंग के खिलाफ खड़ी होने लगी और सात अक्टूबर 2007 को गोजमुमो का गठन हुआ। गोजमुमो सुप्रीमो विमल गुरुंग का दायरा बढ़ता गया और उनके बढ़ते जनाधार व अपने विपरीत माहौल देखकर घीसिंग को पहाड़ छोड़ना पड़ा। इसके बाद गोरखालैंड की बात ही होती रही। ऐसे में इस दल के उम्मीदवारों ने पूर्व में यह भी घोषणा की थी कि वह गोरखालैंड का मुद्दा विधानसभा में उठाएंगे। इस मसले पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा और भी कई बातें कही गई थी। हालांकि अब भी गोजमुमो कह रहा है कि वह अपने मुद्दे पर कायम है।