Thursday, December 15, 2011

राम भरोसे हैं शहर की कई अस्पतालें व इमरातें

शंकर जालान



कोलकाता । दक्षिण कोलकाता स्थित एएमआरआई (आमरी) अस्पताल में बीते शुक्रवार तड़के घटी भीषण अग्निकांड में जहां 90 से ज्यादा लोग राम को प्यारे हो गए। वहीं शहर की कई नामी-गिरामी अस्पतालों वे बड़ी इमरातों की अग्निशमन व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा कर दिया। कहना कहना गलत नहीं होगा कि शहर में नियमों को ताक पर रख कर कई अस्पताल चल रहे तो कई महत्वपूर्ण इमारतों में भी आग बुझाने की माकुल व्यवस्था नहीं है। या यूं कहे कि शहर की कई अस्पतालें व इमारते राम भरोसे हैं। महानगर और आसपास के इलाके में चल रहे लघु उद्योग, भूतल (बेसमेंट) में संचालित नर्सिंग होम, गेस्ट हाउस, कोचिंग हब, होटल, कॉलेज व स्कूल के अलावा सिनेमा हॉल व शॉपिंग मॉलों को देखकर अग्निकांड की संभावना को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। अग्निशमन विभाग की माने तो शहर की कुछ बहुमंजिली इमारतें ही मानकों पर खरी हैं।
महानगर की 75 फीसद से ज्यादा बहुमंजिली इमारतें, अपार्टमेंट, मार्केट और नर्सिंग होम आदि में अग्निशमन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। कुछ अस्पतालों में अग्निशमन उपकरण तो हैं, लेकिन वे खराब पड़े हैं। बेसमेंट में मानकों की अनदेखी की जा रही है। सोचने वाली बात यह है कि संबंधित विभाग के अधिकारी किसी आधार पर अनापत्ति पत्र (एनओसी) दे देते हैं।
आमरी अस्पताल में लगी भयानक आग के बात इससे चिंतित लोगों का कहना है कि कई अस्पतालों समेत विभिन्ना स्थानों के शासकीय व निजी इमारतों में आपदा प्रबंध की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। राज्य सरकार को इसके लिए कानून बनाना चाहिए। लोगों का कहना है कि पहले सिनेमा घरों, अस्पतालों में आग बुझाने का छोटा-सा सयंत्र व दो बाल्टी रेत भरी नजर आती थी, पर अब वह नहीं दिखती।
स्वयंसेवी संस्था के एक पदाधिकारी ने बताया कि अस्पतालों में अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इतना ही नहीं कोई बड़ा हादसा होने पर उस पर तत्काल काबू पाने के लिए कोई रणनीति भी तैयार नहीं है। रोजाना सरकारी समेत निजी अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज आते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा को लेकर न तो कोई तैयारी है और न ही कोई व्यवस्था...। उन्होंने कहा कि कुछ निजी अस्पतालों में जरूर कई स्थानों पर आग पर काबू पाने के लिए छोटे यंत्र लगे हैं, लेकिन उससे किस हद तक काबू पाया जा सकता है, यह प्रश्न बना हुआ है।
उन्होंने बताया कि आमरी हादसे के बाद मरीज, अस्पताल कर्मियों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार नए सिरे से सोचने पर विवश हैं। कारगर रणनीति की दरकार महसूस की जा रही है। इस घटना ने अस्पतालों में अग्निशमन के इंतजामों को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है।
जरा अतीत की ओर देखे तो पता चलता है कि महानगर कोलकाता समेत आसपास के जिलों में बीते दो दशक के दौरान आगजनी की दजर्नों घटनाएं घटी है, लेकिन आमारी की आग की लपटों ने सबको बौना कर दिया। बीते साल यानी 2010 में स्टीफन कोर्ट, 2008 में सोदपुर व नंदराम मार्केट, 2006 में तपसिया, 2002 में फिरपोस मार्केट, 1998 में मैकेंजी इमारत, 1997 में एवरेस्ट हाउस व कोलकाता पुस्तक मेला, 1996 में लेंस डाउन, 1994 में कस्टम हाउस, 1993 में इंडस्ट्री हाउस, 1992 में मछुआ फल मंडी, 1991 में हावड़ा मछली बाजार में भयावह आग की घटना घटी चुकी है। इनमें सबसे ज्यादा मौते बीते साल 23 मार्च के पार्क स्ट्रीट स्थित स्टीफन कोर्ट अग्निकांड में हुई थी, यहां 46 लोग आग की भेंट चढ़ गए थे। बीते 20 सालों में आग की 11 बड़ी घटनाओं में इतने लोगों की मौत नहीं हुई, जितने लोग आमरी अग्निकांड में मारे गए।

आग से खुले कई राज, हरकत में आई सरकार और वीरान हुआ अस्पताल

शंकर जालान


कोलकाता,। शुक्रवार तड़के एएमआरआई (आमरी) अस्पताल में लगी आग ने एक ओर जहां अस्पताल प्रबंधन, कोलकता नगर निगम और राज्य सरकार की नाकामी के कई राज खोले। वहीं, दूसरी ओर इस दर्दनाक घटना के एक दिन बाद यानी शनिवार को अस्पताल की सात मंजिली इमारत वीरानी में तब्दील हो गई। अस्पताल परिसर में जगह-जगह बिखरे शीशे, खून के धब्बे और धुएं की गंध कल घटी भीषण अग्निकांड की घटना के मूक गवाह रहे। इस दर्दनाक घटना के बाद राज्य सरकार हरकत में आई और इसी घटनाओं की रोकथाम के लिए शनिवार को पांच सदस्यीय कमिटी का गठन किया।
यहां यह बताते चले की आमरी अस्पताल में आग लगने का यह नया और पहला मामला नहीं था। इस अस्पताल में तीन साल पहले यानी 2008 भी आग लगी थी। उस वक्त कोई हताहत नहीं हुआ था। लगता है कि अस्पताल प्रबंधन ने इन हादसों से सबक नहीं सीखा। घटना की बड़ी वजह अस्पताल के भूतल (बेसमेंट) में ज्वलनशील पदार्थों के जखीरे को भी माना जा रहा है। सिर्फ पार्किंग के लिए इस्तेमाल होने के लिए बने बेसमेंट में अस्पताल प्रबंधन ने मेडिकल स्टोर, आॅक्सीजन सिलेंडर और तमाम अन्य चीजों का गोदाम बना रखा था।
ध्यान देने वाली बात यह है कि अस्पताल की लापरवाही सिर्फ बेसमेंट के गलत इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। चौंकाने वाली और भी बातें सामने आई हैं कि एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड (एईआरबी) से बिना किसी वाजिब अनुमति लिए पिछले एक साल से अस्पताल का रेडियोलॉजी विभाग भूतल में काम कर रहा था। नेशनल एक्रीडीटेशन बोर्ड आॅफ हॉस्पिटल्स (एनएबीएच) ने भी बीते नवंबर में ही अस्पताल की मान्यता रद्द कर दी थी। एनएबीएच के सचिव डॉ. गिरधर ज्ञानी ने इस बाबत कहा कि अस्पताल में आपदा के समय सुरक्षित बाहर निकलने के सही इंतजाम नहीं हैं।
बनी कमिटी : अस्पताल के पुराने ब्लॉक में अब भी कुछ मरीज भर्ती हैं। इन मरीजों की देखभाल करने के लिए न तो कोई डॉक्टर है और न ही कोई नर्स। इन मरीजों के परिजन काफी परेशान हैं। अग्निकांड की वजह से अस्पताल के दो अन्य खंडों में सन्नाटा पसरा है। उसमें भर्ती मरीजों को उनके परिजन अन्य अस्पतालों में ले गए हैं।
भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने तथा अस्पतालों समेत अन्य प्रतिष्ठानों में अग्निशमन की व्यवस्था पर कड़ी निगरानी के लिए दमकल मंत्री जावेद अहमद खान ने पांच सदस्यीय कमिटी गठित की है। एडीजी (फायर) देवप्रिय विश्वास की अध्यक्षता में गठित कमिटी में डीजी (फायर) डीबी तरानिया, बरेन सेन (पूर्व निदेशक, फायर), अनिल चक्रवर्ती (आईएफएस) और एक चिकित्सक सुदीप्त सरकार को रखा गया है।
खान ने शनिवार को राइटर्स बिल्डिंग में विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक की और अस्पतालों सहित स्कूल, कॉलेज व अन्य प्रतिष्ठानों में अग्निशमन व्यवस्था की समीक्षा करने के बाद पांच सदस्यीय कमिटी गठित की। दमकल मंत्री ने कहा कि एडीजी फायर विश्वास की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमिटी गठित की गई है। कमिटी के सदस्य सोमवार से विभिन्न अस्पतालों सहित स्कूल कॉलेज शापिंग माल व अन्य प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण करेंगे। कमिटी सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को रिपोर्ट करेगी। खान ने कहा कि ऐसे प्रतिष्ठानों में अग्निशमन व्यवस्था में किसी तरह की खामी पाए जाने पर कार्रवाई होगी।
आमरी अस्पताल में अग्निकांड पर दमकल मंत्री ने शुक्रवार को कहा था कि अस्पताल प्रबंधन यदि अग्निशमन नियमों का पालन किया होता इतनी बड़ी घटना नहीं घटती। अस्पताल ने अग्निशमन व्यवस्था की अनदेखी की है। इस मामले में किसी को भी बक्शा नहीं जाएगा।

धू-धू कर जल रहा था अस्पताल

शंकर जालान


कोलकाता,। महानगर कोलकाता के पार्क स्ट्रीट स्थित स्टीफन कोर्ट हाउस अग्निकांड, न्यू हावड़ा ब्रिज एप्रोच रोड पर बने नंदराम मार्केट अग्निकांड, हावड़ा मछली बाजार अग्निकांड के बाद यह ऐसा बड़ा हादसा है, जिसमें कोलकाता के निजी अस्पतालों में सबसे बड़ा और आधुनिक सुविधाओं से लैस एएमआरआई (आमरी) अस्पताल ऐसा अस्पताल साबित हुआ, जो वृहस्पतिवार की आधी रात से धू-धू कर जल रहा था और दमकलवाहिनी के लोगों को जब इसकी जानकारी मिली तब तक सब कुछ खाक में मिल चुका था। स्टीफन कोर्ट अग्निकांड में चालीस से ज्यादा लोगों की जान गई थी, लेकिन तब सरकार वाममोर्चा की थी। उस वक्त तत्कालीन राज्य सरकार ने एक उच्च स्तरीय कमिटी बनाई थी। यह कमिटी स्टीफन कोर्ट घटना के तत्काल बाद सभी बड़े स्थलों का मुआयना करने में जुटी थी। अगर सचमुच यह कमिटी काम रही थी, तो आमरी जैसे शहर के बड़े अस्पताल में इतना भयावह अग्निकांड जैसे घट गया। यह सवाल अभी भी मुंह बाएं खड़ा है।
आमरी अस्पताल में 70 वर्षीय कैंसर के मरीज अजय घोषाल के परिजनों से कोई जाकर पूछे कि यह हादसा आखिर कैसा हुआ। अजय के घरवाले शुक्रवार की सुबह उन्हें अस्पताल से रिलीज करा कर घर लाने वाले थे, लेकिन किस्मत ऐसी कि वे अपने घर की जगह मरघट पहुंच गए।
ठीक इसी तरह लाश बन चुके अन्य 20 रोगियों के परिजनों से कोई पूछे मरघट का सन्नाटा उनके कलेजे को किस तरह चीर रहा है।
एक अन्य मरीज शिवानी की हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। शिवानी के पिता भानू भट््टाचार्य ने बताया कि बेटी के इलाज के लिए मैंने इस अस्पताल में लाखों रुपए दे दिए, लेकिन बदले में मिली बेटी की लाश।
एक अन्य की परिजन शंपा चौधरी ने बताया कि वे लोग त्रिपुरा के अगरतला से अपने चाचा राम दास का इलाज कराने यहां लाए थे, लेकिन राम दास अब ‘राम’ को प्यारे हो गए। शंपा ने बताया कि वे लोग वृहस्पतिवार की काली रात आमरी के विश्राम कक्ष में ठहरे हुए थे। आग जब धू-धू कर जलने तो हम लोग वहां के सुरक्षाकर्मी से मदद के लिए चिल्लाने लगे कि हमारे चाचा को जल्दी से नीचे लाओ। तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी। आमरी चंद घंटों में मरघट में तब्दील हो चुका था।
एक स्थानीय व्यक्ति उत्तम हालदार ने बताया कि आसपास के झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों ने सबसे पहले आग का गोला उड़ते देखा। उसके बाद शोर मचाया कर लोगों को जगाया। अस्पताल के सुरक्षाकर्मी भी उस वक्त झपकी ले रहे थे। दमकल को आने में काफी देर हो चुकी थी। उत्तम ने बताया- जिंदगी में पहली दफा जीवन-मृत्यु का खेल मैंने अपनी व करीब से देखा। इसे मैं कभी नहीं भूला सकता।

कितना सुरक्षित है विद्यासगर सेतु

शंकर जालान


कोलकाता, विद्यासागर सुते जिसे द्वितीय हुगली ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है आखिर कितना सुरक्षित है? इस सेतु पर पर्याप्त संख्या और सही जगह पर सीसी कैमरे नहीं लगा रहने के कारण कभी भी कोई घटना घटी सकती है। अपराधी भय मुक्त होकर कारनामा कर फरार हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम हो कि सीसी कैमरा नहीं होने के कारण उनकी पुलिस आसानी से उन्हें पहचान नहीं पाएगी। मालूम हो कि बीते दिनों राजधानी दिल्ली में एक सेतु के टॉल टैक्स कायार्लय. में कार्यरत एक कमर्चारी की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी और सीसी कैमरे के अभावन में पुलिस उनकी शिनाख्त नहीं कर पाई। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसा हादसा यहां कभी भी घट सकता है। विद्यासागर सेतु के टॉल टैक्स कार्यालय में सीसी कमैरे तो लगे हैं, लेकिन वे कायार्लय के भीतर के कामकाज को कैमरे में कैद करते है। सेतु पर होने वाली हरकत को कैद करने में वे सक्षम नहीं है।
ध्यान रहे कि हुगली नदी पर बना यह सेतु हावड़ा ब्रिज से दक्षिण की तरह करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है। स्टेड ब्रिज के रूप में यह एशिया का सबसे लंबा और दुनिया का तीसरा सबसे लंबा सेतु है, जिसमें १२२ वायर केवल लगे हैं। इसे सस्पेंशन ब्रिज भी कहा जाता है। इस सेतु की आधारशिला २० मई १९७२ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने किया था। ३८८ करोड़ की लागत से बने इस ब्रिज को करीब २० साल बाद यानी १० अक्तूबर १९९२ को आम जनता के लिए खोला गया।
कोलकाता को हावड़ा से जोड़ने और हावड़ा ब्रिज पर बढ़ते जाम को कम करने और खास कर देश के अन्य मुख्य शहरों को जोड़ने के लिए विद्यासागर सेतु को बनाया गया था।
जानकारी लेते पर पता चला कि इतने महत्वपूर्ण सेतु का सुरक्षा४ की कोई खास व्यवस्था नहीं है। सेतु पर जो सीसी कैमरे लगे हैं, लेकिन वे पर्याप्त संख्या में नहीं है और न ही उचित स्थान पर लगे हैं। हालांकि बीते १९ सालों में सेतु पर ऐसी कोई घटना नहीं घटी है।
इस बारे में सेतु प्रोजेक्ट के निदेशक विजय संचेती ने बताया कि आने वालों दिनों में सेतु की सुरक्षा बढ़ाई जाएगी। इस सिलसिले में सुरक्षा कमिर्यों ने कहा कि उनके लिए सेड (छावनी) की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्हें मौसम की परवाह किए बगैर चाहें धूप हो या बारिश उन्हें खुले आसमान की नीचे खड़ा रहकर अपना काम करना पड़ता है। कहने का मतलब जिस सेतु से रोजाना लाखों यात्री व वाहनों का आवागमन होता हो उसकी सुरक्षा पर सवालिया निशान लगा हुआ है। कहने को तो सेतु पर पुलिस वाले तैनात रहते हैं, लेकिन उनका काम केवल उन लोगों को रोकना है, जो हुगली नदी में कूदना चाहते हैं। जानकारों को मुताबिक इस महत्वपूर्ण सेतु और इस पर चलने वाले वाहनों के लिए और चुस्त सुरक्षा की जरूरत है।

कचरे के अंबार लगा है सियालदह स्टेशन परिसर में

शंकर जालान


कोलकाता,। बीते कई सप्ताह से सियालदह स्टेशन परिसर में कचरे का अंबार लगा है। इस वजह से राहगीरों व रेलयात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जहां-तहां बिखरे कचरे के साथ-साथ जाम की भी विकट समस्या है। जाम के कारण कई बार नित्य यात्री समय पर लोकल ट्रेन नहीं पकड़ पाते। लोगों का कहना है कि इस बाबत कई बार स्थानीय पार्षद से शिकायत की गई, लेकिन उन्होंने कई पहल नहीं की। नहीं है। वहीं रेलवे प्रबंधक से की गई शिकायत पर भी ध्यान नहीं दिया गया। लोगों ने बताया कि पार्षद कहती है यह काम कोलकाता नगर निगम का नहीं रेलवे का है। वहीं रेलवे प्रबंधक का कहना है कि साफ-सफाई की जिम्मेवारी नगर निगम की है। नगर-निगम व रेलवे प्रबंधक की खींचतान के बीच यात्रियों व राहगीरों को बीते कई सप्ताह से सफर करना पड़ रहा है।
इस बाबत रेलवे प्रबंधन से तो बात नहीं हुई, लेकिन वार्ड नंबर ४९ की पार्षद अपराजिता दासगुप्त ने बताया कि जहां तक नगर निगम की जिम्मेवारी और सीमा की बात है उसे नगर निगम पूरी तरह निभा रहा है। नगर निगम अधीन इलाके में रोज-सफाई होती है। इसके अलावा सियालदह स्टेशन परिसर में यात्रियों व राहगीरों को हो रही परेशानी की मुझे कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने बताया कि कभी-कभार स्ट्रीट हॉकरों की मनमानी व अवैध पार्किंग की शिकायत आती है, तो उस पर तत्काल प्रभाव से कारर्वाई कर समस्या की समाधान कर दिया दाता है।
मालूम हो कि सियालदह स्टेशन से कुछ ही दूरी पर शहर की सबसे बड़ी सब्जी मंडी है, जिसे कोले मार्केट कहा जाता है। इस मार्केट में रोजाना सैंकड़ों की संख्या में सब्जियां लदी लॉरियां आती है। चौबीस घंटे चलने वाली इस सब्जी मंडी से शहर के अन्य बाजारों के दुकानदार थोक खरीदारी करते हैं। लॉरियों के जरिए इस मंडी में सब्जियों के आने और साइकिल वैन के मार्फत वापस जाने का सिलसिला दिन-रात चलता रहता है। इस वजह से मंडी व मंडी के आसपास कूड़े का अंबार लग जाता है। कूड़े के ढेर से बदबू आने लगती है, जो राहगीरों के लिए परेशानी का कारण बनती है।
स्थानीय एक नागरिक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि कोले मार्केट से स्टेट बैक (बीबी गांगुली स्ट्रीट) करीब आठ सौ फीट रास्तों को पार करने पर पैदल यात्रियों को १० से १२ मिनट लग जाते हैं। यदि वाहन (गाड़ी) हो तो कितना समय लगेगा भगवान ही जाने। कोले मार्केट के आसपास के लोगों ने बताया कि नगर निगम अपनी जिम्मेवारी से मुंह मोड़ रहा है। मसलन साफ-सफाई, अवैझ पार्किंग की दिशा में कोई कारर्वाई नहीं हो रही है। शिकायत करने पर पार्षद का जवाब होता है, जैसा चल रहा है वैसा चलने दो।
कोले मार्केट की समस्या पर पार्षद ने अपनी सफाई में बताया कि यह शहर की सबसे बड़ी सब्जी है। यहां प्रतिदिन पांच सौ से ज्यादा ट्रक आते और खाली होते हैं। इसलिए थोड़ी-बहुत जाम समस्या तो रहेगी हीं। रही बात गंदगी कि कच्चे सब्जियों का मामला को। मैं मानती हूं कि नहीं बिकी सड़ी-गली सब्जियों से गंदगी होती है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नियमित सफाई होती है।

एक ही कमरे में चलती है एक से पांच तक की कक्षा

शंकर जालान


कोलकाता । राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस की नई सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव लाने की घोषणा की थी। मसलन सरकारी शिक्षकों को पहली तारीख को वेतन देने का मामला हो या प्रेसिडेंसी कॉलेज में मेंटर ग्रुप की गठन की बात। विश्वविद्यालय के शिक्षकों पर निगरानी रखने का मसला हो या फिर पाठ्यक्रम में बदलाव की जरूरत महसूस की गई हो। अफसोस की बात यह है कि शिक्षा की नींव पर राज्य सरकार के शिक्षा विभाग की निगाह नहीं जा रही है। इसका जीता जागता उदाहरण हैं कोलकाता नगर निगम द्वारा संचालित स्कूलों की बदहाली। ध्यान देने की बात है कि सरकारी दावे के बावजूद राज्य में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था अत्यंत्र लचर है। नगर निगम द्वारा संचालित स्कूल में एक कमरे में ही कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई हो रही है जानकारों का कहना है कि राज्य सरकार को समझना चाहिए कि उच्च शिक्षा के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में भी व्यापक सुधार व बदलाव की जरूरत है।
कोलकाता नगर निगम द्वारा संचालित स्कूलों की स्थिति बदतर है। ऐसा ही एक स्कूल है वार्ड नंबर 44 में। इस स्कूल में प्रात:कालीन उर्दू माध्यम की पढ़ाई होती है यहां सुबह छह से दस बजे तक उर्दू पढ़ाई जाती है। द्वितीय पाली यानी दिन के ग्यारह बजे से शाम चार बजे तक हिंदी माध्यम के छात्रों को शिक्षा दी जाती है। द्वितीय पाली में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई होती है और कुल 46 छात्र-छात्रों को अक्षर ज्ञान दिया जाता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि ज्यादातर दिन एक भी बच्चे स्कूल नहीं आते और दोपहर का भोजन (मीड डे मील) बनाया जाता है, जो शिक्षक व आया के काम आता है।
इस बाबत स्कूल के प्रधानाध्यापक ने बताया कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक भी बच्चा स्कूल नहीं आया हो। उन्होंने स्वीकार किया तो छात्र-छात्राओं की उपस्थिति कम जरूर रहती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि संख्या शून्य के स्तर तक आ जाती हो। उन्होंने अपनी समस्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि बीते कई महीनों से मैं अकेले स्कूल चला रहा हूं। मसलन दोपहर के भोजन की व्यवस्था करनी हो या गैस सिलेंडर बुक करना हो। बच्चों को पढ़ाना हो या परीक्षा की कॉपियों की जांच करनी हो सब काम मुझे करना पड़ रहा है। स्कूल की सारी जिम्मेवारी उनके कंधे पर है।
आप स्थानीय पार्षद रेहाना खातून या नगर निगम में शिक्षा विभाग के मेयर परिषद की सदस्य शशि पांजा से शिकायत क्यों नहीं करते? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पार्षद से कई बार कहा और उन्होंने कोशिश भी की लेकिन कामयाबी नहीं मिला। इसके कारण का खुलासा करते हुए प्रधानाध्यापक ने कहा कि शशि पांजा मेयर परिषद की सदस्य होने के साथ-साथ विधायक भी हैं। इसलिए उन पर काम का दबाव बढ़ गया है। इस वजह से वे इस ओर ध्यान नहीं दे पा रही हैं।
उन्होंने बताया कि स्थानीय पार्षद रेहाना खातून ने पुरजोर कोशिश कर इस विधायक के लिए दो महीने पहले एक शिक्षक की नियुक्ति कराई थी, लेकिन यह शिक्षक भी बीमार होने के कारण बीते कई दिनों से स्कूल नहीं आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी स्कूल में बच्चों की संख्या कम है, लिहाजा में और अधिक शिक्षक की मांग नहीं कर सकते। उन्होंने बताया कि यहां एक ही कमरे में कक्षा एक से पांच तक की पढ़ाई होती है। एक ही ब्लैक बोर्ड (श्यामपट) पर सभी बच्चों के लिए सवाल लिखे जाते हैं, जो बच्चों के लिए परेशानी का सबब है। इस बाबत स्थानीय पार्षद रेहाना खातून ने बताया कि स्कूल की तमाम समस्याओं से वे भली-भांति अवगत हैं। अगले महीने यानी नए साल में वे प्रधानाध्यापक के साथ इस बाबत विचार-विमर्श करेंगी और घर-घर जाकर लोगों से उनके बच्चों को विद्यालय भेजने का अनुरोध भी करेंगी।

हादसे के इंतजार में डेढ़ हजार से ज्यादा इमारतें

शंकर जालान


कोलकाता । महानगर कोलकाता में कहीं ना कहीं रोजाना ऐसी खबरें आती रहती हैं, जिससे यह साबित हो जाता है कि महानगर में सैंकड़ों की संख्या में खस्ताहाल व जर्जर इमारतें हैं, जो हादसे के इंतजार में है। कहना गलत न होगा कि प्रतिदिन किसी ना किसी इलाके से जर्जर इमारत का अंश ढहने और लोगों के जख्मी होने की खबर देखने व सुनने को मिलती है। बावजूद इसके कोलकाता नगर निगम इस दिशा में कोई ठोक कदम नहीं उठा रहा है। कोलकाता के मेयर शोभन चटर्जी, जिनके पास नगर निगम के भवन विभाग की जिम्मेवारी भी है। नगर निगम को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे है, लिहाजा भवन विभाग के कई जरूरी काम नहीं हो पा रहे हैं।
नगर निगम के भवन विभाग के मुताबिक महानगर में १५ सौ यानी डेढ़ हजार से ज्यादा ऐसी इमारतें है, जो कभी भी धरासाई हो सकती है औऱ दर्जनों लोगों को मौत की नींद सुला या जख्मी कर सकती है। इस दिशा में नगर निगम क्या कर रहा है? इस सवाल के जवाब में एक अधिकारी ने बताया कि हमारी जिम्मेवारी उक्त इमारत के लोगों को सूचित करना, मरम्मत के प्रति जागरूक करना और तब भी बात न बने तो इमारत के मुख्यद्वार पर सावधान को बोर्ड लगाना है। इससे अधिक हम कुछ नहीं कर सकते।
मालूम हो कि कोलकाता नगर निगम में कुल १४१ वार्ड हैं और १५ सौ से ज्यादा इमारतें खतरनाक। इस गणित से हर वार्ड में औसतन दस से ज्यादा ऐसी इमारतें हैं, जो किसी भी वक्त हादसे का शिकार हो सकती हैं।
बताते चले, बीते महीने ही दक्षिण कोलकाता के पोर्ट इलाके में वाटगंज स्ट्रीट एक इमारत का छज्जा गिर गया था। इस घटना में एक महिला समेत पांच लोग जख्मी हो गए थे। इस बाबत पुलिस ने मकान मालिक को गिरफ्तार किया था, लेकिन अदालत से उसे जमानत मिल गई। ठीक इसी तरह मध्य कोलकाता के वार्ड नंबर ४५ में बीते दिनों मकान का हिस्सा करने से एक व्यक्ति घायल हो गया था। इसी तरह कई वार्डों में दर्जनों की संख्या में ऐसी इमारते हैं, जो दुर्घटना को बुलावा दे रही हैं। इस बाबत नगर निगम के भवन विभाग के एक उच्चा अधिकारी का कहना है कि जर्जर इमारतों में साफ-साफ शब्दों में लिखा है सावधान, यह इमारत खतरनाक है। इमारत के मुख्यद्वार पर लगे ऐसे बोर्ड का मतलब यही है कि ऐसी इमारतों में खतरे से खाली नहीं है। अब कोई आ बैल मुझे मार वाली कहावत का अनुसरण करता है तो हम क्या कर सकते हैं।
यह जानते हुए भी की इमारत कभी भी गिर सकती है? मकान मालिक मरम्मत क्यों नहीं कराते? किराएदार क्यों जान जोखिमल में डालकर रहने को विवश हैं? बतौर पार्षद आप क्या भूमिका निभा रहे है? इस सवाल के जवाब में लगभग सभी राजनीतिक दलों के पार्षदों ने कहा- नगर निगम या पार्षद का काम लोगों को सचेत करना, सुझाव देना और मरम्मत के लिए प्रेरित करना है। अगर इसके बाद भी किराएदार व मकान मालिक कुछ नहीं करते तो इसमें हमारा क्या कसूर है। तृणमूल कांग्रेस की पार्षद रेहाना खातून ने कहा कि न तो ऐसा कोई कानून है और न हमारे पास अधिकार की हम जर्जर मकानों के किराएदारों को जबरन बेदखल करें या मकान मालिक को मरम्मत के लिए मजबूर।
आप के वार्ड में ही ९८ व १०० महात्मा गांधी रोड स्थित दो इमारतें खस्ता हाल है। बीत सात सालों से मकान के प्रवेशद्वार पर खतरनाक को बोर्ड लगा है। रह-रह कर ईंटें गिर रही है। दरारें बढ़ रही है। आप क्या कर रही है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि दोनो पक्षों (मकान मालिक व किराएदारों) को समझाने की प्रक्रिया जारी है।
वहीं, माकपा के पूर्व सांसद व वार्ड नंबर २० को पार्षद सुधांशु सील का कहना कि तृणमूल कांग्रेस शासित नगर निगम बोर्ड अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है। उन्होंने कहा कि मेयर शोभन चटर्जी, जो भवन विभाग भी संभाल रहे हैं, उन्हें नगर निगम मुख्यालय में कम और ममता बनर्जी के आगे-पीछे अधिक देखा जाता है। ऐसे मेयर से कुछ उम्मीद रखनी खुद को धोखे में रखने की तरह है।