Monday, May 7, 2012

जीपीओ में लगा खतों का अंबार






शंकर जालान





कोलकाता। भेजा गया खत गंतव्य स्थान तक नहीं पहुंचा या फिर मनी आर्डर से लगाया गया रुपया उनके घरवालों को नहीं मिला। लोग शिकायत करते रहते हैं कि भारतीय डाक के मार्फत पोस्ट किया गया पत्र या तो पहुंचा ही नहीं और अगर पहुंचा तो काफी विलंब से, जब उसका कोई मतलब नहीं रह गया। ठीक इसी तरह मनीआर्डर भी जरूरत के वक्त नहीं पहुंचता। इसे डाक विभाग की लापरवाही कहे या फिर पत्र और मनीआर्डर पाने वाले का दुर्भाग्य कोई फर्क नहीं पड़ता। कुल मिलाकर यहीं कहा जा सकता है कि डाक विभाग के गैर जिम्मेदाराना रवैए के कारण ही निजी कुरियर कंपनियां फल-फूल रही हंै। लेकिन इससे भारतीय डाक विभाग के अधिकारियों व कमर्चारियों को कई फर्क नहीं पड़ता। पत्र, मनीआर्डर और पार्सल के बारे में पूछने पर वे टाल-मटोल सा उत्तर देते हैं। इन दिनों शॉटिंग मशीन की गड़बड़ी के कारण महानगर के मुख्य डाकघर (जीपीओ) में शहर से बाहर जाने वाली और बाहर से आईं खतों का अंबार लगा है, लेकिन अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं।
खत हो, मनीआर्डर हो या फिर पार्सल नहीं मिलने पर लोग डाकिए के खिलाफ शिकायत करते हैं। लोगों का मानना रहता है कि डाकिए ने उन्हें पत्र, मनीआर्डर या पार्सल देने में गफलत की है। लोगों की शिकायत लाजिमी भी है और स्वभाविक भी। लेकिन अगर डाकिए को आपका पत्र, मनीआर्डर या पार्सल मिले ही नहीं तो वह आपतक उसे कैसे पहुंचाएगा। इस बारे में उनका कहना है कि हमें डाकघर से जितने खत, मनीआर्डर और पार्सल मिलते हैं वे उसे समय पर सही लोगों के हाथों में पहुंचा देते हैं, बावजूद इसके कई बार उन्हें लोगों के कोप-भाजन का शिकार होना पड़ता है।
एक डाकिए न नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि ज्यादातर मामलों में डाकघर की गड़बड़ी के कारण खत गुम होते हैं, या फिर देर से पहुंचते हैं। इसके कारण का खुलासा करते हुए उन्हें कहा कि शॉटिंग मशीन की गड़बड़ी इसकी मुख्य वजह है। उन्होंने कहा कि बीते तीन-चार सप्ताह से जीपीओ में खतों का अंबार लगा है, क्योंकि वहां की स्पीड शॉटिंग मशीन ठीक से काम नहीं कर रही है। उन्होंने बताया कि बहुत कम लोग इस बारे में जानते हैं खतों को पोस्ट करने और उसे गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में शॉटिंग मशीन की अहम भूमिका होती है। हमारा (डाकिए) काम तो बस स्थानीय डाकघर से मिले खतों को घर-घर पहुंचाना है। उनके मुताबिक जीपीओ में लाखों खतों का ढेर लगा है और इसी अनुपात में मनीआर्डर और पार्सल लंबित पड़े हैं।
इस बारे में जीपीओ के संबंधित विभाग के अधिकारियों का कहना है कि करीब दो महीने पहले खतों को इलाका (स्थानीय डाकघर) स्तर पर छांटने के लिए विदेश से स्पीड शॉटिंग नामक मशीन मंगवाई गई थी और लगभग एक महीने से वह काम नहीं कर रही है, लिहाजा यहां खतों का पहाड़ लग गया है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के अभाव में हम यह काम मेन्यूवल भी नहीं करा पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मशीन आने से पहले यहां खतों को छांटने का काम कर्मचारी ही करते थे, लेकिन मशीन आने के बाद मेन्यूवल छंटाई का काम बिल्कुल बंद हो गया और अब मशीन काम नहीं कर रही है, इसलिए यह समस्या खड़ी हो गई है। हालांकि इस बारे में जीपीओ के पोस्ट मास्टर ने कुछ भी बोलने से इंकार किया।
मालूम हो कि एक सौ करोड़ की लागत वाली इस विदेशी स्पीड शॉटिंग मशीन को जीपीओ में करीब दो महीने पहले लगाया गया था और बताया गया था कि इस मशीन के व्यवहार में आते ही खतों की छंटनी बहुत कम समय में हो जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, अलबत्ता जीपीओ में खतों का अंबार लग गया।

Sunday, May 6, 2012

पुरीने सिक्के हैं रोटी का जरिया





शंकर जालान





कोलकाता, महानगर कोलकाता की फुटपाथों पर सिक्कों की खरीद-फरोख्त से जुड़े लोगों पर अब संकट के बादल मंडराने लगे हैं। क्योंकि उनके लिए सिक्कों का संग्रह करना कठिन हो गया है। इसलिए आमदनी प्रभावित हो रही है।
महानगर कोलकाता में कई लोग प्राचीन मुद्राओं की खरीद-फरोख्त के कारोबार से जुड़े हैं। मुद्राओं का कारोबार वैध है या अवैध, यह इन कारोबारियों को नहीं मालूम। जवाहरलाल नेहरू रोड पर पुरानी मुद्रा बेच रहे डी. साहा कहते हैं कि वह पिछले तीस साल से फुटपाथ पर पुरानी मुद्राओं की दुकान लगाते आ रहे हैं। उनकी दुकान देशी-विदेशी पुरानी मुद्राओं से सजी रहती है और इनकी बिक्री से हुई कमाई से उनका परिवार चलता है। साहा कहते हैं कि अलग-अलग समय के सिक्कों की अलग- अलग कीमत होती है। सिक्कों के संग्रह के शौकीनों को इनकी कीमत देने में कोई दिक्कत नहीं होती है। वहीं, एल. घोष का कहना है कि ब्रिटिश कालीन सिक्कों को यूरोपिय देशों से आये पर्यटक चाव से खरीदते हैं। ऐसे सिक्के जिन पर महारानी विक्टोरिया व एलिजाबेथ की तस्वीर छपी हो, उसे अधिक कीमत देकर वे खरीदते हैं। वे कहते हैं कि अब सिक्कों का संग्रह करना कठिन हो गया है। इसलिए आमदनी भी प्रभावित हो रही है। इटली, सिंगापुर व मलेशिया व खाड़ी देशों की मुद्राएं खासी कीमत में बिकती हैं। मुद्राओं का संग्रह करने वालों की संख्या भी धीरे-धीरे कम हो रही है। अब कारोबार विदेशी पर्यटकों के भरोसे रह गया है।
गौरतलब है कि पुरानी देशी विदेशी मुद्राओं की कीमत वर्तमान में आसमान छू रही है। वर्ष १८३५ के आधा आना के तांबे के सिक्के दो सौ से ढाई सौ रुपए में बिक रहे हैं। वर्ष १९४४ व १९४५ में प्रचलन में रहे दो आने के सिक्के की कीमत दस रुपए, १९१७, १९१८, १९३४ और १९४१ के बने १/४ आना के तांबे के सिक्के १५ रुपए में बिक रहे हैं।

Saturday, May 5, 2012

परिवर्तन पर पछतावा






शंकर जालान




एक साल जाते न जाते पश्चिम बंगाल की जनता को राज्य में ३४ साल बाद हुए सत्ता परिवर्तन में पछतावा होने लगा है। राज्य की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की कार्य पद्धति ज्यादातर लोगो को रास नहीं आ रही है। केंद्र पर दवाब डालने का मामला हो या विपक्ष को फटकारने का, ममता सबसे आगे हैं। नि-संदेह दुनिया के सौ चुनिंदा लोगों में ममता का नाम शामिल होने से वे खुद पर फूली नहीं समा रहीं हो, लेकिन हकीकत यह है ममता बनर्जी आजकल गलत कारणों से चर्चा में हैं। इन दिनों ममता अपनी न समझ आ पाने वाली कार्रवाइयों के कारण आलोचनाओं का शिकार हो रही हैं, जैसे कि उनको बुरे तरीके से प्रदॢशत करते एक कार्टून के कारण एक शिक्षाविद् को गिरफ्तार करना या अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से किसी माकपा परिवार में शादी न करने के लिए कहना या शहर में नीला रंग करना या फिर खुद का न्यूज चैनल व समाचार-पत्र निकलाने की बात हो। हर रोज एक नई चीज सामने लाना उनकी असहनशीलता को दर्शाता है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि कुछ महीनों से राज्य में परिवर्तन का उत्साह मंद पड़ गया है या फिर लोगों को परिवर्तन पर पछतावा होने लगा है।
बीते साल मई में विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की जबरदस्त जीत के बाद ममता एक चमत्कारिक व्यक्ति बन सामने आईं थीं। एक ऐसी नेता के लिए, जिसने जबरदस्त सौहार्द तथा विशाल बहुमत के साथ 34 वर्षों बाद साम्यवादियों से छुटकारा पाकर इतिहास रचा है, लेकिन उनके कारमानों ने  आलोचकों को जल्द मुंह खोलने का मौका दे दिया।
एक समय था जब माकपा मीडिया पर ममता के प्रति पक्षपाती होने व उन्हें विशेष प्रचार देने का आरोप लगाती थी। आज ममता दीवार की दूसरी तरफ हैं। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि वह मीडिया के साथ-साथ लोगों की निगाह में हैं जिन्होंने उन्हें इतना बड़ा जनादेश दिया था। जनता ने उन्हें वोट दिया, वह आशा कर रही थी कि उनका प्रशासन खुला तथा भविष्यपरक होगा। इसकी बजाय उन्होंने 9 मंत्रालय संभाल कर सभी शक्तियां अपने में केन्द्रित कर ली हैं जिससे निर्णय लेना और भी कठिन हो गया है क्योंकि हर बात का निर्णय उन्हीं को लेना होता है।
आखिर क्यों ममता का मीडिया से इतनी जल्दी मोह भंग हो गया। क्यों ‘हनीमून’ समाप्त होने से पहले ही मीडिया की रसिया ममता बनर्जी को पुष्पगुच्छों की बजाय आलोचना का सामना करना पड़ रहा है? ऐसा अत्यधिक आशाओं तथा बहुत कम कार्य के कारण है। या फिर यह इसलिए तो नहीं कि अनुभवहीन मुख्यमंत्री परिणाम देने में अक्षम हैं? या फिर इसलिए तो नहीं कि अपना समर्थन करने वाले लोगों को पक्के तौर पर अपने पक्ष में मान लिया है?
सबसे पहली बात यह है मुख्यमंत्री अपनी पहले वाली झगड़ालू नेता की भूमिका से बाहर नहीं निकली पाई हैं। इस प्रवृत्ति ने तब काम किया, जब वह विपक्ष में थी, लेकिन यह तब काम नहीं आएगी जब वह शासक हैं। उन्हें अवश्य पता होना चाहिए कि इन दोनों भिन्न-भिन्न भूमिकाओं के लिए उन्हें अलग-अलग नीतियां अपनानी होंगी। एक अखबार के मुताबिक ममता के आलोचकों को भय है कि ममता ने ‘एलिस इन वंडरलैंड’ में ‘रैड क्वीन’ की टोपी पहन ली है जो यह कहती-फिरती थी कि जिस किसी को भी वह पसंद नहीं करती उसका सिर कलम कर दो।
दूसरे, उन्हें निर्णय लेने की शक्ति का विकेन्द्रीयकरण करना होगा ताकि निर्णय तेजी से लिए जा सकें। उन्होंने एक शानदार टीम चुनी है लेकिन इस वक्त सब कुछ इस बात की प्रतीक्षा में है कि उनका इरादा क्या बनता है? उन्हें कुछ मंत्रालय भी छोडऩे होंगे ताकि बड़े नीति मामलों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए समय निकाल सकें।
ममता को यह एहसास होना चाहिए कि यह लोकतंत्र है, जिसने उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है और लोगों के पास अभिव्यक्ति का अधिकार तथा कार्रवाई करने की स्वतंत्रता है। यदि इन्हें दबाया गया तो परिणाम विनाशकारी होंगे। उन्हें गलत तरीके से दर्शाने वाले एक कार्टून के लिए प्रोफैसर को गिरफ्तार करने के हालिया मामले के कारण न केवल हर कहीं उनके खिलाफ प्रदर्शनकारी उठ खड़े हुए हैं बल्कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी, जिसने चुनावों से पूर्व उनका समर्थन किया था। जितनी उनकी आलोचना होती है, उतनी ही वह असहनशील बन जाती हैं।
ममता ने अभी कार्यकाल की बीस फीसद भी पूरा नहीं किया है। डर है कि यदि आलोचना ऐसे ही जारी रही तो क्या होगा? अगले वर्ष होने वाले पंचायती चुनावों में उनका कड़ा परीक्षण होगा। माकपा की हालिया कांग्रेस में अभी ममता का सामना करने की बजाय पार्टी के पुननिर्माण का निर्णय लिया गया। यदि वास्तव में माकपा ऐसा करती है तो ममता के सामने गंभीर चुनौती होगी। कामरेडों द्वारा विपरीत प्रतिक्रिया का लाभ उठाए जाने की संभावना है।
यह सच है कि ममता एक बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आई हैं। इसके साथ ही उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी भी मिली है। यदि अत्यधिक नियंत्रण बरता गया तो अपने लोगों को साथ बनाए रखना शीघ्र ही उनके लिए समस्या बन जाएगी नि:संदेह उनकी पार्टी के लोगों को यह एहसास है कि वे उनकी निजी लोकप्रियता के कारण जीते हैं लेकिन उन्हें अत्यधिक नियंत्रण के साथ दीवार की ओर नहीं धकेला जाना चाहिए जो वह उन पर इस्तेमाल कर रही हैं।
ममता को अपने लोगों को साथ बनाए व उनको खुश रखने की युक्ति सीखनी होगी। पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पहले रेल बजट पर उनका विरोध करके अपनी हिम्मत दिखा चुके हैं जिसके लिए उन्हें अपना पद खोना पड़ा। अब एक अन्य विद्रोही सासंद कबीर सुमन कार्टून मामले पर अपनी कविताओं के माध्यम से उनका मखौल उड़ा रहे हैं।
इस सबका अर्थ यह नहीं कि इन कुछ महीनों के दौरान ममता ने कुछ भी नहीं किया है। लोगों की जुबान पर माओवादियों से निपटने में किए गए उनके प्रयासों का जिक्र है। उन्होंने केन्द्रीय बलों को हमेशा सक्रिय रखा है और माओवादी क्षेत्रों में विकास तथा नौकरियों के लिए बहुत धन उपलब्ध करवाया है। यहां तक कि उनके कट्टर आलोचक भी इस प्रयास के लिए उनको श्रेय देते नजर आए।
ममता का अभी भी अपना एक गुट है और कुछ गैर-कांग्रेस मुख्यमंत्रियों के साथ उनका अच्छा तालमेल है और जब कभी भी वह केन्द्र का सामना करना चाहेंगी, वे आगे बढ़ कर उनका साथ दे सकते हैं।
जानकार मानते हैं कि केन्द्र को जब तक उनके समर्थन की जरूरत है, वह उनके नखरे उठाता रहेगा। ममता के अभी भी समर्थक हैं जो उनकी तरफ देखते हैं और ममता को सुनिश्चित करना होगा कि उनका जल्दी ही उनसे मोहभंग न हो जाए। आगामी लोकसभा चुनावों से पहले उन्हें और भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, लेकिन इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है विधानसभा चुनावों के दौरान कमाई नेक-नीयति को न खोना।

पहनावे पर विवाद में पादरी




शंकर जालान



देश की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कोलकाता के  शहर के एक पादरी आर्क बिशप को चर्च में महिलाओं का मॉडर्न ड्रेस में आना पसंद नहीं। उन्होंने बीते दिनों महिलाओंप्रार्थना के दौरान पारदर्शी, चुस्त और छोटे कपड़े पहन कर नहीं आने की नसीहत दी। उनका मानना है कि इससे प्रार्थना में भिग्न पैदा होता है। पदारी की यह नसीहत कई लोगों को नागवार गुजरी। इससे पहले किसी पदारी ने इस तरह की सीख नहीं दी थी। चर्च में इस तरह के ड्रेस कोड का यह देश का पहला मामला है। जिस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है। कई महिलाइों ने इसे अपनी आजादी का हनन माना है।
बीते दिनों रोमन कैथोलिक चर्च के प्रधान आर्क बिशप थॉमस डिसूजा ने प्रार्थना के दौरान यह नसीहत देते हुए कहा था कि चुस्त व छोटे वस्त्र भद्दे दिखते हैं। उनका मानना है-पारदर्शी कपड़े भी लड़कियों की शालीनता का मजाक उड़ाते हैं। महिलाओं को वैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, जिससे उनकी देह झलकती हो। विशेष कर प्रार्थना के समय तो ऐसे कपड़ों को बिल्कुल ही नहीं पहनने चाहिए। वैसे बिशप ने इस बाबत कोई फतवा जारी नहीं किया है। चर्च में आने वाली महिलाओं से सिर्फ अपील भर की है। उन्हें उम्मीद है कि इस अपील का असर पड़ेगा और महिलाएं चर्च में आते वक्त छोटे कपड़े पहनने से पहरेज करेंगी।
पादरी के इस बयान पर महानगर में ईसाई समुदाय के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई है। ईसाई समुदाय की युवतियों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि उनकी आजादी का हनन है। उनका धर्म बिशप को इस बात की इजाजत नहीं देता कि वह कोई ड्रेस कोड लागू करें। महानगर के प्रोटेस्टेंट ईसाई भी इस नसीहत को गैरजरूरी मान रहे हैं। कई अन्य चर्च के पादरी व ईसाई स्कूलों की प्रधानाध्यापिकाएं भीा बिशप की नसीहत से खफा हैं। इन लोगों का तर्क है कि आज के जमाने में हम सौ साल पुराने कपड़े पहनने को बाध्य नहीं कर सकते।
ध्यान रहे कि कोलकाता में ब्रिटिश राज के कुछ चुनिंदा क्लब ड्रेस कोड को अभी भी अहमियत देते हैं। समय-समय पर इसको लेकर विवाद भी होते रहे हैं। प्रख्यात बांग्ला चिज्ञकार शुभप्रसन्न को ऐसे ही एक क्लब ने धोती, कुर्ता और चप्पल के कारण प्रवेश से रोक दिया था। इसके बाद काफी बवाल मचा था।
जानकारों का मानना है कि पोशाक पहनने का अधिकार पूरी तरह से व्यक्तिगत है। जहां तक प्रार्थना सभा में मर्यादित कपड़े पहनने की बात है, लोगों को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन जबरदस्ती महिलाओं या युवतियों पर किसी तरह का ड्रेस कोड लादना बिल्कुल उचित नहीं है।

Sunday, April 22, 2012

पश्चिम बंगाल - कार्टून पर बवाल





शंकर जालान



बीते सप्ताह पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक कार्टून न केवल चर्चा का विषय बना, बल्कि इस कार्टून पर काफी बवाल भी मचा। यहां तक कि इंटरनेट पर कार्टून जारी करने वाले यादवपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले रसायन के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र और उनके पड़ोसी सुब्रत सेनगुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि अदालत से दोनों को जमानत मिल गई, लेकिन इस घटनाक्रम ने जहां लोगों को यह बता दिया कि सत्तासीन पार्टी तृणमूल कांग्रेस कुछ भी बोलने या लिखने वालों के ऐसा ही किया जाएगा। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के सहयोगी पार्टी कांग्रेस के साथ-साथ मुख्य विपक्षी दल माकपा के आलावा भाजपा ने कार्टून मसले पर प्रोफेसर व उनके पड़ोसी की गिरफ्तार का सत्ता का गलत उपयोग बताया।
आपको बताते चले की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, रेल मंत्री मुकुल राय और पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पर केंद्रित कार्टून इंटरनेट पर जारी किया गया था, जिसे तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेता अपमानजनक कार्टून की संज्ञा दे रहे हैं। सूत्रों की माने तो तृणमूल कांग्रेस की सह पर ही पुलिस ने प्रोफेसर और उनके पड़ोसी को गिरफ्तार किया। हालांकि कोलकाता पुलिस के उपायुक्त  (दक्षिण) सुजय चंदा ने कहना है कि  प्रोफेसर को कार्टून के लिए नहीं बल्कि कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों के बारे में अपमानजनक बातें इंटरनेट पर डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। है। शुक्रवार ने जब उनसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों का नाम जानना चाहा, तो उन्होंने  नामों का खुलासा करने से इंकार कर दिया।
इस बारे में जानकारों लोगों का कहना है कि कार्टून में इस तरह का कुछ नहीं था, जिससे तृणमूल कांग्रेस को अपमान बोध हो और प्रोफेसर को गिरफ्तार करना पड़े। इन लोगों ने कहा कि तमाम अखबारों में कार्टून छपते हैं, कुछ अखबारों में तो कार्टून के एक विशेष स्थान तय होता है। कार्टून बनाने वाले कई बार यह दिखाने की कोशिश करते हैं, कि इनदिनों देश, दुनिया, समाज, फिल्म या फिर राजनीति में क्या हो रहा है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा  सकता है कार्टून जिस पर बना हो उसे नागवार लगता हो, लेकिन इसे भी झुठलाया नहीं जा सकता कि कार्टून देखने व पढ़ने वाले कार्टूस्टि की सोच की तारीफ जरूर करते हैं। ध्यान नहीं आता कि कार्टून को लेकर किसी देश, समाज, पार्टी, नेता या फिर व्यक्ति ने इतना बवाल मचाया हो और कार्टून बनाने या जारी करते वाले को इसकी कीमत गिरफ्तार होकर चुकानी पड़ी हो।
पुलिस का कहना है कि प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और सूचना तकनीक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन्हें साइबर क्राइम अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था। तृणमूल कांग्रेस के समर्थक भले ही पुलिस कार्रवाई को जायज ठहरा रहे हो और यह कहते फिर रहे हो कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और पार्टी के अन्य नेताओं से संबंधित अपमानजनक कार्टून बनाने तृणमूल सरकार की नीतियों का मखौल उड़ाने वाले का भविष्य में भी यही हश्र होगा। लेकिन उसकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस ने ममता के इस कदम की निंदा की है। कांग्रेस सांसद मौसम बेनजीर नूर का कहना है कि यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश सचिव राहुल सिन्हा ने सरकार की इस कार्रवाई को सत्ता का दुरुपयोग करार दिया है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता और राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सूर्यकांत मिश्र इस वाकिए को अत्यंत हास्यास्पद बताया। उन्होंने कहा कि इस घटना से साफ हो जाता है कि सहनशीलता का अभाव है। भापका के राज्य सचिन मंजू कुमार मजुमदार ने कहा कि राज्य सरकार लोगों के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन कर रही है।
कांग्रेस, भाजपा, माकपा और भाकपा के नेताओं के बयान को गैर जरूरी बताते हुए राज्य के शहरी विकास मंत्री फिरहाद हाकिम कहते हैं कि इस तरह की किसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।  परिवहन मंत्री मदन मित्र कहते हैं कि प्रोफेसर ने जो किया वह शिक्षक की गरिमा के खिलाफ है। श्रम मंत्री पूर्णेंदु बसु कहना है कि यह ममता बनर्जी का अपमान कर उनकी छवि पर धूमिल करने का प्रयास किया गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि माकपा मेरी छवि खराब करने के लिए तरह-तरह के मुद्दे उछाल रही है। माकपा के नेता इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि कैसे मुझे फंसाया जा सके और बदनाम किया जा सके।
वहीं, तृणमूल के बागी सांसद कबीर सुमन ने कहा कि उन्होंने कार्टून देखा है,  लेकिन वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह किस प्रकार साइबर अपराध है। यह हास्य व्यंग्य के रूप में बनाया गया है। अगर आज प्रोफेसर को गिरफ्तार किया गया है तो कौन जानता है कल हमें भी गिरफ्तार किया जा सकता है।  सुमन कहते हैं कि मुझे भी वह कार्टून ई-मेल से मिला है। लेकिन उसमें वैसी कोई अपमानजनक बात नजर नहीं आती। ममता के करीबी समझे जाने वाले जाने-माने शिक्षाविद् सुनंद सान्याल ने भी इस घटना की निंदा की है। उन्होंने कहा कि राज्य के लोगों ने इस बदलाव की उम्मीद नहीं की थी। अभिनेता कौशिक सेन ने सवाल किया कि कार्टून बनाने वाले को गिरफ्तार करना कहां का कानून है? यह प्रवृत्ति खतरनाक है। यही सिलसिला जारी रहा तो बाद में हमारे नाटकों   पर भी पाबंदी लगा दी जाएगी और घरों पर हमले किए जाएंगे।
दूसरी ओर, प्रोफेसर की गिरफ्तारी के खिलाफ में यादवपुर व प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में छात्रों व शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन किया और जुलूस निकाला। विश्वविद्यालय के दूसरे प्रोफेसरों का मानना है कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करना कोई जुर्म नहीं हैं और इसके लिए किसी को गिरफ्तार करना अनुचित है। यादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संगठन के अध्यक्ष पार्थ प्रतीम विश्वास ने बताया कि आए दिन अकसर पत्र-पत्रिकाओं में सरकार व मंत्रियों के खिलाफ व्यंगात्मक कोलॉज व लेख प्रकाशित किए जाते हैं पर उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती तो फिर इस मामले में प्रोफेसर को किस वजह से गिरफ्तार किया गया। इस घटना कि निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि देश में हर व्यक्ति को अपनी बातों को समाज के समक्ष रखने की आजादी है।  उन्होंने कहा कि एक तरह लोगों का वाहवाही लूटने के लिए ममता बनर्जी बीमार काटूनिस्ट को देखने अस्पताल जाती हैं और दूसरे ओर कार्टून बनाने वाले की गिरफ्तारी को जायज बता रही हैं। उन्होंने कहा कि  शिक्षकों का एक प्रतिनिधिमंडल इस मुद्दे पर राज्यपाल एमके नारायणन से मिलेगा।
मालूम हो कि प्रोफेसर का इंटरनेट पर जारी  कार्टून सत्यजीत रे की फिल्म सोनार केल्ला पर आधारित है। उसमेंं कथित तौर पर पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाने के लिए ममता बनर्जी और मुकुल राय को आपस में बातचीत करते हुए दिखाया गया है। ध्यान रहे कि रेल बजट में किराया बढ़ाने के बाद ममता और पार्टी के दबाव में त्रिवेदी को रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

Friday, April 13, 2012

तृणणूल कांग्रेस के दो रंग

शंकर जालान




तीन अप्रैल को पश्चिम बंगाल की जनता को चंद घंटों के दौरान ही तृणमूल
कांग्रेस के दो अलग-अलग रंग देखने को मिले। पहला रंग पार्टी के विधायक की
दबंगगिरी का और दूसरा रंग पार्टी प्रमुख की दरियादिली का। पढा था कि
गिरगिट रंग बदलने में माहिर होते हैं और सुना था कि नेता मौका पाकर रंग
यानी पाली बदल लेने हैं, लेकिन एक ही पार्टी के विधायक और उस पार्टी के
प्रमुख के अलग-अलग रंग पहली बार देखने को मिला।
तृणमूल कांग्रेस के फूलबागान इलाके के विधायक पारेश पाल ने उत्तर कोलकाता
स्थित उल्टाडांगा में प्रदर्शन कर रहे आटो चालकों को बेरहमी से पीट कर
अपनी दबंगी का परिचय दिया। विधायक ने कई आटो चालकों को कान-पकड़कर
उठख-बैठक भी कराई। कई चैनलों पर दिखाई गए इस कांड पर जब शुक्रवार ने
विधायक से पूछा क्या कानून हाथ में लेकर आपसे सही किया ? पहले तो वे जवाब
देने से कतराते रहे, लेकिन उनसे कहा गया कि आप के कृत को सभी ने न्यूज
चैनलों में देखा है तो उन्होंने तपाक से कहा जो किया अच्छा किया।
तृणमूल कांग्रेसी विधायक की दबंगगिरी ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया
कि क्या ये वहीं राजनीति दल है जो मां-माटी-मानुष के नारे के साथ
सत्तासीन हुई थी। बीते साल हुए विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी के
उम्मीदवार, नेता व समर्थक यह कहते थे कि हम जनता के साथ रहेंगे। हर
सुख-दुख में खड़े दिखेंगे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस विधायक पारेश पाल के
जघंन्य कांड ने लोगों को सोचने को बाध्य कर दिया कि हमने यह कैसा
परिवर्तन किया। माकपा रूपी सांप नाथ के स्थान पर तृणमूल रूपी नाग नाथ को
सत्ता की चाबी दे दी।
ध्यान रहे कि इससे पहले में ममता के भतीजे के पुलिस अधिकारी को थप्पड़
मारकर यह बता दिया था कि अब राज्य में तृणमूल की सत्ता है और तृणमूल के
समर्थक जो कर रहे हैं वहीं सही है।
राजनीति के जानकार मानते हैं कि बीते दस महीनों के दौरान ममता के नेतृत्व
वाली तृणमूल सरकार ने कार्य प्रणाली से यह साफ हो गया है कि परिवर्तन के
नाम पर केवल झंडा बदला है। सही मायने में राज्य की स्थित बदतर हुई है।
राज्य की बागडोर की महिला के हाथों में होने के बावजूद न केवल महिलाओं पर
अत्याचार बल्कि बलात्कारों की घटना में काफी इजाफा हुआ है। राज्य की
महिलाओं की सुरक्षा और स्थिति का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग
का प्रतिनिधिमंडल में राज्य का दौरा कर चुका है।
राजनीति के पंडितों की माने तो लोकतांत्रिक प्रणाली में शासन कानून से
चलता है। ऐसे में, किसी भी दल के नेता, विधायक और पार्षद को कानून हाथ
में लेकर मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती। यदि कोई सीमा का उल्लंघन
करता है, तो उसकी
चौतरफा भ‌र्त्सना होनी चाहिए। प्रशासनिक कार्यो में रोक-टोक व नेताओं
द्वारा कानून हाथ में लेने से विधि-व्यवस्था बिगड़ सकती है। कानून को
अपना काम करने देना चाहिए। नहीं तो लोग समझेंगे कि सत्ता की ताकत का
प्रदर्शन किया जा रहा है।
इस मामले में बुद्धिजीवियों ने सवाल उछाला कि कोई नेता यह कैसे तय सकता
है कि वह जो कह रहा है या कर रहा है, वही ठीक है?
तृणमूल विधायक ने पूर्व उल्टाडांगा में जिस ढंग से अपने समर्थकों के साथ
सड़क जाम व बसों में तोड़फोड़ कर रहे आटो चालकों की पिटाई की और कान पकड़
कर उठक-बैठक कराया, उसे लेकर माकपा समेत अन्य राजनीतिक दलों के साथ-साथ
आम लोग भी
तरह-तरह के सवाल उठा लाजिमी हैं।
यह ठीक है कि आटो चालकों ने बसों पर पथराव व सड़क जाम कर गलत किया था,
लेकिन उससे पुलिस तो निपट रही थी। ऐसे में जनप्रतिनिधि खुद सजा कैसे दे
सकते हैं? आज यदि विधायक व पार्षद ऐसे अपनी ताकत का इस्तेमाल करेंगे तो
पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच क्या संदेश जाएगा? राजनीति में इस तरह के
रास्ते को आम जनता कतई पसंद नहीं करती हैं, जिससे अशांति को बढ़ावा मिले।
भले ही तृणमूल कांग्रेस के नेता यह कह रहे हो कि माकपा ने माकपा ने आटो
चालकों को भड़का कर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की। किंतु, इसके
लिए कानून तोड़ने की जरूरत क्यों महसूस हुई? अवरोध हटाने के लिए वह
स्थानीय पुलिस की मदद ले सकते थे, पर ऐसा नहीं कर वे समर्थकों के साथ आटो
चालकों को दंडित कर शक्ति प्रदर्शन करने पहुंच गए, जो गैर कानूनी है।
सरकार यदि यह कहती है कि कानून अपना काम करेगा तो सवाल उठना स्वभाविक है
कि किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार कहां से मिला कि वह किसी को भी सरेआम
दंडित करे? यदि इसके बाद स्थिति बिगड़ जाती तो इसके लिए जिम्मेवार कौन
होता?
वहीं दरियादिली का दूसरा रंग दिखाते हुए राज्य के मुख्यमंत्री ममता
बनर्जी ने नेताजी इंडोर स्टेडियम में इमामों के सम्मलेन को संबोधित करते
हुए राज्य के तीस हजार इमामों को प्रति महीने ढाई हजार रुपए देने का एलान
कर दिया। ममता के अस एलान पर प्रदेश भाजपा समेत अन्य विपक्षी दलों ने
कड़ी प्रतिक्रिया जाहि्र की। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष राहुल सिन्हा ने तो
यहां तक कह दिया कि वे इस एलान के खिलाफ अदालत जाएंगे।

Thursday, April 5, 2012

तृणमूल का तुगलकी फतवा

शंकर जालान






बीते सप्ताह तृणमूल कांग्रेस के एक फतवे ने न केवल विपक्षी दलों बल्कि
बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, फिल्मकारों व अदाकारों के साथ-साथ आम जनता
को भी तृणमूल कांग्रेस की मनमानी व गैर जरूरी फरमान के खिलाफ मुखर होने
का मौका दे दिया। तृणमूल कांग्रेस की ओर से जारी आदेश में कहा गया था कि
राज्य में सरकारी और सरकारी सहायताप्राप्त पुस्तकालयों में बांग्ला के
पांच, उर्दू के दो और हिंदी का एक अखबार ही रखा जा सकेगा। सरकारी आदेश
में बकायादे इन तीनों भाषाओं के नाम तक का जिक्र कर दिया गया था।
इस आदेश के खिलाफ न केवल विपक्षी दलों बल्कि बुद्धिजीवियों,
साहित्यकारों, फिल्मकारों व अदाकारों के साथ-साथ आम जनता को लामबंद होते
देख राज्य के पुस्तकालय मंत्री अब्दुल करीम चौधरी ने कुछ संशोधन किया और
इस सूची में पांच अखबारों के नाम और जोड़े। इन पांच अखबारों में
अंग्रेजी, नेपाली और संथाली के एक-एक अखबार और बांग्ला भाषा के दो अन्य
अखबार शामिल किए गए।
संशोधन के बावजूद लोग इस फतवे को तुगलकी फरमान मान रहे हैं। किसी ने
राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है, तो किसी
ने राज्यपाल एमके नारायणन से भेंट कर उन्हें ज्ञापन देकर इस मामले में
दखल देना का अनुरोध किया है।
लोगों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस का यह फऱमान मुगल सम्राट मोहम्मद
बिन तुगलक की स्मृति को एक बार फिर से तरो-ताजा करने में इनके लिए सहायक
रहा है। लोगों ने सवाल उछाला कि पुस्तकालय मंत्री ने आखिर किस अधिकार
से सरकारी और सरकारी सहायताप्राप्त पुस्तकालयों में ऱखे या खरीदे जाने
वाले अखबारों के नाम का एलान कर दिया ? क्या हमें कौन सा अखबार पढ़ना है
इसका फैसला राज्य सरकार या पुस्तकालय मंत्री या फिर मुख्यमंत्री करेंगी ?
सरकारी आदेश में कहा गया कि सरकारी व सरकारी सहायताप्राप्त करीब २४५०
पुस्तकालयों में वहीं अबबार रखें जाएंगे, जो स्वतंत्र विचार के परिचायक
हैं। संशोधन के बाद जारी आदेश में अखबार की संख्या, भाषा और नाम का भी
साफ-साफ उल्लेख हैं। सरकारी आदेश के मुताबिक सरकारी व सरकारी सहायता वाले
पुस्तकालयों में बांग्ला के सात (सबाल बेला, खबर ३६५ दिन, बांग्ला
स्टेट्समेन, प्रतिदिन, आजकल, कलम (जिसका प्रकाशन अभी शुरू नहीं हुआ है)
और एक दिन), उदू के दो (आजाद हिंद व अखबार-ए-मशरीक) और हिंदी में एक
(सन्मार्ग), अंग्रजी में एक (टाइंस आफ इंडिया) व संथाली व नेपाली के
एक-एक अखबारों के नाम है।
जैसे ही इस फतवे के पीछे मुख्यमंत्री का नाम जुड़ा भले ही राज्य के
पुस्तकालय मंत्री अब्दुल करीम चौधरी मुख्यमंत्री के बचाव में यह कहते
फिरे की यह फैसला विभागीय है और इससे ममता बनर्जी का कोई लेना-देना नहीं
है। लेकिन ज्यादातर लोग पुस्तकालय मंत्री अब्दुल करीम चौधरी के तर्क को
हजम नहीं कर पा रहे हैं। लोगों का कहना है कि ममता बनर्जी ऐसा कर
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले अखबारों पर सेंसरशिप लगाने का
प्रयास कर रह है, जो लोकतंत्र के लिए किसी भी नजरिए से सही नहीं है। यह
फैसला इमरजेंसी (आपालकाल) से घातक होगा।
बांग्ला के जानेमाने साहित्यकार व साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील
गंगोपाध्याय, लेखिका महाश्वेता देवी, फिल्मकार मृणाल सेन, पत्रकार
ओमप्रकाश जोशी समेत कई लोग ने इसे गैर जरूरी बताया। लोगों ने कहा- ममता
बनर्जी की अपनी पसंद हो सकती है वे निजी तौर पर किसी अखबार को पंसद या
नापसंद कर सकती हैं, लेकिन पुस्तकालय में रखे जाने वाले अखबारों के बारे
में उनका आदेश सरासर गलत है।
इन लोगों का मत है संभवत: देशभर में ममता बनर्जी पहली ऐसी मुख्यमंत्री या
किसी पार्टी की प्रमुख होंगी, जिन्होंने इस तरह का फरमान जारी किया है।
लोगों का कहना है कि समाचार पत्र को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है
और ममता ने अपने फैसले से इस स्तंभ को ध्वस्त करने की कोशिश की है।
पत्रकार ओमप्रकाश जोशी ने कहा कि खर्च में कटौती करने के मसकद से
मुख्यमंत्री या राज्य सरकार उन पुस्तकालयों को राय दे सकती है कि सरकार
तीन या चार या फिर पांच अखबार का खर्च ही वहन करेगी। जहां तक अखबारों के
चयन की बात थी यह अगर पुस्तकालय अध्यक्ष पर छोड़ा जाता तो ज्यादा बेहतर
होता। संख्या और भाषा तक तो ममता बनर्जी की हां में हां मिलाई जा सकती
है। लेकिन ममता बनर्जी ने हिंदी, बांग्ला और उर्दू के अखबारों के नाम का
जिक्र कर लोगों को उनके खिलाफ बोलने का मौका दे दिया है। मुख्यमंत्री ने
अपने पहले फरमान में हिंदी का एक, उर्दू का दो और बांग्लाभाषा के पांच
अखबारों को जिक्र किया था। इससे उनकी मंशा साफ हो जाती है कि वे
पुस्तकालय में आने वाले लोगों को वही पढ़ाना चाहती है, जो उनके या उनकी
सरकार के पक्ष में हो। हालांकि चौतरफा निंदा और हो-हल्ले के बाद इस सूची
में पांच अखबारों को और जोड़ा गया। जोशी ने कहा- आर्थिक तंगी तो एक बहाना
है। बात दरअसल पैसे की होती तो ममता पुस्तकालयों में केवल अंग्रेजी अखबार
रखने की वकालत करती। क्योंकि हिंदी, बांग्ला और उर्दू की तुलना में
अंग्रेजी अखबार सस्ते हैं। मजे की बात यह है कि रद्दी में भी अंग्रेजी
अखबार अन्य भाषाओं के अखबार की अपेक्षा अधिक कीमत पर बिकते हैं।
साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय ने सरकारी अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा
कि जहां तक मुझे जानकारी है सरकारी आदेश में कहा गया है कि पाठकों के हित
में सरकारी पैसे से ऐसा कोई अखबार नहीं खरीदा जाएगा जो प्रत्यक्ष या
परोक्ष तौर पर किसी राजनीतिक दल की सहायता से छपता हो। यानी इस सूची में
शामिल अखबारों के अलावा बाकी तमाम अखबार सरकार की नजर में किसी न किसी
राजनीतिक दल से सहायता हासिल करते हैं। कोलकाता से हिंदी के नौ अखबार
निकलते हैं, लेकिन सरकारी सूची में वही इकलौता अखबार शामिल है जिसके
मालिक को ममता ने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा में
भेजा है। उन्होंने कहा कि वाममोर्चा के शासनकाल में तमाम सरकारी
पुस्तकालयों में बाकी अखबारों के अलावा माकपा का मुखपत्र गणशक्ति खरीदना
अनिवार्य था, लेकिन उसके लिए कोई लिखित निर्देश जारी नहीं किया गया था।
अब सरकार जिन अखबारों को साफ-सुथरा और निष्पक्ष मानती है उनमें से
ज्यादातर को तृणमूल कांग्रेस का समर्थक माना जाता है। सरकार की इस सूची
में सबसे पहला नाम बांग्ला दैनिक संवाद प्रतिदिन का है। उसके संपादक और
सहायक संपादक दोनों तृणमूल के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं। दूसरे अखबारों
का भी ममता और तृणमूल कांग्रेस के प्रति लगाव जगजाहिर है। उनके मुताबिक
सरकार यह तय करती है कि पाठक कौन से अखबार पढ़े तो बंगाल की जनता के लिए
इससे शर्म की बात और कुछ नहीं हो सकती।
दूसरी ओर, राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता व राज्य के मुख्य स्वास्थ्य
मंत्री सूर्यकांत मिश्र, फारबर्ड ब्लॉक के राज्य सचिव अशोक घोष, प्रदेश
भाजपा के अध्यक्ष राहुल सिन्हा, कांग्रेस सांसद अधीर चौधरी के साथ-साथ
तृणमूल के सांसद कबीर सुमन ने ममता सरकार के इस फरमान को तुलगकी आदेश
करार दिया है।
ध्यान रहे कि ममता ने जिन अखबारों के नाम का उल्लेख किया है, वे कहीं ना
कहीं तृणमूल कांग्रेस से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। ममता
द्वारा सुझाव गए अखबारों के नामों में से हिंदी, बांग्ला और उर्दू अखबार
के प्रमुख को ममता ने ही में पश्चिम बंगाल से राज्यसभा में भेजा है और
जिन तीन जिला प्रधानों के अधिकार छीने हैं वे वाममोर्चा के अधीन थी। इसी
से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ममता की सोच कितनी स्वतंत्र है।