Wednesday, March 30, 2011

माकपा के आतंक सं तंग आ चुकी है जनता - स्मिता बक्सी

शंकर जालान केवल जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र ही नहीं, पूरे राज्य की चुनाव माकपा के आतंक सं तंग आ चुकी है। जनता हर हाल में बदलाव चाहती है, परिवर्तन चाहती है और इसके लिए एक मात्र व बिल्कुल सटीक विकल्प है तृणमूल कांग्रेस। यह कहना है वार्ड नंबर 25 की पार्षद, बोरो चार की चेयरमैन और जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार स्मिता बक्सी का। विधानसभा चुनाव की सिलसिले में बातचीत करते हुए स्मिता बक्सी ने कहा कि चुनाव जीतने पर इनकी पहली प्राथमिकता होगी क्षेत्र में शांति व कानून-व्यवस्था को कायम रखने में मदद करना। उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्र में शांति व व्यवस्था रहती है तो विकास की बयार अपने आप बहेगी। स्मिता ने आरोप लगाते हुए कहा कि 34 वर्ष के शासनकाल में वाममोर्चा ने पूरे पश्चिम बंगाल में अशांति व हिंसा का वातावरण तैयार किया है। राज्य की जनता अब हर हाल में शांति व अमन चहाती है, इसलिए वह तृणमूल कांग्रेस को पसंद कर रही है।बक्सी ने बताया कि इतिहास गवाह है कि जोड़ासांकू सीट से वाममोर्चा के उम्मीदवार ने कभी जीत का स्वाद नहीं चखा। यह सीट पहले कांग्रेस के कब्जे में थी और बीते दो चुनाव से तृणमूल कांग्रेस के पास है। उन्होंने कहा कि 2006 में हुए चुनाव में वोममोर्चा को 294 सीटों में से 235 सीटों पर कामयाबी मिली थी, इसके बावजूद जोड़ासांकू सीट तृणमूल कांग्रेस के खाते में ही रही। इस बार संपूर्ण राज्य में परिवर्तन की लहर है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मां, माटी, मानुष के नारे साथ मतदाताओं के पास जा रही है। ऐसी स्थिति में मेरी जीत पक्की है।परिसीमन का वृहत्तर बड़ाबाजार पर खासा प्रभाव पड़ा है। जोड़ाबागान व बड़ाबाजार क्षेत्र समाप्त हो गए हैं। ऐसे में वृहत्तर बड़ाबाजार के विकास की जिम्मेदारी जोड़ासांकू के विधायक के कंधे पर होगी। इसे आप किस नजर से देखती हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि विधानसभा क्षेत्र तय करना चुनाव आयोग का काम है और यह तो पहले से मालूम था कि वृहत्तर बड़ाबाजार की कई सीटों पर परिसीमन की गाज गिरने वाली है। जहां तक इलाके के विकास की बात है, क्षेत्र की जनता को मुझ पर पूरा भरोसा है। मैं लंबे समय से वार्ड 25 की पार्षद हूं और बतौर पार्षद अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाई है। अब जनता के वोट रूपी आशीर्वाद से विधायक बनूंगी और यह जिम्मेवारी भी बेहतर तरीके से निभाऊंगी।आपकी पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी ने जोड़ासांकू से तृणमूल कांग्रेस से निवर्तमान विधायक को टिकट नहीं दिया और तो और पहले यहां से शांतिलाल जैन को उम्मीदवार बनाने का एलान किया था। जैन ने प्रचार भी शुरू कर दिया था, इसके बाद एकाएक आपको उम्मीदवार बना दिया गया। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगी। देखिए इस बाबत मुझे कुछ नहीं कहना। ये सारे निर्णय ममता बनर्जी के हैं और इस बारे में विस्तार से वे ही कुछ बता सकती हैं।यहां से माकपा ने जानकी सिंह, भाजपा ने मीनादेवी पुरोहित और जदयू ने मोहम्मद सोहराब को उम्मीदवार बनाया है। किसे अपना निकटतम प्रतिद्वंदी मान रही हैं? किसी को नहीं। मेरी जीत पक्की है। मां, माटी, मानुष के नारे और परिवर्तन की हवा के सहारे न केवल जोड़ासांकू बल्कि के राज्य के अधिकांश विधानसभा सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के झंड़ा लहराएगा।

Monday, March 28, 2011

युवाओं को किसी दल से कोई खास उम्मीद नहीं

शंकर जालान कोलकाता। आगामी विधानसभा चुनाव के सिलसिले में आप क्या सोचते हैं? किस दल या उम्मीदवार को वोट देना पसंद करेंगे? आप की नजर में किस मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों को वोट मांगना चाहिए? वर्तमान समय में राज्य किस हालात से गुजर रहा है? बढ़ती बेरोजगारी और हिंसा पर आप की क्या राय है? राज्य में तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस के तालमेल का चुनाव परिणाम पर क्या असर पड़ेगा? क्या भाजपा का खाता खुलेगा? क्या कांग्रेस के विक्षुब्ध नेता निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़ कर जीत पाएंगे? इन सवालों पर अपनी राय देते हुए महानगर के युवा वर्ग के लोगों ने कहा कि चाहे कोई भी दल क्यों न हो सभी अपने हित के लिए जनता के हित को नजरअंदाज करते हैं, इसलिए किसी भी दल से कोई खास उम्मीद रखना खुद को धोखे में रखने जैसा होगा। ज्यादातर लोगों ने कहा कि विकास, उद्योग व शांति के नाम पर राजनीतिक दलों को वोट मांगना चाहिए। फिलहाल राज्यवासी कुछ पार्टियों के राजनेताओं के झूठे वादे के झांसे में आ रहे हैं, लेकिन राज्य में बढ़ती बेरोजगारी और हिंसा की वारदातें चिंता का विषय है। सिकदरपाड़ा लेन के रहने वाले विनोद सिंह ने कहा कि फिलहाल राज्य बेरोजगारी और हिंसा की समस्या से जूझ रहा है, इसलिए ऐसे दल और ऐसे उम्मीदवार को वोट देना चाहिए जो इन समस्याओं पर अंकुश लगा सके। उन्होंने कहा कि पहली प्राथमिकता स्थिर सरकार की होनी चाहिए और इसके बाद विकास को प्रमुखता देने वाली पार्टी को वोट देना चाहिए। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के विरोध के कारण राज्य से टाटा मोटर्स की नैनो कार का कारखाना नहीं लग पाया, इस वजह से हुगली जिले के लोगों में रोजगार पाने की जो ललक लगी थी वह बुझ गई। जिसका खामियाजा तृणमूल कांग्रेस को इस चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।कालीकृष्ण टैगोर स्ट्रीट के रहने वाले चंद्रशेखर बासोतिया ने कहा कि राज्य की जनता यह भलीभांति जानती है कि कौन सा दल राज्य में विकास चाहता है और कौन सी पार्टी अराजकता फैला रही है। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव के क्या नतीजे होंगे और किसकी सरकार होगी यह कहना तो फिलहाल जल्दबाजी होगी। उन्होंने बताया कि जहां तक कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस में गठजोड़ की बात है, तो मुझे नहीं लगता है कि इसका कोई खास प्रभाव पड़ेगा।पाथुरियाघाट स्ट्रीट के निवासी मनोज अग्रवाल ने कहा कि जिस किसी पार्टी की सरकार क्यों न बने और मुख्यमंत्री की कुर्सी चाहे जिस नेता को क्यों न मिले, उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए हिंसा पर अंकुश लगना और बेरोजगारों के लिए रोजगार उपलब्ध करना। उन्होंने कहा कि हो सकता है तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस में हुए तालमेल के कारण वाममोर्चा की कुछ सीटें घट जाए या फिर जीत का अंतर कम हो जाए, लेकिन सरकार गठन मामले में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।उल्टाडांगा के रहने वाले अशोक झा ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि राज्य में भाजपा का खाता खुल पाएगा। उन्होंने कहा कि मेरी नजर में तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस के तालमेल का भी कोई विशेष लाभ होता नजर नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि लोग को इस बात को ध्यान में रखते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए कि कौन सा उम्मीदवार और कौन सी पार्टी सचमुच राज्य का विकास चाहती है। जहां तक निर्दलीय उम्मीदवारों की बात है उनके लिए जीत की राह आसान नहीं है।

सुशासन के नाम पर कुशासन को बढ़ावा देना चाहती है तृणमूल : जानकी सिंह

शंकर जालान कोलकाता, जोड़ासांकू विधानसभा क्षेत्र से वोममार्चा समर्थित माकपा उम्मीदवार जानकी सिंह ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस राज्य की जनता को गुमराह करते हुए सुशासन के नाम पर कुशासन को बढ़ावा देना चाहती है। उन्होंने कहा कि मेरी जीत पक्की है और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि राज्य में आठवीं बार भी वाममोर्चा की ही सरकार बनेगी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की परिवर्तन की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि होता तो गया परिवर्तन, तृणमूल कांग्रेस ने पहले शांतिलाल जैन को उम्मीदवार बनाया था और परिवर्तन करते हुए स्मिता बक्सी को टिकट दे दिया।बातचीत में जानकी सिंह ने कहा कि ममता बनर्जी आज यह कह रही हैं कि पश्चिम बंगाल में गणतंत्र नहीं है वह अपने गिरेवान में झांके। जिस पार्टी में उनके (ममता) अलावा किसी को बोलने की इजाजत नहीं है उस पार्टी की प्रमुख अगर गणतंत्र की बात करे तो यह हास्यास्पद लगता है।उन्होंने कहा कि राज्य की जनता इस बात की गवाह है कि तृणमूल कांग्रेस ने हर विकासशील परियोजना का विरोध किया। रास्ता काट कर आंदोलन करने वाले माओवादियों को समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि वे मतदाताओं के पास वाममोर्चा का चुनाव घोषणा पत्र लेकर जा रही हैं और उसी के आधार पर वोट मांग रही है। उन्होंने बताया कि जिस तरह से उन्हें मतदाताओं का समर्थन मिल रहा है उसे देखते हुए उन्हें विधानसभा भवन पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता।सिंह ने कहा कि ममता बनर्जी कहती हैं वे हर जिले में उद्योग स्थापित करेंगी। दूसरी ओर यह भी कहती हैं कि इसके लिए जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा। बगैर जमीन के कैसे उद्योग लगेगा यह सोचने का विषय है। राज्य के जनता बनर्जी के शब्जबाग को भलीभांति समझती है।उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रही ममता के रेल मंत्रालय के कामकाज को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है कि अगर तृणमूल सत्ता में आई तो कैसी होगी राज्य की स्थिति। उन्होंने कहा कि रेलमंत्री बनने के पूर्व एक रुपए आमदनी की एवज में 75 पैसे खर्च होते थे। ममता के रेलमंत्री बनते ही में एक रुपए के एवज में 98 पैसे खर्च होने लगे। इसके अलावा मालगाड़ी ट्रेनों का परिचालन कम हुआ है। उन्होंने कहा कि ट्रेनें लगातार बढ़ रही है पर व्यवस्थाएं क्या है किसी से छुपी नहीं है। ऐसे में मतदाता सोच ले कि राज्य में अराजकता चाहिए कि शांति? उन्नति या हिंसा?आपके खिलाफ भाजपा ने मीना देवी पुरोहित और तृणमूल कांग्रेस ने स्मिता बक्सी को मैदान में उतारा है और ये दोनों बीते कई सालों से पार्षद हैं। पुरोहित ने डिप्टीमेयर रह चुकी हैं, जबकि बक्सी बोरो चेयरमैन हैं। ऐसे में आप को नहीं लगता कि पुरोहित और बक्सी तुलना में आपका राजनीति ज्ञान कम है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि कतई नहीं। उन्होंने माना कि उनकी दोनों प्रतिद्वंदी फिलहाल पार्षद है, लेकिन इससे चुनावी नतीजों पर कई फर्क नहीं पड़ेगा। इसका खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि वे 1968 से राजनीति में है और 1969 में उन्होंने माकपा की सदस्यता ली, तब से आज तक यानी करीबन 42 वर्षोम तक संगठन, छात्र, युवा और महिलाओं के लिए उन्होंने पार्टी के बैनर तले कई काम किए है, जिसका प्रतिफल विधानसभा चुनाव में वोट के रूप में उन्हें मिलेगा। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस में किसी निकटतम प्रतिद्वंदी मानती हैं? इसका उत्तर देते हुए जानकी सिंह ने कहा किसी को नहीं, मेरी जीत निश्चित है।

Sunday, March 27, 2011

शांति और विकास को प्राथमिकता देने वाला विधायक चाहती है जनता

शंकर जालानकोलकाता। अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव के बारे में ज्यादातर लोगों का कहना है कि ऐसे उम्मीदवार को जीताकर विधानसभा भवन भेजना चाहिए जिसकी सोच राज्य में शांति बहाली के साथ-साथ उद्योग का प्राथमिकता देने वाली हो। 15वीं विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महानगर के कई वर्ग और क्षेत्र के लोगों से बातचीत की तो इन लोगों ने कहा कि विधानसभा चुनाव का महत्त्व राज्य के विकास से जुड़ा होता है, इसलिए सही उम्मीदवार का चयन हर जिम्मेवार मतदाता का दायित्व बनता है। इन लोगों के मुताबिक, नगर निगम का चुनाव एक वार्ड और विधानसभा का चुनाव परिणाम पूरे राज्य के विकास या विनाश के लिए जिम्मेवार होता है। इसलिए मतदाताओं को दोनों चुनाव के महत्व को ध्यान में रखते हुए वोट डालना चाहिए। इन लोगों ने कहा कि जागरूक मतदाता वही है जो किसी पार्टी या उम्मीदवार के झांसे में न आकर अपनी सोच-समझ से बेहतर और राज्य के हित को प्राथमिकता देने वाले प्रत्याशी को वोट दे।इस बारे में कलाकार स्ट्रीट के रहने वाले संजय अग्रवाल ने कहा कि विधानसभा चाुनाव में जनप्रतिनिधि के रूप में वैसे उम्मीदवार का चयन होना चाहिए जो अपने मतदाता के प्रति ईमानदार हो। उनके शब्दों में साफ छवि व नैतिकतावाले प्रत्याशी का चुनाव करना राज्य की प्रगति के लिए आवश्यक है।पोस्ता के रहने वाले आनंद नारसरिया ने कहा कि सही उम्मीदवार वह है जो जनसमस्याओं को समझने वाला हो न कि भ्रष्टाचारी। जो जनता की समस्याओं का समाधान करे। मैं सबको साथ लेकर चलने वाले और दलगत राजनीति से ऊपर होकर काम करने वाले प्रत्याशी को वोट देना पसंद करूंगा। उन्होंने कहा कि मेरी नजर में श्रेष्ठ उम्मीदवार का श्रेय उसी को है जो बुनियादी समस्याओं को नजदीक से जाने और चतुर्दिक विकास की बात विधानसभा में उठाए।जगमोहन मल्लिक लेन के रहने वाले राजी राठी ने बताया कि जो पार्टी और उम्मीदवार राज्य को प्रगति की ओर ले जाए वे उसे ही वोट देना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि उन उम्मीदवारों को चुनाव के वक्त जनता से रू-ब-रू होने में कोई झिझक नहीं होती जो प्रचार के दौरान किए गए वायदों को पूरा करते हैं। उन्होंने कहा कि मेरी सोच के मुताबिक, वह उम्मीदवार बेहतर है जो जनता की आकांक्षाओं के प्रति खरा उतरे और स्वच्छ छवि वाला हो।शिवतला लेन के ओमप्र्रकाश साव ने कहा कि शहर में व्याप्त समस्याओं को गंभीरता से लेने और लोगों के दुख-दर्द में शामिल होने वाला प्रत्याशी उनकी पसंद है। उन्होंने कहा कि जो कर्मठ हो, जनभावना को समझ सके और भूलभूत समस्याओं को हल करे, जो जनता के प्रति अपनी जवाबदेही महसूस करे, वैसे ही प्रत्याशी को जीताकर विधानसभा भेजना चाहिए। इस बारे में महर्षि देवेंद्र रोड के विनय कुंवर का कहना था कि उम्मीदवार वैसा होना चाहिए जो शिक्षित, समाज से जुड़ा और अपनी बातों को प्रभावी तरीके से विधानसभा में रख सके। उन्होंने कहा कि नैतिकता से परिपूर्ण और जाति धर्म से ऊपर उठ कर बेरोजगारी मिटाए और हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए सार्थक पहल कर उसे ही विधायक कहलाने का अधिकार है। नीमतला घाट स्ट्रीट के निवासी दिनेश पांडेय ने कहा कि प्रतिनिधि शिक्षित, ईमानदार, कर्मठ और सभी धर्मों में आस्था रखने वाला हो उसे ही विधानसभा में पहुंचने का हक होना चाहिए। इसी तरह नूतन बाजार के मनोज सिंह पराशर का कहना था कि पहली प्राथमिकता तो यह होनी चाहिए की उम्मीदवार आपराधिक छवि वाला न हो। उसके मन में लोकहित की भावना हो। बेरोजगारी को समाप्त करने के लिए पहल करे।

Friday, March 25, 2011

रोचक नारों से मतदाताओं को लुभाने में जुटे उम्मीदवार

शंकर जालान

रोचक नारों से मतदाताओं को लुभाने में जुटे उम्मीदवारशंकर जालानकोलकाता । राज्य में अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को अपने पक्ष में वोट देने के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे की खिंचाई कर रही है। व्यंग्य करते नारे और छोटी कविताओं के माध्यम से उम्मीदवार विरोधी दलों की नीतियों को जनविरोघी बताने में जुटे हैं। कोई पार्टी मां, माटी, मानुष और परिवर्तन के अलावा बदल दो जैसे नारे के सहारे मतदाताओं को रिझाने में जुटी है। तो कई दल के उम्मीदवार सुशासन, विकास, स्थिरता के सहारे मतदाताओं के पास जा रहे हैं। हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा के घटक दलों के अलावा तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, भाजपा समेत कई क्षेत्रीय पार्टियां भाग्य अजमा रही हैं और अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं। लेकिन मुख्य मुकाबला माकपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच देखा जा रहा है। इस दिशा में माकपा और तृणमूल कांग्रेस की तरफ में दीवार लेखन, होर्डिंग, पोस्टर और बैनरों पर रोचक और मतदाताओं को सोचने पर मजबूर करने वाले कई तरह के स्लोगन लिखे गए हैं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा स्लोगन के मामले में काफी पीछे हैं।तृणमूल कांग्रेस वाले जहां, माकपा ने बंद किया कारखाना, नौकरी का नहीं ठिकाना। साम्यवाद से समाजवाद, हर कॉमरेड आबाद। इंकलाब का सूखा तालाब, यह कैसा इंकलाब। माकपा की करतूत, दुखी हैं मुटिया-मजदूर के माध्यम से माकपा पर निशाना साध रहे हैं। इसके अलावा सिंगुर में 400 एकड़ जमीन वापस करो।सबार पेटे भात चाई, सबार जन्ने काज चाई। मां-माटी-मानुषेर स्वार्थे तृणमूल के वोट दिन। जमी व शिल्पे स्वार्थे ममता के जयी करून। शिल्प व कृषि समन्वय चाई। (सबके लिए भोजन व काम चाहिए, जमीन व लोगों की भलाई के लिए तृणमूल को वोट दे, जमीन की रक्षा व उद्योग के लिए ममता को विजयी बनाए, समान रूप से चाहिए उद्योग और खेती )। जैसे स्लोगनों का इस्तेमाल भी कर रही है। वहीं माकपा वाले कांग्रेस-तृणमूल का जोट, नहीं जुटा पाएगा वोट। नहीं मूल कांग्रेस, नहीं तृणमूल कांग्रेस। वाम गठबंधन, सबका अभिनंदन। ममता उद्योग चाहती है, बंगाल नहीं गुजरात में। माकपा चाहती विकास और तृणमूल राज्य का सत्यानाश। माकपा की पुकार, रहे न कोई बेरोजगार। जैसे स्लोगन का सहारा ले रहे हैं।कांग्रेस ने अपने पुराने स्लोगन में मालूमी फेरबदल किया। पिछले लोकसभा और कोलकाता नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस का स्लोगन था- आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ इस बार कांग्रेस का स्लोगन है आम आदमी के बढ़ते कदम, हर कदम पर भारत बुलंद।संचार माध्यम से प्रचार : इस बार विधानसभा चुनाव में भाग्य अजमा रहे विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार संचार माध्यम यानी सरकारी टेलीविजन व रेडियो स्टेशन का इस्तेमाल हो सकता है। उम्मीदवार इसका अधिक फायदा न उठा सके इस बाबत चुनाव आयोग की ओर से विशेष दिशानिर्देश जारी कएि गए हैं। सूत्रों के मुताबिक राज्य में यह सुविधा दूरदर्शन और आल इंडिया रेडियो के स्टेशन पर उपवब्ध रहेगी, जहां सभी पार्टियों को समान रूप से प्रचार के लिए 45 मिनट का समय दिया जाएगा। इस बाबत उन्हें एक से पांच मिनट की अवधि वाले टाइम वाउचर दिए जाएंगे। किसी भी राजनीतिक दल को एक सत्र में पंद्रह मिनट से अधिक का समय नहीं दिया जाएगा। चुनाव आयोग प्रसार भारती से विचार-विमर्श कर प्रसारण की तिथि व समय तय करेगा। सभी पार्टियों को प्रसारण संबंधी दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। उन्हें प्रसारण के लिए रिकार्डेड कैसेट अग्रिम तौर पर जमा करानी होगी। पार्टी अपने खर्च पर स्टूडियो में भी रिकार्डिंग करा सकती है, हालांकि यह प्रसार भारती व दूरदर्शन की ओर से निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। रिप्रेजेंटेशन आफ पीपुल एक्ट - 1951 के प्रावधानों के तहत नामांकन पत्र दाखिल करने की अंतिम तिथि से मतदान की तिथि से दो दिन पहले तक सरकारी टेलीविजन व रेडियो के माध्यम से प्रचार किया जा सकता है।प्रचार का नायाब तरीका : चुनाव आचार संहिता से बचने के लिए प्रत्याशियों ने प्रचार का नायाब तरीका निकाला है। वे कला-संस्कृति व पर्यावरण को माध्यम बनाकर लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं। रासबिहारी विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी शोभन चटर्जी का कहना है आचार संहिता की वजह से दीवार लेखन, होर्डिंग्स-बैनर हर स्थान पर नहीं लगाए जा सकते, इसलिए संस्कृति को ध्यान में रखकर विभिन्न स्थानों पर चित्रांकन की रणनीति अपनाई जाएगी। भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के माकपा प्रत्याशी नारायण जैन ने कहा कि वे पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ जागरुकता अभियान चलाकर लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। दीवारों पर एक वृक्ष दस पुत्र समान जैसे नारे लिखकर उसके नीचे अपना नाम लिखकर प्रचार कर रहे हैं।

Wednesday, March 23, 2011

खूब बिक रहे हैं राजनीतिक पार्टियों के झंडे

विधानसभा चुनाव-2011

शंकर जालान
कोलकाता। राज्य में अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा की कुल 294 सीटों के चुनाव के मद्देनजर विभिन्न राजनीतिक पाटिर्यों के झंडे समेत विभिन्न प्रकार की प्रचार सामग्री की बिक्री बढ़ गई है। झंडे का कारोबार करने वाले लोगों के मुताबिक, वाममार्चा के घटक दलों के अलावा तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी समेत अन्य राजनीतिक दलों के झंडे की मांग बढ़ गई है। महानगर समेत विभिन्न जिला स्थित विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार के अलावा पार्टी समर्थक मतदाताओं को रिझाने के लिए काफी संख्या में झंडे लगा रहे हैं। इन दिनों कपड़े के अलावा प्लास्टिक के झंडे की भी अच्छी-खासी मांग है।
महात्मा गांधी रोड में बीते पचास सालों से झंडे का कारोबार करते आ रहे रामदीन यादव ने बताया कि गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के अलावा चुनाव के मौसम में उनका कारोबा खूब चलता है। उन्होंने बताया कि में नगर निगम और नगरपालिका चुनाव की तरह तो विधानसभा चुनाव में झंडे नहीं बिकते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा चुनाव के दौरान अधिक संख्या में झंडों की बिक्री होते हैं।
उनके मुताबिक गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महानगर के अलावा अन्य जिलों से आए लोग अपनी-अपनी जरूरत के मुताबिक झंडे खरीद कर ले जाते हैं और तत्काल भुगतान कर देते हैं। लेकिन चुनाव के दौरान हमें खरीदार के इच्छानुसार झंडे पर छपाई करवानी पड़ती है और उधार बेचना पड़ता है।
किस पार्टी के झंडे अधिक बिक रहे हैं? लगभग कितनी फीसद की बचत हो जाती है? क्या झंडों की बिक्री से संतुष्ट हैं? इन सवालों के जवाब में आदित्य कुमार ने बताया कि सटीक तौर पर यह बताना मुश्किल है। आम तौर पर झंडे के व्यापार में 15 से 18 फीसद की बचत होती है, लेकिन चुनाव में कुछ भुगतान डूबने का डर रहता है, इसलिए मुनाफा का अनुपात बढ़ाते हुए 20 से 25 फीसद तक की कमाई कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि आठ-दस साल पहले तक दीवार लेखन और झंडे के जरिए प्रचार किया जाता था, क्योंकि प्रचार का और कोई साधन नहीं था। इन दिनों प्रचार के कई तरीके विकसित हुए हैं, लिहाजा झंडे की बिक्री कुछ प्रभावित हुई है।
इसी तरह एक अन्य व्यापारी ने बताया कि इस बार विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों की ओर से प्रचार के लिए बैनर, पोस्टर, दीवार लेखन और टीवी चैनल के अलावा इंटरनेट का सहारा लिया जा रहा है।
वहीं, विज्ञापन एजंसियों का कहना है कि इस बार के चुनाव में राजनीतिक दल वाले उनकी सेवाएं कम ले रहे हैं। एजंसी वाले इसका कारण चुनाव आयोग की सख्ती बता रहे हैं। विज्ञापन एजंसी चलाने वाले लोगों का कहना है कि राजनीतिक दल इस बार पोस्टर व बैनर पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। उम्मीदवारों का ध्यान विज्ञापन देने के प्रति कम है। विज्ञापन का बाजार तो और अधिक खराब है।
होर्डिंग बनाने वाले एक कारीगर ने बताया कि पहले विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से होर्डिग लगाने के लिए इतने आर्डर मिलते थे कि अस्थाई तौर कोलकाता नगर निगम से होर्डिंग लगाने की अनुमति लेनी पड़ती थी, लेकिन इस बार के चुनाव में ऐसा नहीं हो रहा है।
दूसरी ओर, हर पार्टी का हर प्रत्याशी हर तरीके मतदाताओं के बीच पहुंचने की कोशिश में जुटा है। प्रचार के नए-नए तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी कड़ी में इन दिनों विभिन्न दलों के उम्मीदवार प्रचार के लिए गुब्बारे, साड़ी, कमीज, टोपी व छाते का सहारा ले रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह वाले छोटे-बडे आकार के रंग-बिरंगे गुब्बारे इन दिनों खूब बिक रहे हैं। पोलक स्ट्रीट में गुब्बारे के कारोबार से जुड़े कई लोगों ने बताया कि इससे पहले चुनावों में गुब्बारे प्रचार का माध्यम नहीं बने थे। पहली बार ऐसा देखा गया है कि उम्मीदवार प्रचार के लिए गुब्बारे का सहारा ले रहे हैं। कुछ उम्मीदवार केवल चुनाव चिन्ह वाले गुब्बारे मांग रहे हैं तो कुछ चुनाव चिन्ह के साथ अपनी फोटो भी छपवा रहे हैं। गुब्बारों के व्यापारियों ने बताया कि साधारण गुब्बारे की तुलना में चुनाव चिन्ह वाले गुब्बारे की कीमत कहीं ज्यादा है, फिर भी लोग खरीद रहे हैं। ठीक, इसी तरह चुनाव चिन्ह वाले छातों, टोपी, साड़ी व कमीज की भी इन दिनों खूब मांग है।

कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस में अभी भी है असमंजस की स्थिति

विधानसभा चुनाव -२०११

शंकर जालान
कोलकाता । कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारें के मुद्दे पर सहमति हो जाने के बाद भी दोनों दलों के कई नेता व समर्थक इसे मानने को तैयार नहीं है। वाममोर्चा के खिलाफ कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल पर काफी हद तक सहमति हो जाने के बावजूद असमंजस की स्थिति अभी बनी हुई है, जिससे दोनों पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, विधायक सहित राजनीतिक कार्यकर्ता किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। एक ओर जहां एसयूसीआई 19 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का एलान कर कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस की मुसीबत बढ़ा दी है। वहीं, भाजपा ने राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर कांग्रेस-तृणमूल के लिए दिक्कत और वाममोर्चा के लिए सहूलियत कर दी है। राजनीतिक हलकों में फिलहाल चर्चा यही है कि आने वाले दिनों में कुछ और फेरबदल संभव है।
राजनीति के जानकारों के मुताबिक विपक्ष जितने भागों में बंटेगा, वाममोर्चा के लिए आठवीं बार सरकार बनाने का रास्ता उतना ही सहज होगा। लोगों का कहना है कि वाममोर्चा के वोट लगभग फिक्स हैं यानी जो मतदाता वाममोर्चा उम्मीदवारों को वोट देते आ रहा है वह उसे ही वोट देना। वाममोर्चा के मतदाता अन्य राजनीति दलों के शब्जबाग और झांसे में आने वाले नहीं है। जबकि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी समेत अन्य राजनीति दलों के मतदाता अवसर और उम्मीदवार के साथ-साथ विभिन्न चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं।
मालूम हो कि मुख्य रूप से कांग्रेस (65) और तृणमूल कांग्रेस (229) के बीच सीटों के बंटवारे पर सोमवार को सहमति हो गई थी, जिसके बाद संभावना चुनावी रणनीति और तस्वीर के साफ होने की जताई जा रही थी, लेकिन इस गठजोड़ के खिलाफ विभिन्न खेमो से अलग-अलग आवाज सुनाई देने से संशय और असमंजस बढ़ता ही जा रहा है। कांग्रेस के सांसद अधीर चौधरी (मुर्शिदाबाद), सांसद दीपा दासमुंशी (जलपाईगुड़ी) के अलावा विधायक राम प्यारे राम, पूर्व विधायक शंकर सिंह ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। अधीर चौधरी जहां अलग से उम्मीदवार खड़ा करने की बात कह रहे हैं। वहींंं, राम प्यारे राम ने निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। इसके अलावा मध्य कोलकाता के जोड़ासांकू विधानसभा सीट से शांतिलाल जैन उम्मीदवार बनाने से तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं में नाराजगी है। माना जा रहा है कि तृणमूल में जारी असंतोष की वजह से कई सीटों पर अभी यह स्थिति नहीं बन पाई है कि उम्मीदवार बेखटके चुनाव प्रचार में जुट सके, क्योंकि समीकरण के अभी कई और करवट लेने की संभावना व्यक्त की जा रही है। खास तौर पर प्रदेश स्तर पर तृणमूल कांग्रेस द्वारा अपने कोटे से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को एक सीट देने के बाद ऐसे दसों की उम्मीद और बढ़ गई है, जिनका प्रदेश स्तर पर तो कई विशेष जनाधार नहीं है, लेकिन गठबंधन की राजनीति का फायदा उठाने को उनके आका सक्रिय हो उठे हैं। ऐसे दलों में झारखंड नामधारी पार्टियों के साथ जनता दल यूनाइटेड जैसे दलों को शामिल किया जा रहा है, जो आगामी चुनाव में गठबंधन की संभावनाएं तलाश रहे हैं। हालांकि इस बाबत इन दलों के नेता ऐसे सवालों पर कुछ कहने से साफ इंकार करते हैं।