शंकर जालान
कोलकाता। दुर्गा पूजा में अब एक सौ दिन से भी कम रह गए हैं। उत्तर कोलकाता स्थित कुम्हारटोली के मूर्तिकारों को इन दिनों आर्डर का इंतजार है। कुम्हारटोली के मूर्तिकारों ने बताया कि दुर्गापूजा के मद्देनजर इस बार करीब साढ़े नौ से मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। बांस और बिचाली का ढांचा बनाकर उस पर मिट््टी चढ़ाने का काम पूरा कर लिया गया है, लेकिन अभी तक केवल पांच मूर्तिकारों के 10-15 मूर्तियों बाबत आर्डर व अग्रिम भुगतान का आर्डर मिला है। शेष 38 मूर्तिकार अभी भी आर्डर के इंतजार में हैं।
प्रसिद्ध मूर्तिकार सनातन पाल ने बताया कि वे इस बार विभिन्न आकार और थीम की कुल 38 प्रतिमा बना रहे हैं और अभी तक दक्षिण कोलकाता की दो पूजा कमिटियों ने मूर्तियां बुक कराई है। उन्होंने बताया कि आजकल एकरूपता का जमाना है, इसीलिए कई आयोजक इन दिनों अपनी पसंद की मूर्ति को बुक करवा लेते हैं और इसके आगे का काम हम बिजली सज्जा और पंडाल बनाने वालों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद करते हैं, ताकि पंडाल, विद्युत सज्जा और प्रतिमा में एक रूपता लगे।
महिला मूर्तिकार चायना पाल ने बताया कि मैं केवल एक चाल (एक साथ पांचों मूर्ति) की प्रतिमा बनाती हूं। इस बार 42 मूर्तियां बना रही हूं और अभी तक तीन मूर्तियां बुक हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा बनाई गई पारंपरिक मूर्तियां पंडाल की तुलना में घरों में अधिक जाती है। इसके कारण का खुलासा करते हुए पाल ने बताया कि मैं मूर्तियों के निर्माण में प्रयोग करने में विश्वास नहीं रखती। इसीलिए क्लब या संगठनों वाले मेरी मूर्तियों को उतना महत्व नहीं देते, जितना घरों में पूजा आयोजित करने वाले लोग देते हैं।
कृष्ण दास नामक एक अन्य मूर्तिकार ने बताया कि उन्होंने अब पूंजी और बैंक से ऋण पर ली गई राशि से 55 मूर्तियों के लिए बांस व बिचाली के ढांचे पर मिट््टी का लेप चढ़ाने का काम पूरा कर लिया है। अब आगे के काम के लिए उन्हें आर्डर का इंतजार है। उन्होंने बताया कि आर्डर मिलने से या मूर्ति बुक होने से एक दो अग्रिम (एडवांस) भुगतान बाबत उनके पास पैसे आ जाते हैं और दूसरा इस बात का संतोष हो जाता है कि चलो इतनी मूर्तियां बिक गर्इं।
मूर्तिकारों की संस्था कुम्हारटोली मूर्ति शिल्पी सांस्कृतिक संघ के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि वैसे तो मूर्तिकारों के हर पूजा के वक्त काम रहता है, लेकिन दुर्गा पूजा के दौरान मूर्तिकारों के पास अधिक काम होता है। सरस्वती पूजा, काली पूजा या विश्वकर्मा पूजा के लिए मूर्तिकार एक-डेढ़ महीने पहले से मूर्ति निर्माण में लगते हैं, लेकिन दुर्गा पूजा के लिए मूर्तिकार छह महीने पहले से व्यस्त हो जाते हैं और पूजा से पहले जुलाई-अगस्त का समय मूर्तिकारों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मूर्तिकारों के अग्रिम भुगतान बाबत राशि मिलती है।
उन्होंने बताया कि हर साल पूजा से ढाई-तीन महीने पहले तक 35 से 40 फीसद मूर्तियां बुक हो जाया करती थी, लेकिन अभी तक पांच फीसद भी मूर्तियां बुक नहीं हुई हैं। इस वजह से ज्यादातर मूर्तिकार पैसे की कमी महसूस कर रहे हैं और आगे का काम भी प्रभावित हो रहा है।
Friday, August 5, 2011
आर्डर के इंतजार में कुम्हारटोली के मूर्तिकार
शंकर जालान
कोलकाता,। दुर्गा पूजा में अब एक सौ दिन से भी कम रह गए हैं। उत्तर कोलकाता स्थित कुम्हारटोली के मूर्तिकारों को इन दिनों आर्डर का इंतजार है। कुम्हारटोली के मूर्तिकारों ने बताया कि दुर्गापूजा के मद्देनजर इस बार करीब साढ़े नौ से मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। बांस और बिचाली का ढांचा बनाकर उस पर मिट््टी चढ़ाने का काम पूरा कर लिया गया है, लेकिन अभी तक केवल पांच मूर्तिकारों के 10-15 मूर्तियों बाबत आर्डर व अग्रिम भुगतान का आर्डर मिला है। शेष 38 मूर्तिकार अभी भी आर्डर के इंतजार में हैं।
प्रसिद्ध मूर्तिकार सनातन पाल ने बताया कि वे इस बार विभिन्न आकार और थीम की कुल 38 प्रतिमा बना रहे हैं और अभी तक दक्षिण कोलकाता की दो पूजा कमिटियों ने मूर्तियां बुक कराई है। उन्होंने बताया कि आजकल एकरूपता का जमाना है, इसीलिए कई आयोजक इन दिनों अपनी पसंद की मूर्ति को बुक करवा लेते हैं और इसके आगे का काम हम बिजली सज्जा और पंडाल बनाने वालों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद करते हैं, ताकि पंडाल, विद्युत सज्जा और प्रतिमा में एक रूपता लगे।
महिला मूर्तिकार चायना पाल ने बताया कि मैं केवल एक चाल (एक साथ पांचों मूर्ति) की प्रतिमा बनाती हूं। इस बार 42 मूर्तियां बना रही हूं और अभी तक तीन मूर्तियां बुक हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा बनाई गई पारंपरिक मूर्तियां पंडाल की तुलना में घरों में अधिक जाती है। इसके कारण का खुलासा करते हुए पाल ने बताया कि मैं मूर्तियों के निर्माण में प्रयोग करने में विश्वास नहीं रखती। इसीलिए क्लब या संगठनों वाले मेरी मूर्तियों को उतना महत्व नहीं देते, जितना घरों में पूजा आयोजित करने वाले लोग देते हैं।
कृष्ण दास नामक एक अन्य मूर्तिकार ने बताया कि उन्होंने अब पूंजी और बैंक से ऋण पर ली गई राशि से 55 मूर्तियों के लिए बांस व बिचाली के ढांचे पर मिट््टी का लेप चढ़ाने का काम पूरा कर लिया है। अब आगे के काम के लिए उन्हें आर्डर का इंतजार है। उन्होंने बताया कि आर्डर मिलने से या मूर्ति बुक होने से एक दो अग्रिम (एडवांस) भुगतान बाबत उनके पास पैसे आ जाते हैं और दूसरा इस बात का संतोष हो जाता है कि चलो इतनी मूर्तियां बिक गर्इं।
मूर्तिकारों की संस्था कुम्हारटोली मूर्ति शिल्पी सांस्कृतिक संघ के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि वैसे तो मूर्तिकारों के हर पूजा के वक्त काम रहता है, लेकिन दुर्गा पूजा के दौरान मूर्तिकारों के पास अधिक काम होता है। सरस्वती पूजा, काली पूजा या विश्वकर्मा पूजा के लिए मूर्तिकार एक-डेढ़ महीने पहले से मूर्ति निर्माण में लगते हैं, लेकिन दुर्गा पूजा के लिए मूर्तिकार छह महीने पहले से व्यस्त हो जाते हैं और पूजा से पहले जुलाई-अगस्त का समय मूर्तिकारों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मूर्तिकारों के अग्रिम भुगतान बाबत राशि मिलती है।
उन्होंने बताया कि हर साल पूजा से ढाई-तीन महीने पहले तक 35 से 40 फीसद मूर्तियां बुक हो जाया करती थी, लेकिन अभी तक पांच फीसद भी मूर्तियां बुक नहीं हुई हैं। इस वजह से ज्यादातर मूर्तिकार पैसे की कमी महसूस कर रहे हैं और आगे का काम भी प्रभावित हो रहा है।
कोलकाता,। दुर्गा पूजा में अब एक सौ दिन से भी कम रह गए हैं। उत्तर कोलकाता स्थित कुम्हारटोली के मूर्तिकारों को इन दिनों आर्डर का इंतजार है। कुम्हारटोली के मूर्तिकारों ने बताया कि दुर्गापूजा के मद्देनजर इस बार करीब साढ़े नौ से मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। बांस और बिचाली का ढांचा बनाकर उस पर मिट््टी चढ़ाने का काम पूरा कर लिया गया है, लेकिन अभी तक केवल पांच मूर्तिकारों के 10-15 मूर्तियों बाबत आर्डर व अग्रिम भुगतान का आर्डर मिला है। शेष 38 मूर्तिकार अभी भी आर्डर के इंतजार में हैं।
प्रसिद्ध मूर्तिकार सनातन पाल ने बताया कि वे इस बार विभिन्न आकार और थीम की कुल 38 प्रतिमा बना रहे हैं और अभी तक दक्षिण कोलकाता की दो पूजा कमिटियों ने मूर्तियां बुक कराई है। उन्होंने बताया कि आजकल एकरूपता का जमाना है, इसीलिए कई आयोजक इन दिनों अपनी पसंद की मूर्ति को बुक करवा लेते हैं और इसके आगे का काम हम बिजली सज्जा और पंडाल बनाने वालों के साथ विचार-विमर्श करने के बाद करते हैं, ताकि पंडाल, विद्युत सज्जा और प्रतिमा में एक रूपता लगे।
महिला मूर्तिकार चायना पाल ने बताया कि मैं केवल एक चाल (एक साथ पांचों मूर्ति) की प्रतिमा बनाती हूं। इस बार 42 मूर्तियां बना रही हूं और अभी तक तीन मूर्तियां बुक हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा बनाई गई पारंपरिक मूर्तियां पंडाल की तुलना में घरों में अधिक जाती है। इसके कारण का खुलासा करते हुए पाल ने बताया कि मैं मूर्तियों के निर्माण में प्रयोग करने में विश्वास नहीं रखती। इसीलिए क्लब या संगठनों वाले मेरी मूर्तियों को उतना महत्व नहीं देते, जितना घरों में पूजा आयोजित करने वाले लोग देते हैं।
कृष्ण दास नामक एक अन्य मूर्तिकार ने बताया कि उन्होंने अब पूंजी और बैंक से ऋण पर ली गई राशि से 55 मूर्तियों के लिए बांस व बिचाली के ढांचे पर मिट््टी का लेप चढ़ाने का काम पूरा कर लिया है। अब आगे के काम के लिए उन्हें आर्डर का इंतजार है। उन्होंने बताया कि आर्डर मिलने से या मूर्ति बुक होने से एक दो अग्रिम (एडवांस) भुगतान बाबत उनके पास पैसे आ जाते हैं और दूसरा इस बात का संतोष हो जाता है कि चलो इतनी मूर्तियां बिक गर्इं।
मूर्तिकारों की संस्था कुम्हारटोली मूर्ति शिल्पी सांस्कृतिक संघ के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि वैसे तो मूर्तिकारों के हर पूजा के वक्त काम रहता है, लेकिन दुर्गा पूजा के दौरान मूर्तिकारों के पास अधिक काम होता है। सरस्वती पूजा, काली पूजा या विश्वकर्मा पूजा के लिए मूर्तिकार एक-डेढ़ महीने पहले से मूर्ति निर्माण में लगते हैं, लेकिन दुर्गा पूजा के लिए मूर्तिकार छह महीने पहले से व्यस्त हो जाते हैं और पूजा से पहले जुलाई-अगस्त का समय मूर्तिकारों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यही वह समय है, जब मूर्तिकारों के अग्रिम भुगतान बाबत राशि मिलती है।
उन्होंने बताया कि हर साल पूजा से ढाई-तीन महीने पहले तक 35 से 40 फीसद मूर्तियां बुक हो जाया करती थी, लेकिन अभी तक पांच फीसद भी मूर्तियां बुक नहीं हुई हैं। इस वजह से ज्यादातर मूर्तिकार पैसे की कमी महसूस कर रहे हैं और आगे का काम भी प्रभावित हो रहा है।
दुर्गापूजा : सजावटी सामान बनाने में जुटे कारीगर
शंकर जालान
कोलकाता । दुर्गापूजा के मद्देनजर विभिन्न पूजा कमिटियों की ओर से तैयारियों को अंतिम रूप देने का काम जारी है। हालांकि अभी तक पंडाल निर्माण का काम प्रारंभ नहीं हुआ है, लेकिन पंडाल के भीतरी हिस्से में लगने वाले सजावटी सामान का निर्माण कार्य शुरू हो गया है।
थर्माकोल, मिट््टी, कपड़े, माचिस की तिल्ली (जली हुई), अनाज (गेहूं-चावल), पैन की रिफील, सीप, कांच की गोली, पुराने अखबार समेत कई चीजों से इन दिनों सैंकड़ों कारीगर आयोजक की मांग और पंडाल के लिहाज से सजावटी सामान बनाने में जुटे हैं।
माचिस की तिल्ली (जली हुई) से महाभारत के पात्रों को बनाने में जुटे अरुण सेनापति ने बताया कि वे 12 इंच से 60 इंच तक महाभारत के विभिन्न पात्रों को रेखांकित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मारकीन कपड़े पर वे फेबिकॉल की मदद से श्रीकृष्ण, पांचों पांडव, दुर्योधन, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोपदी चेहरे समेत हस्तिानापुर व कुरुक्षेत्र के दृश्य को उतारने की कोशिश में जुटे हैं। ये सजावटी सामान किस डेकोरेटर के कहने पर और पूजा कमिटी के लिए बना रहे हैं? इसका जवाब देने से सेनापति ने मना करते हुए बस इतना कहा- इस बारे में कुछ भी बोलने की मनाही है, लेकिन इतना भर कह सकता हूं कि ये दृश्य आपको दक्षिण कोलकाता के किसी पंडाल में देखने को मिलेंगे।
मिट््टी से तलवार, भाला, गोला, कवच, ढाल समेत अस्त्र-शस्त्र बनाने में व्यस्त कुमारटोली के कारीगर ज्योतिर्मय पाल ने बताया कि मध्य कोलकाता की एक पूजा कमिटी की मांग पर वे यह सामग्री बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि गत्ते को विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रनुमा काट और उसपर मिट्टी का लेप लगाकर मांग के मुताबिक सजावट की सामग्री तैयार कर रहे हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि उन्हें पूजा कमिटी की ओर से विभिन्न आकार (साइज) के अस्त्र-शस्त्र बनाने का आर्डर मिला है। उनके मुताबिक पूजा कमिटी ने सितंबर के दूसरे सप्ताह तक सामग्री की आपूर्ति करने को कहा है। कौन-कौन हथियार कितनी संख्या में बना रहे हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर साढ़े चार नग (पीस) की आपूर्ति करनी है, इसे भाला, तलवार, गोला व कवच कितने-कितने होंगे फिलहाल यह कहना मुश्किल है।
इसी तरह थर्माकोल से संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सुप्रीम कोर्ट समेत भारत के पूर्व राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों का चित्र बनाने में जुटे इकबाल आलम ने बताया कि वे बारासात में आयोजित होने वाली एक पूजा कमिटी के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे जिस पूजा कमिटी के लिए सजावटी सामग्री बना रहे हैं उसकी (कमिटी) थीम देशप्रेम है। उन्होंने बताया कि पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकता, लेकिन सुनने में आया है कि बारासात के लोगों को संसद भवन नुमा पूजा पंडाल में देवी दुर्गा के दर्शन होंगे। पंडाल के आसपास देश ऐतिहासिक इमारतों, पूर्व राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के अलावा उन लोगों की थर्माकोल के निर्मित आकृति लगाई जाएंगी, जिन्होंने देशहित में उल्लेखनीय कार्य किया है।
अनाज (गेहूं-चावल) से इसी साल विश्वकप क्रिकेट जीतने वाली भारतीय खिलाड़ियों का चित्र बनाने वाले सपन मजुमदार नामक कारीगर ने कहा कि उत्तर कोलकाता के एक पूजा पंडाल में भारतीय क्रिकेट की झलक दिखेगी। उन्होंने बताया कि वे वैसे तो विश्व कप 2011 में शामिल सभी खिलाड़ियों का चित्र बना रहा है, लेकिन अधिक संख्या और बड़े आकार में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, विरेंद्र सहवाग और विरोट कोहली का चित्र बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि आयोजक पंडाल, प्रतिमा और बिजली सज्जा के माध्यम में भारतीय क्रिकेट की उपलब्धियों को दर्शाएंगे।
कोलकाता । दुर्गापूजा के मद्देनजर विभिन्न पूजा कमिटियों की ओर से तैयारियों को अंतिम रूप देने का काम जारी है। हालांकि अभी तक पंडाल निर्माण का काम प्रारंभ नहीं हुआ है, लेकिन पंडाल के भीतरी हिस्से में लगने वाले सजावटी सामान का निर्माण कार्य शुरू हो गया है।
थर्माकोल, मिट््टी, कपड़े, माचिस की तिल्ली (जली हुई), अनाज (गेहूं-चावल), पैन की रिफील, सीप, कांच की गोली, पुराने अखबार समेत कई चीजों से इन दिनों सैंकड़ों कारीगर आयोजक की मांग और पंडाल के लिहाज से सजावटी सामान बनाने में जुटे हैं।
माचिस की तिल्ली (जली हुई) से महाभारत के पात्रों को बनाने में जुटे अरुण सेनापति ने बताया कि वे 12 इंच से 60 इंच तक महाभारत के विभिन्न पात्रों को रेखांकित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मारकीन कपड़े पर वे फेबिकॉल की मदद से श्रीकृष्ण, पांचों पांडव, दुर्योधन, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोपदी चेहरे समेत हस्तिानापुर व कुरुक्षेत्र के दृश्य को उतारने की कोशिश में जुटे हैं। ये सजावटी सामान किस डेकोरेटर के कहने पर और पूजा कमिटी के लिए बना रहे हैं? इसका जवाब देने से सेनापति ने मना करते हुए बस इतना कहा- इस बारे में कुछ भी बोलने की मनाही है, लेकिन इतना भर कह सकता हूं कि ये दृश्य आपको दक्षिण कोलकाता के किसी पंडाल में देखने को मिलेंगे।
मिट््टी से तलवार, भाला, गोला, कवच, ढाल समेत अस्त्र-शस्त्र बनाने में व्यस्त कुमारटोली के कारीगर ज्योतिर्मय पाल ने बताया कि मध्य कोलकाता की एक पूजा कमिटी की मांग पर वे यह सामग्री बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि गत्ते को विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रनुमा काट और उसपर मिट्टी का लेप लगाकर मांग के मुताबिक सजावट की सामग्री तैयार कर रहे हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि उन्हें पूजा कमिटी की ओर से विभिन्न आकार (साइज) के अस्त्र-शस्त्र बनाने का आर्डर मिला है। उनके मुताबिक पूजा कमिटी ने सितंबर के दूसरे सप्ताह तक सामग्री की आपूर्ति करने को कहा है। कौन-कौन हथियार कितनी संख्या में बना रहे हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर साढ़े चार नग (पीस) की आपूर्ति करनी है, इसे भाला, तलवार, गोला व कवच कितने-कितने होंगे फिलहाल यह कहना मुश्किल है।
इसी तरह थर्माकोल से संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सुप्रीम कोर्ट समेत भारत के पूर्व राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रियों का चित्र बनाने में जुटे इकबाल आलम ने बताया कि वे बारासात में आयोजित होने वाली एक पूजा कमिटी के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे जिस पूजा कमिटी के लिए सजावटी सामग्री बना रहे हैं उसकी (कमिटी) थीम देशप्रेम है। उन्होंने बताया कि पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकता, लेकिन सुनने में आया है कि बारासात के लोगों को संसद भवन नुमा पूजा पंडाल में देवी दुर्गा के दर्शन होंगे। पंडाल के आसपास देश ऐतिहासिक इमारतों, पूर्व राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के अलावा उन लोगों की थर्माकोल के निर्मित आकृति लगाई जाएंगी, जिन्होंने देशहित में उल्लेखनीय कार्य किया है।
अनाज (गेहूं-चावल) से इसी साल विश्वकप क्रिकेट जीतने वाली भारतीय खिलाड़ियों का चित्र बनाने वाले सपन मजुमदार नामक कारीगर ने कहा कि उत्तर कोलकाता के एक पूजा पंडाल में भारतीय क्रिकेट की झलक दिखेगी। उन्होंने बताया कि वे वैसे तो विश्व कप 2011 में शामिल सभी खिलाड़ियों का चित्र बना रहा है, लेकिन अधिक संख्या और बड़े आकार में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, विरेंद्र सहवाग और विरोट कोहली का चित्र बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि आयोजक पंडाल, प्रतिमा और बिजली सज्जा के माध्यम में भारतीय क्रिकेट की उपलब्धियों को दर्शाएंगे।
Thursday, August 4, 2011
हिजड़ों की हुकार
शंकर जालान
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के पांडुआ इलाके में बीते दिनों संपन्न हुए हिजड़ों (किन्नरों) के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिजड़ों की हुंकार गुंजी। पुरुष और महिला के बीच अपनी पहचान के लड़ाई लड़ रहे किन्नरों इस सम्मलेन में कई बातें व मांग रखी। सम्मेलन में शिरकत कर रहे किन्नरों के मुताबिक अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई, तो वे देश भर में व्यापक पैमाने पर आंदोलन करने के बाध्य होंगे। किन्नरों के हितों की रक्षा के लिए लंबे अरसे से आंदोलन कर रही संस्था पश्चिम बंग वृहन्नला वेलफेयर सोसाइटी के बैनर तले हुए सम्मेलन में किन्नरों की मांग मंजूर न होने पर अनशन करने व धरना देने की चेतावनी दी गई। संस्था की सचिव शोभा हालदार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि रोजगार व पुवर्वास की व्यवस्था न होने से किन्नरों की हालत दयनीय हो गई है। नौकरी व रोजगार न होने के कारण असंख्य किन्नर भीख मांग कर गुजारा कर रहे हैं। यह दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। उनके मुताबिक बिगत में किए गए आंदोलन के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकला है। सम्मेलन में देश के कई राज्यों के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान समेत कई देशों के किन्नर शामिल हुए और इन सभी ने एक स्वर में देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने के साथ ही अनशन पर बैठने की बात कही।
आप लोगों की क्या मांग है? आप समाज और सरकार से क्या चाहते हैं? इसके जवाब में कई किन्नरों ने एक साथ कहा कि अभी भी अनगिनत किन्नर को मतदाता परचियपत्र, बीपीएल कार्ड, स्वास्थ्य बीमा, पासपोर्ट नहीं मिला है। हम यह सारी सुविधा मिले, साथ ही बैंक में खाता खोलने में हो रही परेशानी से निजात भी। रुपमती नामक एक किन्नर ने बताया कि केंद्र व राज्य सरकार ने समाज के शोषित, पीड़ित व उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाई है। इन योजनाओं का लाभ किन्नरों को नहीं मिल रहा है। उसने कहा कि कुछ लोग फर्जी किन्नर बन कर लोगों से पैसे वसूल रहे हैं। उसने सरकार से किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए कल्याण कार्यक्रम बनाने की अपील की करने के साथ ही यह आरोप लगाया कि पुलिस की मिलीभगत से यह फर्जी किन्नरों का धंधा जारी है।
संस्था के प्रवक्ता शंकर बनिक के मुताबिक देश में उपहास के पात्र बने किन्नरों की तादाद करीब साठ लाख है। इनमें पश्चिम बंगाल के सवा लाख किन्नर शामिल हैं। कोलकाता में निवास करने वाले किन्नरों की संख्या करीब पचास हजार है। बनिक ने कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार वोट के लिए किन्नरों का दरवाजा खटखटाते हैं व इसके बाद चले जाते हैं।
एक किन्नर ने बताया कि विवाह-शादी या फिर बच्चे के जन्म जैसी शुभ घड़ी के दौरान नाच-गाकर उनका गुजारा चलता है, लेकिन जब साहिर लुधियानवी का लिखा गीत - इंसान की औलाद है इंसान बनेगा सुनती तब काफी बेदना होती है। क्योंकि समाज के लोग न वह मर्द समझते है और न औरत। और तो और इंसान भी नहीं मानते व हमेशा हिकारत की नजर से देखते हैं। उनकी कुदरती कमी पर कोई हमदर्दी नहीं रखता, बल्कि लोग मजाक उड़ाते हैं। त्रासदी यह कि समाज ने अपनी देन को ही दरकिनार कर रखा है। भीख मांगकर गुजर-बसर करना हमारी किस्मत बन चुकी है और कहीं-कहीं तो देह व्यापार भी।
रेशमा नामक एक किन्नर ने बताया कि किन्नरों की बिरादरी के नेता ही उनका शोषण करते हैं। हम जैसे कमजोर, बेचारों, किस्मत के मारों की बेबसी, कशमकश, दर्द और तड़प को शिद्दत से महसूस करके इस कड़वी हकीकत और
किन्नरों की जिंदगी पर दिलोदिमाग को झकझोरने वाली फिल्म है- ... और नेहा नहीं बिक पाई। सक्सेना की बतौर राइटर-प्रोड्यूसर-डायरेक्टर यह पहली फिल्म है। यही नहीं, वे इसके सूत्रधार भी बने हैं। एक घंटे की इस फिल्म में किन्नरों के दुख-दर्द को रेखांकित किया गया है।
उसने बताया कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों कि बंधुआ मजदूरी खत्म हो चुकी है, पर किन्नरों की दुनिया में यह कुप्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। माता-पिता (जनक) और जमाने के तानों से परेशान होकर हिजड़े उनकी टोली में शामिल होने को मजबूर होते हैं।
एक किन्नर ने कहा कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल में किन्नरों की दशा अधिक दयनीय है। उनसे कहा कि वे बहुत जल्द अपने कुछ साथियों के साथ राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करेंगी और उनसे (ममता) से किन्नरों की भलाई बाबत कुछ कदम उठाने का आग्रह भी।
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के पांडुआ इलाके में बीते दिनों संपन्न हुए हिजड़ों (किन्नरों) के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिजड़ों की हुंकार गुंजी। पुरुष और महिला के बीच अपनी पहचान के लड़ाई लड़ रहे किन्नरों इस सम्मलेन में कई बातें व मांग रखी। सम्मेलन में शिरकत कर रहे किन्नरों के मुताबिक अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई, तो वे देश भर में व्यापक पैमाने पर आंदोलन करने के बाध्य होंगे। किन्नरों के हितों की रक्षा के लिए लंबे अरसे से आंदोलन कर रही संस्था पश्चिम बंग वृहन्नला वेलफेयर सोसाइटी के बैनर तले हुए सम्मेलन में किन्नरों की मांग मंजूर न होने पर अनशन करने व धरना देने की चेतावनी दी गई। संस्था की सचिव शोभा हालदार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि रोजगार व पुवर्वास की व्यवस्था न होने से किन्नरों की हालत दयनीय हो गई है। नौकरी व रोजगार न होने के कारण असंख्य किन्नर भीख मांग कर गुजारा कर रहे हैं। यह दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। उनके मुताबिक बिगत में किए गए आंदोलन के बावजूद कोई नतीजा नहीं निकला है। सम्मेलन में देश के कई राज्यों के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान समेत कई देशों के किन्नर शामिल हुए और इन सभी ने एक स्वर में देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने के साथ ही अनशन पर बैठने की बात कही।
आप लोगों की क्या मांग है? आप समाज और सरकार से क्या चाहते हैं? इसके जवाब में कई किन्नरों ने एक साथ कहा कि अभी भी अनगिनत किन्नर को मतदाता परचियपत्र, बीपीएल कार्ड, स्वास्थ्य बीमा, पासपोर्ट नहीं मिला है। हम यह सारी सुविधा मिले, साथ ही बैंक में खाता खोलने में हो रही परेशानी से निजात भी। रुपमती नामक एक किन्नर ने बताया कि केंद्र व राज्य सरकार ने समाज के शोषित, पीड़ित व उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बनाई है। इन योजनाओं का लाभ किन्नरों को नहीं मिल रहा है। उसने कहा कि कुछ लोग फर्जी किन्नर बन कर लोगों से पैसे वसूल रहे हैं। उसने सरकार से किन्नरों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए कल्याण कार्यक्रम बनाने की अपील की करने के साथ ही यह आरोप लगाया कि पुलिस की मिलीभगत से यह फर्जी किन्नरों का धंधा जारी है।
संस्था के प्रवक्ता शंकर बनिक के मुताबिक देश में उपहास के पात्र बने किन्नरों की तादाद करीब साठ लाख है। इनमें पश्चिम बंगाल के सवा लाख किन्नर शामिल हैं। कोलकाता में निवास करने वाले किन्नरों की संख्या करीब पचास हजार है। बनिक ने कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार वोट के लिए किन्नरों का दरवाजा खटखटाते हैं व इसके बाद चले जाते हैं।
एक किन्नर ने बताया कि विवाह-शादी या फिर बच्चे के जन्म जैसी शुभ घड़ी के दौरान नाच-गाकर उनका गुजारा चलता है, लेकिन जब साहिर लुधियानवी का लिखा गीत - इंसान की औलाद है इंसान बनेगा सुनती तब काफी बेदना होती है। क्योंकि समाज के लोग न वह मर्द समझते है और न औरत। और तो और इंसान भी नहीं मानते व हमेशा हिकारत की नजर से देखते हैं। उनकी कुदरती कमी पर कोई हमदर्दी नहीं रखता, बल्कि लोग मजाक उड़ाते हैं। त्रासदी यह कि समाज ने अपनी देन को ही दरकिनार कर रखा है। भीख मांगकर गुजर-बसर करना हमारी किस्मत बन चुकी है और कहीं-कहीं तो देह व्यापार भी।
रेशमा नामक एक किन्नर ने बताया कि किन्नरों की बिरादरी के नेता ही उनका शोषण करते हैं। हम जैसे कमजोर, बेचारों, किस्मत के मारों की बेबसी, कशमकश, दर्द और तड़प को शिद्दत से महसूस करके इस कड़वी हकीकत और
किन्नरों की जिंदगी पर दिलोदिमाग को झकझोरने वाली फिल्म है- ... और नेहा नहीं बिक पाई। सक्सेना की बतौर राइटर-प्रोड्यूसर-डायरेक्टर यह पहली फिल्म है। यही नहीं, वे इसके सूत्रधार भी बने हैं। एक घंटे की इस फिल्म में किन्नरों के दुख-दर्द को रेखांकित किया गया है।
उसने बताया कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भले ही बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों कि बंधुआ मजदूरी खत्म हो चुकी है, पर किन्नरों की दुनिया में यह कुप्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। माता-पिता (जनक) और जमाने के तानों से परेशान होकर हिजड़े उनकी टोली में शामिल होने को मजबूर होते हैं।
एक किन्नर ने कहा कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल में किन्नरों की दशा अधिक दयनीय है। उनसे कहा कि वे बहुत जल्द अपने कुछ साथियों के साथ राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करेंगी और उनसे (ममता) से किन्नरों की भलाई बाबत कुछ कदम उठाने का आग्रह भी।
Thursday, July 28, 2011
गोरखालैंड- त्रिपक्षीय करार या भविष्य की टकरार
शंकर जालान
बीते कुछ सालों से गोरखालैंड के नाम पर पश्चिम बंगाल के विभाजन की मांग
को बीते सप्ताह उस वक्त विराम लगा, जब केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम,
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा
(जीजेएम) के लोगों के बीच त्रिपक्षीय करार हुआ और एक समझौते पर हस्ताक्षर
किए गए। राजनीतिक से प्रभावित लोग भले ही इस समझौते को गोरखालैंड का सटीक
हल माने, लेकिन जानकारों के मुताबिक इस त्रिपक्षीय करार में कहीं न कहीं
भविष्य में होने वाली टकरार नजर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के
शब्दों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पहल के कारण राज्य के विभाजन की
नौबत नहीं आई। वहीं वाममोर्चा, भाजपा समेत एवं अन्य विपक्षी दलों के
नेताओं ने समझौते पर असंतोष जताया। दूसरे शब्दों में कहे को समझौते के
कारण पहाड़ में कही खुशी तो कही गम का माहौल है।
समझौते पर हस्ताक्षर के लिए आयोजित समारोह में बनर्जी ने कहा- राज्य का
विभाजन नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल एक है और एक ही रहेगा। दार्जीलिंग
पश्चिम बंगाल का अविभाज्य अंग है। यह राज्य और इसके पर्वतीय हिस्सों का
हृदय-स्थल है। अब पर्वतीय और मैदानी भागों के लोग समृद्धि एवं विकास की
ओर बढ़ेंगे।
जिले के कुर्सियांग उपमंडल के पिनतैल गांव में आयोजित समझौता समारोह में
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम भी शामिल हुए। यह ऐतिहासिक समझौता गोरखा
जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम), पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच हुआ है।
इस दौरान चिदंबरम ने कहा कि नई स्वायत्त संस्था का गठन इस समझौते का मूल
तत्व है। स्वायत्त संस्था को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) नाम
दिया गया है जो निर्वाचित सदस्यों की अधिकार सम्पन्न परिषद होगी। इस
परिषद के पास 1980 के दशक में गठित दार्जीलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद
(डीजीएचसी) की तुलना में अधिक अधिकार होंगे।
खबर है कि नई पर्वतीय विकास परिषद का नाम गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन
रखे जाने के कारण मुख्यमंत्री बनर्जी को आलोचना का सामना करना पड़ रहा
है। कयास लगाया जा रहा है कि परिषद में शामिल लोग अंतत: अलग गोरखालैंड
राज्य गठन के लिए बाध्य कर सकते हैं। इस बाबत ने बनर्जी ने सफाई दी हमने
केवल अंग्रेजी के 'रीजनल' शब्द को 'टेरिटोरियल' में बदला है। इसके अलावा
विशेष कोई बदलाव नहीं हुआ है।
त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के विरोध में बंगाल और बांग्ला
भाषा बचाओ समिति ने 48 घंटे के बंद किया। इस वजह से के सिलीगुड़ी उपमंडल
और उसके पड़ोसी जलपाईगुड़ी इलाके में जनजीवन आंशिक रूप से प्रभावित रहा।
कस्बे में बड़ी दुकानें बंद रहीं, निजी बसें नहीं चलीं। सड़कों पर वाहनों
और ऑटो-रिक्शा की संख्या कम रही। सरकारी कार्यालयों में सामान्य रूप से
काम-काज हुआ। पुलिस ने बताया कि धरना देने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार कर
लिया गया।
राजनीतिक के जानकारों के मुताबिक, त्रिपक्षीय समझौते के बावजूद अलग
गोरखालैंड राज्य की मांग पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, लेकिन गौरतलब यह
है कि यह मांग फिलहाल दब गई है। जीजेएम के अध्यक्ष विमल गुरुंग करार के
बाद भी अलग गोरखालैंड की मांग सिर्फ राजनीतिक विवशता के कारण कर रहे हैं।
गुरूंग भली-भांति जानते हैं कि यदि वे इस मांग से पीछे हटे तो उनका भी
हाल वही होगा जो कभी सुभाष घीसिंग का हुआ था।
मोटे तौर गुरुंग द्वारा पृथक गोरखालैंड की मांग किए जाने से फिलहाल इलाके
में किसी अशांति की आशंका नहीं है। जीटीए का चुनाव यदि छह महीने बाद होता
है तब भी चुनाव के बाद उसके पांच वर्ष के कार्यकाल तक पर्वतीय क्षेत्र
में शांति कायम रखने की कोशिश जीजेएम के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम
नहीं होगी।
वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समझौते पर दस्तखत होने के साथ
ही चालीस महीने से पर्वतीय इलाके में जारी संघर्ष पर लगभग विराम लग गया
है। यही नहीं, समझौते पर दस्तखत होने के साथ ही पूरे पर्वतीय क्षेत्र के
लोग खुशी से झूम उठे उससे साफ है कि सरकार व प्रशासन पर यहां के लोगों का
भरोसा फिर से कायम हुआ है। ममतापंथी लोग इसे उनकी (ममता) की बड़ी
उपलब्धि मान रहे हैं। वे कहते हैं कांग्रेस जो काम सात साल में तेलंगाना
में नहीं कर पाई, उसे तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने महज दो महीने में कर
दिखाया। जीजेएम अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर अस्तित्व में आया और जल्द
ही पूरे दार्जिलिंग में उसकी तूती बोलने लगी। विमल गुरुंग उसके सबसे
शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। उसी गुरुंग को ममता बनर्जी आज यदि जंगी
आंदोलन से विरत रहने के लिए राजी करा सकी हैं तो क्या यह कम बड़ी बात है?
त्रिपक्षीय करार कर ममता ने एक संदेश यह भी दिया है कि छोटी-छोटी
सांस्कृतिक अस्मिताओं को मान्यता देने में सरकारों को उदारता दिखानी
चाहिए। अलगाववादी आंदोलनों से निपटने के लिए सरकारें जब-जब बल प्रयोग
करती हैं तब-तब परिस्थिति और जटिल होती है।
वहीं, वाममोर्चा व भाजपा समेत अन्य दलों के नेता इस समझौते को
दार्जिलिंग समस्या का अंतिम समाधान नहीं मान रहे हैं इन नेताओं का कहना
है कि समझौता और समाधान एक चीज नहीं हैं। यह भी सही है कि सुलह-समझौता
दरअसल समाधान की तरफ बढ़ने वाला एक कदम होता है। इस कदम से यदि अंतिम
समाधान की राह प्रशस्त होती है तब भी यह बेहद तात्पर्यपूर्ण है।
दार्जिलिंग के लोगों की बड़ी शिकायत यह रही है कि सरकार इस क्षेत्र से
खूब राजस्व उगाहती है, पर यहां के विकास पर खर्च बहुत कम करती है।
सरकारी पक्ष के लोग यह दलील दे रहे हैं कि तितरफा समझौते में जीटीए को
सिर्फ भारी बजट ही नहीं दिया गया है, उसे विकास काम में अपने हिसाब से
खर्च करने की आजादी भी दी गई है। यदि इस धनराशि का दुरुपयोग नहीं हुआ तो
निश्चित ही पहाड़ का परिदृश्य बदलेगा। ममता दार्जिलिंग समेत विकास में
पिछड़े पूरे उत्तर बंगाल में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए
सचेष्ट हैं। जीटीए करार के उपरांत उन्होंने पूरे उत्तर बंगाल के लिए जो
पैकेज घोषित किया है, उसका यदि सही-सही क्रियान्वयन हुआ तो उत्तर बंगाल
से भेदभाव बरतने और विकास में सौतेला व्यवहार किए जाने से बढ़ती गई
क्षेत्रीय असंतुलन की खाई पाटने में निश्चित ही मदद मिलेगी।
बीते कुछ सालों से गोरखालैंड के नाम पर पश्चिम बंगाल के विभाजन की मांग
को बीते सप्ताह उस वक्त विराम लगा, जब केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम,
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा
(जीजेएम) के लोगों के बीच त्रिपक्षीय करार हुआ और एक समझौते पर हस्ताक्षर
किए गए। राजनीतिक से प्रभावित लोग भले ही इस समझौते को गोरखालैंड का सटीक
हल माने, लेकिन जानकारों के मुताबिक इस त्रिपक्षीय करार में कहीं न कहीं
भविष्य में होने वाली टकरार नजर आ रही है। तृणमूल कांग्रेस समर्थकों के
शब्दों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पहल के कारण राज्य के विभाजन की
नौबत नहीं आई। वहीं वाममोर्चा, भाजपा समेत एवं अन्य विपक्षी दलों के
नेताओं ने समझौते पर असंतोष जताया। दूसरे शब्दों में कहे को समझौते के
कारण पहाड़ में कही खुशी तो कही गम का माहौल है।
समझौते पर हस्ताक्षर के लिए आयोजित समारोह में बनर्जी ने कहा- राज्य का
विभाजन नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल एक है और एक ही रहेगा। दार्जीलिंग
पश्चिम बंगाल का अविभाज्य अंग है। यह राज्य और इसके पर्वतीय हिस्सों का
हृदय-स्थल है। अब पर्वतीय और मैदानी भागों के लोग समृद्धि एवं विकास की
ओर बढ़ेंगे।
जिले के कुर्सियांग उपमंडल के पिनतैल गांव में आयोजित समझौता समारोह में
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम भी शामिल हुए। यह ऐतिहासिक समझौता गोरखा
जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम), पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच हुआ है।
इस दौरान चिदंबरम ने कहा कि नई स्वायत्त संस्था का गठन इस समझौते का मूल
तत्व है। स्वायत्त संस्था को गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) नाम
दिया गया है जो निर्वाचित सदस्यों की अधिकार सम्पन्न परिषद होगी। इस
परिषद के पास 1980 के दशक में गठित दार्जीलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद
(डीजीएचसी) की तुलना में अधिक अधिकार होंगे।
खबर है कि नई पर्वतीय विकास परिषद का नाम गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन
रखे जाने के कारण मुख्यमंत्री बनर्जी को आलोचना का सामना करना पड़ रहा
है। कयास लगाया जा रहा है कि परिषद में शामिल लोग अंतत: अलग गोरखालैंड
राज्य गठन के लिए बाध्य कर सकते हैं। इस बाबत ने बनर्जी ने सफाई दी हमने
केवल अंग्रेजी के 'रीजनल' शब्द को 'टेरिटोरियल' में बदला है। इसके अलावा
विशेष कोई बदलाव नहीं हुआ है।
त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के विरोध में बंगाल और बांग्ला
भाषा बचाओ समिति ने 48 घंटे के बंद किया। इस वजह से के सिलीगुड़ी उपमंडल
और उसके पड़ोसी जलपाईगुड़ी इलाके में जनजीवन आंशिक रूप से प्रभावित रहा।
कस्बे में बड़ी दुकानें बंद रहीं, निजी बसें नहीं चलीं। सड़कों पर वाहनों
और ऑटो-रिक्शा की संख्या कम रही। सरकारी कार्यालयों में सामान्य रूप से
काम-काज हुआ। पुलिस ने बताया कि धरना देने वाले तीन लोगों को गिरफ्तार कर
लिया गया।
राजनीतिक के जानकारों के मुताबिक, त्रिपक्षीय समझौते के बावजूद अलग
गोरखालैंड राज्य की मांग पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, लेकिन गौरतलब यह
है कि यह मांग फिलहाल दब गई है। जीजेएम के अध्यक्ष विमल गुरुंग करार के
बाद भी अलग गोरखालैंड की मांग सिर्फ राजनीतिक विवशता के कारण कर रहे हैं।
गुरूंग भली-भांति जानते हैं कि यदि वे इस मांग से पीछे हटे तो उनका भी
हाल वही होगा जो कभी सुभाष घीसिंग का हुआ था।
मोटे तौर गुरुंग द्वारा पृथक गोरखालैंड की मांग किए जाने से फिलहाल इलाके
में किसी अशांति की आशंका नहीं है। जीटीए का चुनाव यदि छह महीने बाद होता
है तब भी चुनाव के बाद उसके पांच वर्ष के कार्यकाल तक पर्वतीय क्षेत्र
में शांति कायम रखने की कोशिश जीजेएम के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम
नहीं होगी।
वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समझौते पर दस्तखत होने के साथ
ही चालीस महीने से पर्वतीय इलाके में जारी संघर्ष पर लगभग विराम लग गया
है। यही नहीं, समझौते पर दस्तखत होने के साथ ही पूरे पर्वतीय क्षेत्र के
लोग खुशी से झूम उठे उससे साफ है कि सरकार व प्रशासन पर यहां के लोगों का
भरोसा फिर से कायम हुआ है। ममतापंथी लोग इसे उनकी (ममता) की बड़ी
उपलब्धि मान रहे हैं। वे कहते हैं कांग्रेस जो काम सात साल में तेलंगाना
में नहीं कर पाई, उसे तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने महज दो महीने में कर
दिखाया। जीजेएम अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर अस्तित्व में आया और जल्द
ही पूरे दार्जिलिंग में उसकी तूती बोलने लगी। विमल गुरुंग उसके सबसे
शक्तिशाली नेता के रूप में उभरे। उसी गुरुंग को ममता बनर्जी आज यदि जंगी
आंदोलन से विरत रहने के लिए राजी करा सकी हैं तो क्या यह कम बड़ी बात है?
त्रिपक्षीय करार कर ममता ने एक संदेश यह भी दिया है कि छोटी-छोटी
सांस्कृतिक अस्मिताओं को मान्यता देने में सरकारों को उदारता दिखानी
चाहिए। अलगाववादी आंदोलनों से निपटने के लिए सरकारें जब-जब बल प्रयोग
करती हैं तब-तब परिस्थिति और जटिल होती है।
वहीं, वाममोर्चा व भाजपा समेत अन्य दलों के नेता इस समझौते को
दार्जिलिंग समस्या का अंतिम समाधान नहीं मान रहे हैं इन नेताओं का कहना
है कि समझौता और समाधान एक चीज नहीं हैं। यह भी सही है कि सुलह-समझौता
दरअसल समाधान की तरफ बढ़ने वाला एक कदम होता है। इस कदम से यदि अंतिम
समाधान की राह प्रशस्त होती है तब भी यह बेहद तात्पर्यपूर्ण है।
दार्जिलिंग के लोगों की बड़ी शिकायत यह रही है कि सरकार इस क्षेत्र से
खूब राजस्व उगाहती है, पर यहां के विकास पर खर्च बहुत कम करती है।
सरकारी पक्ष के लोग यह दलील दे रहे हैं कि तितरफा समझौते में जीटीए को
सिर्फ भारी बजट ही नहीं दिया गया है, उसे विकास काम में अपने हिसाब से
खर्च करने की आजादी भी दी गई है। यदि इस धनराशि का दुरुपयोग नहीं हुआ तो
निश्चित ही पहाड़ का परिदृश्य बदलेगा। ममता दार्जिलिंग समेत विकास में
पिछड़े पूरे उत्तर बंगाल में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए
सचेष्ट हैं। जीटीए करार के उपरांत उन्होंने पूरे उत्तर बंगाल के लिए जो
पैकेज घोषित किया है, उसका यदि सही-सही क्रियान्वयन हुआ तो उत्तर बंगाल
से भेदभाव बरतने और विकास में सौतेला व्यवहार किए जाने से बढ़ती गई
क्षेत्रीय असंतुलन की खाई पाटने में निश्चित ही मदद मिलेगी।
Saturday, July 23, 2011
बिखराव के कगार पर वाममोर्चा
शंकर जालान
पश्चिम बंगाल में लगातार व रिकार्ड ३४ साल तक सत्ता पर काबिज रहा और हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन के हाथों करारी हार झेलने के बाद सत्ता से दूर हुआ वाममोर्चा इन दिनों बिखराव के कगार पर है या यूं कहें कि बिखराव का शिकार हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कह सकते हैं कि जो वाममोर्चा ३४ सालों तक सत्तासीन रहा, उसमें सत्ता से दूर होते ही ३४ दिनों के भीतर मनमुटाव शुरू हो गया। वाममोर्चा के नेतृत्व करने वाली व वाम घराने में बड़े भाई की भूमिका निभाने वाली माकपा को अब मोर्चा के घटक दल चुनौती देने की मुद्रा में आ गए हैं। ये घटक दल न केवल विधानसभा चुनाव में हार की जिम्मेवारी माकपा पर थोप रहे हैं, बल्कि मोर्चा की कुछ छोटी पार्टियों ने मोर्चा से अलग होने की कवायद शुरू कर दी है। वैसे कहने को ऊपर से सभी घटक दल वाममोर्चा की एकता का राग अलाप रहे हैं, लेकिन भीतर-ही-भीतर मोर्चा में बिखराव होता जा रहा है। वाममोर्चा के जिन घटक दलों ने इन दिनों बगावती तेवर अख्तियार कर रखा है, उनमें आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी व पश्चिम बंगाल समाजवादी पार्टी प्रमुख है। मोर्चा की एक अन्य सहयोगी भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी (भाकपा) फिलहाल मौन है। हालांकि इसके नेता भी कभी-कभार या गाहे-बगाहे माकपा के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहते हैं, लेकिन वे इस मुद्दे पर अभी उतने मुखर नहीं हुए हैं, जितने आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी व समाजवादी पार्टी के नेता दिख रहे हैं।
फारवर्ड ब्लाक के राष्ट्रीय महासचिव देवव्रत विश्वास ने तो पिछले दिनों वाममोर्चा में नेतृत्व परिवर्तन की मांग तक उठा डाली थी। यहीं नहीं, बीते दिनों संपन्न हुए महाजाति सदन में पार्टी के ७२वें स्थापना दिवस के मौके पर वक्तव्य रखते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर एक वृहद वाममोर्चा गठन का प्रस्ताव दिया था। साथ ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से मोर्चा के नेतृत्व के मुद्दे पर माकपा की योग्यता को कटघरे में खड़ा किया था। वहीं, पार्टी के प्रदेश सचिव अशोक घोष ने भी अपने भाषण में नैनो परियोजना के लिए टाटा को हुगली जिले के सिंगुर में दी गई जमीन की प्रक्रिया पर सवाल उठाया था।
कहना गलत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल में लगातार सात बार सत्ता में रहे वाममोर्चा में सत्ता से बाहर होते ही सात सप्ताह भी एकता कायम नहीं रह सकी। राजनीतिक हल्कों में यह भी चर्चा है कि माकपा में बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु और पार्टी के महासचिव प्रकाश करात पार्टी के दिग्गज व दिवंगत नेता ज्योति बसु, अनिल विश्वास और हरकिशन सिंह सुरजीत का सटीक व सही विकल्प नहीं बन सके। ज्योति बसु ने २१ जून १९७७ को पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के शासन में आने पर मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला था और कुशलतापूर्वक वे वर्ष २००० तक यानी लगातार २३ सालों कर इस जिम्मेवारी को निभाते रहे। सन २००० में शारीरिक अस्वस्थता की वजह से उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी बुद्धदेव भट्टाचार्य को सौंप दी थी।
बुद्धदेव भट्टाचार्य दिवंगत ज्योति बसु के सही उत्तराधिकारी नहीं बन पाए। इसी तरह माकपा के दिवंगत नेता व पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रदेश इकाई के सचिव अनिल विश्वास के निधन के बाद वाममोर्चा के अध्यक्ष विमान बसु ने पार्टी प्रदेश सचिव का पद संभाला था, लेकिन लगातार पिछले कई चुनावों में हार के बाद अब विमान बसु की काबिलियत पर भी सवाल उठने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो विमान बसु भी बुद्धदेव भट्टाचार्य की तरह अनिल विश्वास के सटीक उत्तराधिकारी बनने में विफल रहे।
माकपा के महासचिव प्रकाश करात पर तो इन दिनों पार्टी के भीतर और बाहर लगातार आक्रमण हो रहा है। प्रकाश करात वर्ष २००५ में हुए माकपा के राष्ट्रीय अधिवेशन (पार्टी कांग्रेस) के बाद पार्टी के महासचिव के पद पर आसीन हुए थे। पार्टी के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी शरीरिक दुर्बलता का हवाला देते हुए यह पद छोड़ दिया था और तब प्रकाश करात पार्टी के महासचिव चुने गए थे। तब से लेकर अपवाद स्वरूप वर्ष २००६ के छोड़कर पश्चिम बंगाल में छोटे-बड़े जितने भी चुनाव हुए उनमें वाममोर्चा और विशेषकर माकपा को मुंह की खानी पड़ी। चाहे २००८ का पंचायत चुनाव हो या फिर २००९ का लोकसभा चुनाव और २०१० का नगर निगम व नगरपालिका चुनाव।
इन सभी चुनावों में वाममोर्चा व माकपा शिकस्त खाती रही। २०११ के विधानसभा चुनाव में तो मानो वाममोर्चा का सूपड़ा ही साफ हो गया। राज्य की २९४ सीटों में से वाममोर्चा को मात्र ६२ सीटों पर ही कामयाबी मिली। इस वजह से माकपा की बंगाल इकाई में पार्टी महासचिव प्रकाश करात के खिलाफ विरोधी स्वर उभरने लगे। पार्टी के बंगाल इकाई के नेता मानते हैं कि प्रकाश करात द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसलों की वजह से माकपा का इतना बुरा हाल हुआ है। इनमें २००८ में केंद्र में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से परमाणु करार के मुद्दे पर वाममोर्चा का समर्थन वापस लेने का फैसला प्रमुख है।
बारिकी तौर पर देखा जाए तो मोर्चा की विफलता में यदि प्रकाश करात की नीतियां दोषी हैं, तो माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई की एक के बाद एक गलतियां भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। सिंगुर व नंदीग्राम आंदोलन ने पश्चिम बंगाल वाममोर्चा की न केवल नींव हिला दी, बल्कि इसके मजबूत किले को भी ध्वस्त कर दिया। इन सब की वजह रही बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु, निरूपम सेन, गौतम देव जैसे माकपा नेताओं की वे नीतियां, जिसने इस राज्य में ३४ साल के वाम शासन को सत्ता से उखाड़ फेंका।
वर्ष २००६ में राज्य की २९४ विधानसभा की सीटों में से २३५ पर जीत हासिल करने वाले वाममोर्चा को २०११ के विधानसभा चुनाव में महज ६२ सीटों से संतोष करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन ने इस चुनाव में वाममोर्चा का विजय रथ रोक दिया।
वैसे माकपा ने कहा है कि आगामी दिनों में इस अप्रत्याशिक हार की समीक्षा की जाएगी। साथ ही यह भी कहा है कि वाममोर्चा राज्य में एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएगा, लेकिन हार के बाद पार्टी कैडरों और कार्यकर्ताओं का मनोबल एकदम से टूट गया है। वे अब बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु व गौतम देव जैसे नेताओं को इस हार का जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। उनका सबसे ज्यादा गुस्सा पार्टी के महासचिव प्रकाश करात पर है।
इधर, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य इन दिनों खुद को पार्टी कार्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट व अपने आवास तक सीमित कर लिया है। यहां तक कि माकपा पोलित ब्यूरो का सदस्य होने के बावजूद उन्होंने पिछले दिनों हुई पोलित ब्यूरो की बैठक और केंद्रीय कमिटी की बैठकों में हिस्सा नहीं लिया। वैसे बुद्धदेव बीते कुछ सालों से लगातार माकपा पोलित ब्यूरो की बैठक में गैरहाजिर होते रहे हैं। हाल में विधानसभा चुनाव में घोर व अपमानजनक पराजय के बाद तो उन्होंने पोलित ब्यूरो व पार्टी की केंद्रीय कमिटी से हटने की इच्छा जताई थी। हालांकि बाद में पार्टी ने उन्हें (बुद्धदेव को) मना लिया और वे फिलहाल पार्टी के दोनों संगठनों से जुड़े हैं।
पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की इस दुर्गति के लिए माकपा के नेता व राज्य के पूर्व आवास मंत्री गौतम देव भी बड़े जिम्मेवार हैं। २०११ के विधानसभा चुनाव के दौरान विरोधी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ गौतम देव का बड़बोलापन कुछ इस कदर बढ़ा कि इसने चुनाव में पार्टी की पूरी फजीहत ही करा दी। इसी तरह राज्य के पूर्व भूमि व भूमि सुधार मंत्री व इस बार के चुनाव में माकपा के चंद जीतने वाले नेताओं में शुमार अब्दुर रज्जाक मोल्ला का बगावती सुर भी कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बीच-बीच में मोल्ला ऐसा बयान जारी कर देते हैं कि माकपा नेतृत्व को उनको समझाने-बुझाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
इसी तरह लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का मुद्दा भी रह-रहकर पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। वैसे सोमनाथ चटर्जी ने विधानसभा चुनाव में गौतम देव समेत कई माकपा उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था, लेकिन चुनाव बाद की परिस्थितियों में उनके देवर भी बदल गए। १३ मई को विधानसभा चुनाव के नतीजा आने व राज्य की मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने के बाद ममता बनर्जी ने सोमनाथ चटर्जी के साथ मुलाकात की थी। हालांकि ममता ने इस मुलाकात को सौजन्यपूर्ण मुलाकात कहा था, लेकिन इससे माकपा नेताओं की स्थिति बगलें झांकने जैसी हो गई थी।
याद रहे कि वर्ष २००८ में पार्टी के निर्देश का उल्लंघन करने के आरोप में माकपा महासचिव प्रकाश करात ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। बावजूद चटर्जी खुद को वामपंथी बताते रहे और विधानसभा चुनाव में उन्होंने माकपा के पक्ष में प्रचार भी किया।
इधर विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद से पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में अवैध हथियारों की बरामदगी भी माकपा की परेशानी का कारण बनी हुई है। क्योंकि से सारे अवैध हथियार माकपा के स्थानीय कार्यालयों या पार्टी नेताओं के घर के आसपास मिल रहे हैं। हालांकि माकपा इसके पीछे तृणमूल कांग्रेस व राज्य पुलिस की मिली-भगत को वजह बता रही है और इसे वह पार्टी के खिलाफ साजिश करार दे रही है। यही नहीं राज्य में राजनीतिक हिंसा के पीछे भी माकपा खुद को पाक साफ बताते हुए इसे तृणमूल की साजिश बताने में लगी है, लेकिन पार्टी की यह सारी कवायद लगभग विफल साबित हो रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वाममोर्चा गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है और बिखराव के सम्मुख पहुंच गया है।
पश्चिम बंगाल में लगातार व रिकार्ड ३४ साल तक सत्ता पर काबिज रहा और हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन के हाथों करारी हार झेलने के बाद सत्ता से दूर हुआ वाममोर्चा इन दिनों बिखराव के कगार पर है या यूं कहें कि बिखराव का शिकार हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कह सकते हैं कि जो वाममोर्चा ३४ सालों तक सत्तासीन रहा, उसमें सत्ता से दूर होते ही ३४ दिनों के भीतर मनमुटाव शुरू हो गया। वाममोर्चा के नेतृत्व करने वाली व वाम घराने में बड़े भाई की भूमिका निभाने वाली माकपा को अब मोर्चा के घटक दल चुनौती देने की मुद्रा में आ गए हैं। ये घटक दल न केवल विधानसभा चुनाव में हार की जिम्मेवारी माकपा पर थोप रहे हैं, बल्कि मोर्चा की कुछ छोटी पार्टियों ने मोर्चा से अलग होने की कवायद शुरू कर दी है। वैसे कहने को ऊपर से सभी घटक दल वाममोर्चा की एकता का राग अलाप रहे हैं, लेकिन भीतर-ही-भीतर मोर्चा में बिखराव होता जा रहा है। वाममोर्चा के जिन घटक दलों ने इन दिनों बगावती तेवर अख्तियार कर रखा है, उनमें आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी व पश्चिम बंगाल समाजवादी पार्टी प्रमुख है। मोर्चा की एक अन्य सहयोगी भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी (भाकपा) फिलहाल मौन है। हालांकि इसके नेता भी कभी-कभार या गाहे-बगाहे माकपा के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहते हैं, लेकिन वे इस मुद्दे पर अभी उतने मुखर नहीं हुए हैं, जितने आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक, आरएसपी व समाजवादी पार्टी के नेता दिख रहे हैं।
फारवर्ड ब्लाक के राष्ट्रीय महासचिव देवव्रत विश्वास ने तो पिछले दिनों वाममोर्चा में नेतृत्व परिवर्तन की मांग तक उठा डाली थी। यहीं नहीं, बीते दिनों संपन्न हुए महाजाति सदन में पार्टी के ७२वें स्थापना दिवस के मौके पर वक्तव्य रखते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर एक वृहद वाममोर्चा गठन का प्रस्ताव दिया था। साथ ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से मोर्चा के नेतृत्व के मुद्दे पर माकपा की योग्यता को कटघरे में खड़ा किया था। वहीं, पार्टी के प्रदेश सचिव अशोक घोष ने भी अपने भाषण में नैनो परियोजना के लिए टाटा को हुगली जिले के सिंगुर में दी गई जमीन की प्रक्रिया पर सवाल उठाया था।
कहना गलत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल में लगातार सात बार सत्ता में रहे वाममोर्चा में सत्ता से बाहर होते ही सात सप्ताह भी एकता कायम नहीं रह सकी। राजनीतिक हल्कों में यह भी चर्चा है कि माकपा में बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु और पार्टी के महासचिव प्रकाश करात पार्टी के दिग्गज व दिवंगत नेता ज्योति बसु, अनिल विश्वास और हरकिशन सिंह सुरजीत का सटीक व सही विकल्प नहीं बन सके। ज्योति बसु ने २१ जून १९७७ को पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के शासन में आने पर मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला था और कुशलतापूर्वक वे वर्ष २००० तक यानी लगातार २३ सालों कर इस जिम्मेवारी को निभाते रहे। सन २००० में शारीरिक अस्वस्थता की वजह से उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी बुद्धदेव भट्टाचार्य को सौंप दी थी।
बुद्धदेव भट्टाचार्य दिवंगत ज्योति बसु के सही उत्तराधिकारी नहीं बन पाए। इसी तरह माकपा के दिवंगत नेता व पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रदेश इकाई के सचिव अनिल विश्वास के निधन के बाद वाममोर्चा के अध्यक्ष विमान बसु ने पार्टी प्रदेश सचिव का पद संभाला था, लेकिन लगातार पिछले कई चुनावों में हार के बाद अब विमान बसु की काबिलियत पर भी सवाल उठने लगे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो विमान बसु भी बुद्धदेव भट्टाचार्य की तरह अनिल विश्वास के सटीक उत्तराधिकारी बनने में विफल रहे।
माकपा के महासचिव प्रकाश करात पर तो इन दिनों पार्टी के भीतर और बाहर लगातार आक्रमण हो रहा है। प्रकाश करात वर्ष २००५ में हुए माकपा के राष्ट्रीय अधिवेशन (पार्टी कांग्रेस) के बाद पार्टी के महासचिव के पद पर आसीन हुए थे। पार्टी के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने भी शरीरिक दुर्बलता का हवाला देते हुए यह पद छोड़ दिया था और तब प्रकाश करात पार्टी के महासचिव चुने गए थे। तब से लेकर अपवाद स्वरूप वर्ष २००६ के छोड़कर पश्चिम बंगाल में छोटे-बड़े जितने भी चुनाव हुए उनमें वाममोर्चा और विशेषकर माकपा को मुंह की खानी पड़ी। चाहे २००८ का पंचायत चुनाव हो या फिर २००९ का लोकसभा चुनाव और २०१० का नगर निगम व नगरपालिका चुनाव।
इन सभी चुनावों में वाममोर्चा व माकपा शिकस्त खाती रही। २०११ के विधानसभा चुनाव में तो मानो वाममोर्चा का सूपड़ा ही साफ हो गया। राज्य की २९४ सीटों में से वाममोर्चा को मात्र ६२ सीटों पर ही कामयाबी मिली। इस वजह से माकपा की बंगाल इकाई में पार्टी महासचिव प्रकाश करात के खिलाफ विरोधी स्वर उभरने लगे। पार्टी के बंगाल इकाई के नेता मानते हैं कि प्रकाश करात द्वारा लिए गए कुछ गलत फैसलों की वजह से माकपा का इतना बुरा हाल हुआ है। इनमें २००८ में केंद्र में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से परमाणु करार के मुद्दे पर वाममोर्चा का समर्थन वापस लेने का फैसला प्रमुख है।
बारिकी तौर पर देखा जाए तो मोर्चा की विफलता में यदि प्रकाश करात की नीतियां दोषी हैं, तो माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई की एक के बाद एक गलतियां भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। सिंगुर व नंदीग्राम आंदोलन ने पश्चिम बंगाल वाममोर्चा की न केवल नींव हिला दी, बल्कि इसके मजबूत किले को भी ध्वस्त कर दिया। इन सब की वजह रही बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु, निरूपम सेन, गौतम देव जैसे माकपा नेताओं की वे नीतियां, जिसने इस राज्य में ३४ साल के वाम शासन को सत्ता से उखाड़ फेंका।
वर्ष २००६ में राज्य की २९४ विधानसभा की सीटों में से २३५ पर जीत हासिल करने वाले वाममोर्चा को २०११ के विधानसभा चुनाव में महज ६२ सीटों से संतोष करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस-एसयूसीआई गठबंधन ने इस चुनाव में वाममोर्चा का विजय रथ रोक दिया।
वैसे माकपा ने कहा है कि आगामी दिनों में इस अप्रत्याशिक हार की समीक्षा की जाएगी। साथ ही यह भी कहा है कि वाममोर्चा राज्य में एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएगा, लेकिन हार के बाद पार्टी कैडरों और कार्यकर्ताओं का मनोबल एकदम से टूट गया है। वे अब बुद्धदेव भट्टाचार्य, विमान बसु व गौतम देव जैसे नेताओं को इस हार का जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। उनका सबसे ज्यादा गुस्सा पार्टी के महासचिव प्रकाश करात पर है।
इधर, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य इन दिनों खुद को पार्टी कार्यालय अलीमुद्दीन स्ट्रीट व अपने आवास तक सीमित कर लिया है। यहां तक कि माकपा पोलित ब्यूरो का सदस्य होने के बावजूद उन्होंने पिछले दिनों हुई पोलित ब्यूरो की बैठक और केंद्रीय कमिटी की बैठकों में हिस्सा नहीं लिया। वैसे बुद्धदेव बीते कुछ सालों से लगातार माकपा पोलित ब्यूरो की बैठक में गैरहाजिर होते रहे हैं। हाल में विधानसभा चुनाव में घोर व अपमानजनक पराजय के बाद तो उन्होंने पोलित ब्यूरो व पार्टी की केंद्रीय कमिटी से हटने की इच्छा जताई थी। हालांकि बाद में पार्टी ने उन्हें (बुद्धदेव को) मना लिया और वे फिलहाल पार्टी के दोनों संगठनों से जुड़े हैं।
पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की इस दुर्गति के लिए माकपा के नेता व राज्य के पूर्व आवास मंत्री गौतम देव भी बड़े जिम्मेवार हैं। २०११ के विधानसभा चुनाव के दौरान विरोधी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ गौतम देव का बड़बोलापन कुछ इस कदर बढ़ा कि इसने चुनाव में पार्टी की पूरी फजीहत ही करा दी। इसी तरह राज्य के पूर्व भूमि व भूमि सुधार मंत्री व इस बार के चुनाव में माकपा के चंद जीतने वाले नेताओं में शुमार अब्दुर रज्जाक मोल्ला का बगावती सुर भी कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बीच-बीच में मोल्ला ऐसा बयान जारी कर देते हैं कि माकपा नेतृत्व को उनको समझाने-बुझाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
इसी तरह लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का मुद्दा भी रह-रहकर पार्टी के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। वैसे सोमनाथ चटर्जी ने विधानसभा चुनाव में गौतम देव समेत कई माकपा उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था, लेकिन चुनाव बाद की परिस्थितियों में उनके देवर भी बदल गए। १३ मई को विधानसभा चुनाव के नतीजा आने व राज्य की मुख्यमंत्री का दायित्व संभालने के बाद ममता बनर्जी ने सोमनाथ चटर्जी के साथ मुलाकात की थी। हालांकि ममता ने इस मुलाकात को सौजन्यपूर्ण मुलाकात कहा था, लेकिन इससे माकपा नेताओं की स्थिति बगलें झांकने जैसी हो गई थी।
याद रहे कि वर्ष २००८ में पार्टी के निर्देश का उल्लंघन करने के आरोप में माकपा महासचिव प्रकाश करात ने सोमनाथ चटर्जी को पार्टी से निकाल दिया था। बावजूद चटर्जी खुद को वामपंथी बताते रहे और विधानसभा चुनाव में उन्होंने माकपा के पक्ष में प्रचार भी किया।
इधर विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद से पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में अवैध हथियारों की बरामदगी भी माकपा की परेशानी का कारण बनी हुई है। क्योंकि से सारे अवैध हथियार माकपा के स्थानीय कार्यालयों या पार्टी नेताओं के घर के आसपास मिल रहे हैं। हालांकि माकपा इसके पीछे तृणमूल कांग्रेस व राज्य पुलिस की मिली-भगत को वजह बता रही है और इसे वह पार्टी के खिलाफ साजिश करार दे रही है। यही नहीं राज्य में राजनीतिक हिंसा के पीछे भी माकपा खुद को पाक साफ बताते हुए इसे तृणमूल की साजिश बताने में लगी है, लेकिन पार्टी की यह सारी कवायद लगभग विफल साबित हो रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वाममोर्चा गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है और बिखराव के सम्मुख पहुंच गया है।
लोकपाल के दायरे में होना चाहिए प्रधानमंत्री को - उमा भारती
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद और हाल ही में दोबारा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुईं तेज-तर्रार नेत्री उमा भारती का मानना है कि प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए। हालांकि उनका यह भी मानना है कि इसका प्रारूप क्या हो यह चर्चा का विषय है। बीते दिनों समग्र गंगा नामक कार्यक्रम में शिरकत करने महानगर कोलकाता आईं उमा भारती ने कहा कि भाजपा अण्णा हजारे व बाबा रामदेव द्वारा उठाए गए देश हित के मुद्दों के साथ है। अपने काफी व्यस्त कार्यक्रम के बीच भी उमा भारती ने शंकर जालान से बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश...
०० उमाजी, सीधे सवाल पर आते हैं लगभग छह साल बाद आपकी भारतीय जनता पार्टी
(भाजपा) में वापसी हुई है आप कैसा महसूस कर रही हैं ?
--आप कुछ ज्यादा बोल गए। मैं छह साल नहीं साढ़े पांच साल भाजपा से अलग रही। फिर से भाजपा में लौटे अभी पांच सप्ताह हुआ है, इसीलिए कैसा महसूस कर रही हूं फिलहाल कहना मुश्किल है।
०० आपके भाजपा में लौटने की चर्चा तो कई बार हुई, लेकिन बीते महीने अचानक इसकी घोषणा कर दी गई। क्या ऐसा करने की कोई विशेष वजह थी?
--इस बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम है। इतना जरूर कह सकती हूं कि पार्टी नितिन गडकरीजी और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणीजी पिछले एक-डेढ़ साल से मुझे पार्टी में आने के लिए कह रहे थे, लेकिन बीते महीने अचानक यह घटनाक्रम क्यों हुआ, इस बाबत में कुछ नहीं कह सकती।
०० सुना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के भाजपा समर्थकों की मांग पर आपकी घर वापसी हुई है?
-- बीते ६६ महीने के दौरान मैं देशभर में जहां भी गई। भाजपा के कार्यकर्ता मुझसे मिलते थे और पार्टी में वापस लौटने का आमंत्रण देते थे। बीते साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर में जब द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा पर गई थी तो वहां मंदिरों में जो भी श्रद्धालुओं
मिलते थे, सभी कहते थे कि वे भाजपा में लौट आएं। इसलिए मैं मानती हूं कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अन्य राज्यों के भाजपा समर्थक भी यहीं चाहते थे कि मैं दोबारा भाजपा में शामिल हो जाऊं।
०० क्या आप इसे घर वापसी मानती हैं?
-- हां, बिल्कुल मानती हूं। इसके साथ ही विश्वास से यह भी कह सकती हूं कि मेरे भाजपा में फिर से शामिल होने से पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ-साथ कार्यकत्ता भी बेहद खुश होंगे।
०० लोकपाल बिल पर आपकी क्या राय है?
-- लोकपाल बिल से मैं पूरी तरह समहत हूं। देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल विधेयक जरूर बनना चाहिए।
०० क्या प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में होना चाहिए?
--जी हां, जरूर होना चाहिए, लेकिन इसका प्रारूप क्या हो यह चर्चा का विषय हो सकता है।
००बीते दिनों रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव व उनके भक्तों के साथ जो हुआ उस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
--जो हुआ, बेहद गलत हुआ। उस दिन की घटना ने जलियावाला बाग की याद दिला दी।
०० पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन गडकरी ने मुख्य रुप से आपको क्या जिम्मेवारी दी है?
-- मैं गंगा से जुड़े मुद्दे को लेकर पहले से सक्रिय थी और भाजपा में भी गंगा सेल है तो मुझे उसका काम सौंपा गया है। गड़करी जी ने राजनाथ सिंह की जगह पर अब मुझे गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की जिम्मेदारी सौंपी है।
००अगले साल यानी 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना है। क्या आपने समाजवादी पार्टी (सपा) व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को टक्कर देने के लिए कोई विशेष रणनीति बनाई है?
-- उत्तर प्रदेश की जनता मायावती से तंग आ चुकी है और मुलायम सिंह यादव के जनविरोधी कार्यों को प्रदेश की जनता अभी तक भूला नहीं पाई है। इसलिए मेरा मानना है कि चुनाव के मद्देनजर भाजपा या मुझे कोई विशेष रणनीति बनाने की जरूर नहीं है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की पहली पसंद भाजपा ही होगी।
००क्या ऐसा माना जाए कि आपकी घर वापसी से भाजपा को उत्तर प्रदेश के लिए तेज-तर्रार और स्वाभाविक नेता मिल गया है?
--मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानूंगी। हां, मैं यह जरूर मानती हूं कि मेरे आने से उत्तर प्रदेश के भाजपा समर्थक काफी खुश हैं। मैं पार्टी से चली गई थी तो इसका उन्हें दुख था। ऐसा बिलकुल नहीं है कि उत्तर प्रदेश में कोई नया नेता आ गया है। यहां नेताओं का अभाव नहीं है।
००कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह, बसपा की ओर से मायावती और सपा की ओर से मुलायम की चुनौतियों का कैसे सामना करेंगी?
--मुझे कुछ नहीं करना है, जो करेगी जनता करेगी। मैं अपने आप को पार्टी की कार्यकर्ता मानती हूं और इससे उलट यह मानती हूं कि हमारा राष्ट्रीय दायित्व है कि हम उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति को सुधारें, क्योंकि उत्तरप्रदेश से ही भारत की राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हुई हैं। हमें केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में फैली राजनीति विकृतियों को समाप्त करना है।
०० कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की पदयात्रा से कांग्रेस को लाभ होगा?
--कोई फायदा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में बीते 22 सालों से कांग्रेस सत्ता से दूर हैं। अभी 22 साल और दूर रहंगी।
००उत्तर प्रदेश में मुख्य चुनावी मुद्दे क्या होंगे?
--राम और रोटी के मुद्दे पर हम चुनावी मैदान में जाएंगे। राम-मंदिर से राम-राज्य की ओर यही हमारा मुख्य नारा होगा।
०० भाजपा से अलग होकर आपने नई पार्टी बनाई और छह साल तक भाजपा से दूर रहीं। उन छह सालों का अनुभव कैसा रहा?
--मैं भाजपा से अलग हुई थी। भाजपा की विचारधारा और नीतियों से नहीं। नई पार्टी के बैनर तले में मैंने साढ़े पांच सालों के दौरान वहीं किया जो भाजपा में रहते हुए करती। इस दौरान ऐसा कोई उल्लेखनीय अनुभव नहीं रहा, जो जिक्र या याद रखने लायक हो।
००इस दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही समान दूरी से देखा होगा, दोनों पार्टियों में आपको क्या बदलाव नजर आया?
--जब हम राजनीतिक समीक्षा कर रहे होते हैं तो कुछ चीजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि हमें अपने दल के बारे में कुछ कहना है तो हम दल के अंदर ही कहेंगे। मुझे ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं बाहर बोलने नहीं जाती थी। पार्टी के अंदर ही बैठकर बात होती थी। इसलिए जब मैं भाजपा की समीक्षा करूंगी तो पार्टी के अंदर बैठकर ही करूंगी। बाहर आप जैसे पत्रकारों के सामने तो कतई ही नहीं करूंगी। हां, जहां तक पूरी राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा का सवाल है तो मैं यह कह सकती हूं कि अभी एक समय आया है, जिसमें अचानक विचारधाराओं की अतिवादिता खत्म हुई है। जब देवगौड़ा की सरकार बनी तो उस समय वामपंथियों ने अपने आग्रह छोड़े। अपनी विचारनिष्ठाओं से कहीं न कहीं समझौता किया। फिर हमारी सरकार बनी, पर 2004 में हम नहीं जीत पाए। फिर मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो उसे बचाने का प्रयास हुआ। इस प्रयास में जो स्थितियां बनीं, उन सब को मिलाकर एक बात कह सकती हूं कि राजनीति में विचारनिष्ठा के पुनर्जागरण का युग आया है। फिर से उसको पुनर्स्थापित करना है।
००मिशन गंगा पर कुछ बताएं?
--गंगा को स्वच्छ रखना देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और उनके इस अभियान को हिंदुत्व के मसले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। गंगा को प्रदूषित करने में बिजली व खनिज माफियाओं की बहुत बड़ी भूमिका है। अगर गंगा की रक्षा करनी है तो केंद्र सरकार को जल्द एक कानून बनाने की जरूरत है। इसको लेकर मैं जल्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलेंगी। इसके अलावा अक्टूबर में दिल्ली में गंगा सम्मेलन का भी आयोजन करेंगी ,जिसमें देश-विदेश से सैकड़ों वैज्ञानिक व प्रोफेसर भाग लेंगे। साथ ही गंगा बचाओ अभियान के तहत नवंबर में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक मानव बंधन का आयोजन किया जाएगा?
००सुना है मिशन पूरा नहीं होने तक आप अन्न ग्रहण नहीं करेंगी?
--सही सुना है आप ने। जब तक इस काम में कामयाब नहीं हो जाती, अन्न नहीं खाऊंगी। एक बात और बता देती हूं मालपुआ मुझे बहुत पसंद है। अब मालपुआ तभी खाऊंगी, जबिक गंगा के पानी पीने लायक हो जाएगा।
०० इस बार कई लोगों को 15 अगस्त तो नेताओं को 16 अगस्त का इंतजार है। क्योंकि 16 अगस्त से अण्णा हजारे ने अनशन का एलान किया है। आपको क्या लगता है कि हजारे का अनशन पर बैठना जायज है?
-- अगस्त हम देश को अंग्रेजों के हाथों ने मुक्त कराने के लिए मनाते हैं और इस बार का 16 अगस्त देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की मुहिम के लिए याद किया जाएगा। मेरा मानना है कि केंद्र सरकार के 16 अगस्त से पहले ही अण्णा हजारे की बात मान लेनी चाहिए, ताकि अनशन पर बैठने की नौबत ही न आए।
००आप पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं और अभी हाल ही में बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ, बंगाल की नई मुख्यमंत्री और कभी राजग के साथ रही ममता बनर्जी के बारे में आपकी क्या राय है?
--तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की यह खासियत रही है कि वे जिनके सहारे से आगे बढ़ती हैं उन्हें ही नीचे गिरा देती हैं। मैं विश्वास के साथ कह सकती हूं कि राज्य की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कांग्रेस का विनाश कर देंगी। इतिहास गवाह है ममता ने जिसका भी हाथ थामा है, केन्द्र की सत्ता से उसका सफाया हो गया है। जब वह राजग में शामिल थीं तो केन्द्र की सत्ता से भाजपा को भी हाथ धोना पड़ा था। उसी तरह अब कांग्रेस का भी पतन हो जाएगा।
०० उमाजी, सीधे सवाल पर आते हैं लगभग छह साल बाद आपकी भारतीय जनता पार्टी
(भाजपा) में वापसी हुई है आप कैसा महसूस कर रही हैं ?
--आप कुछ ज्यादा बोल गए। मैं छह साल नहीं साढ़े पांच साल भाजपा से अलग रही। फिर से भाजपा में लौटे अभी पांच सप्ताह हुआ है, इसीलिए कैसा महसूस कर रही हूं फिलहाल कहना मुश्किल है।
०० आपके भाजपा में लौटने की चर्चा तो कई बार हुई, लेकिन बीते महीने अचानक इसकी घोषणा कर दी गई। क्या ऐसा करने की कोई विशेष वजह थी?
--इस बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम है। इतना जरूर कह सकती हूं कि पार्टी नितिन गडकरीजी और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणीजी पिछले एक-डेढ़ साल से मुझे पार्टी में आने के लिए कह रहे थे, लेकिन बीते महीने अचानक यह घटनाक्रम क्यों हुआ, इस बाबत में कुछ नहीं कह सकती।
०० सुना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के भाजपा समर्थकों की मांग पर आपकी घर वापसी हुई है?
-- बीते ६६ महीने के दौरान मैं देशभर में जहां भी गई। भाजपा के कार्यकर्ता मुझसे मिलते थे और पार्टी में वापस लौटने का आमंत्रण देते थे। बीते साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर में जब द्वादश ज्योतिर्लिंग की यात्रा पर गई थी तो वहां मंदिरों में जो भी श्रद्धालुओं
मिलते थे, सभी कहते थे कि वे भाजपा में लौट आएं। इसलिए मैं मानती हूं कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के अन्य राज्यों के भाजपा समर्थक भी यहीं चाहते थे कि मैं दोबारा भाजपा में शामिल हो जाऊं।
०० क्या आप इसे घर वापसी मानती हैं?
-- हां, बिल्कुल मानती हूं। इसके साथ ही विश्वास से यह भी कह सकती हूं कि मेरे भाजपा में फिर से शामिल होने से पार्टी के शीर्ष नेताओं के साथ-साथ कार्यकत्ता भी बेहद खुश होंगे।
०० लोकपाल बिल पर आपकी क्या राय है?
-- लोकपाल बिल से मैं पूरी तरह समहत हूं। देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल विधेयक जरूर बनना चाहिए।
०० क्या प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में होना चाहिए?
--जी हां, जरूर होना चाहिए, लेकिन इसका प्रारूप क्या हो यह चर्चा का विषय हो सकता है।
००बीते दिनों रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव व उनके भक्तों के साथ जो हुआ उस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
--जो हुआ, बेहद गलत हुआ। उस दिन की घटना ने जलियावाला बाग की याद दिला दी।
०० पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन गडकरी ने मुख्य रुप से आपको क्या जिम्मेवारी दी है?
-- मैं गंगा से जुड़े मुद्दे को लेकर पहले से सक्रिय थी और भाजपा में भी गंगा सेल है तो मुझे उसका काम सौंपा गया है। गड़करी जी ने राजनाथ सिंह की जगह पर अब मुझे गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की जिम्मेदारी सौंपी है।
००अगले साल यानी 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव होना है। क्या आपने समाजवादी पार्टी (सपा) व बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को टक्कर देने के लिए कोई विशेष रणनीति बनाई है?
-- उत्तर प्रदेश की जनता मायावती से तंग आ चुकी है और मुलायम सिंह यादव के जनविरोधी कार्यों को प्रदेश की जनता अभी तक भूला नहीं पाई है। इसलिए मेरा मानना है कि चुनाव के मद्देनजर भाजपा या मुझे कोई विशेष रणनीति बनाने की जरूर नहीं है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की पहली पसंद भाजपा ही होगी।
००क्या ऐसा माना जाए कि आपकी घर वापसी से भाजपा को उत्तर प्रदेश के लिए तेज-तर्रार और स्वाभाविक नेता मिल गया है?
--मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं मानूंगी। हां, मैं यह जरूर मानती हूं कि मेरे आने से उत्तर प्रदेश के भाजपा समर्थक काफी खुश हैं। मैं पार्टी से चली गई थी तो इसका उन्हें दुख था। ऐसा बिलकुल नहीं है कि उत्तर प्रदेश में कोई नया नेता आ गया है। यहां नेताओं का अभाव नहीं है।
००कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह, बसपा की ओर से मायावती और सपा की ओर से मुलायम की चुनौतियों का कैसे सामना करेंगी?
--मुझे कुछ नहीं करना है, जो करेगी जनता करेगी। मैं अपने आप को पार्टी की कार्यकर्ता मानती हूं और इससे उलट यह मानती हूं कि हमारा राष्ट्रीय दायित्व है कि हम उत्तर प्रदेश में पार्टी की स्थिति को सुधारें, क्योंकि उत्तरप्रदेश से ही भारत की राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हुई हैं। हमें केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में फैली राजनीति विकृतियों को समाप्त करना है।
०० कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की पदयात्रा से कांग्रेस को लाभ होगा?
--कोई फायदा नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में बीते 22 सालों से कांग्रेस सत्ता से दूर हैं। अभी 22 साल और दूर रहंगी।
००उत्तर प्रदेश में मुख्य चुनावी मुद्दे क्या होंगे?
--राम और रोटी के मुद्दे पर हम चुनावी मैदान में जाएंगे। राम-मंदिर से राम-राज्य की ओर यही हमारा मुख्य नारा होगा।
०० भाजपा से अलग होकर आपने नई पार्टी बनाई और छह साल तक भाजपा से दूर रहीं। उन छह सालों का अनुभव कैसा रहा?
--मैं भाजपा से अलग हुई थी। भाजपा की विचारधारा और नीतियों से नहीं। नई पार्टी के बैनर तले में मैंने साढ़े पांच सालों के दौरान वहीं किया जो भाजपा में रहते हुए करती। इस दौरान ऐसा कोई उल्लेखनीय अनुभव नहीं रहा, जो जिक्र या याद रखने लायक हो।
००इस दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही समान दूरी से देखा होगा, दोनों पार्टियों में आपको क्या बदलाव नजर आया?
--जब हम राजनीतिक समीक्षा कर रहे होते हैं तो कुछ चीजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि हमें अपने दल के बारे में कुछ कहना है तो हम दल के अंदर ही कहेंगे। मुझे ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं बाहर बोलने नहीं जाती थी। पार्टी के अंदर ही बैठकर बात होती थी। इसलिए जब मैं भाजपा की समीक्षा करूंगी तो पार्टी के अंदर बैठकर ही करूंगी। बाहर आप जैसे पत्रकारों के सामने तो कतई ही नहीं करूंगी। हां, जहां तक पूरी राजनीतिक व्यवस्था की समीक्षा का सवाल है तो मैं यह कह सकती हूं कि अभी एक समय आया है, जिसमें अचानक विचारधाराओं की अतिवादिता खत्म हुई है। जब देवगौड़ा की सरकार बनी तो उस समय वामपंथियों ने अपने आग्रह छोड़े। अपनी विचारनिष्ठाओं से कहीं न कहीं समझौता किया। फिर हमारी सरकार बनी, पर 2004 में हम नहीं जीत पाए। फिर मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो उसे बचाने का प्रयास हुआ। इस प्रयास में जो स्थितियां बनीं, उन सब को मिलाकर एक बात कह सकती हूं कि राजनीति में विचारनिष्ठा के पुनर्जागरण का युग आया है। फिर से उसको पुनर्स्थापित करना है।
००मिशन गंगा पर कुछ बताएं?
--गंगा को स्वच्छ रखना देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और उनके इस अभियान को हिंदुत्व के मसले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। गंगा को प्रदूषित करने में बिजली व खनिज माफियाओं की बहुत बड़ी भूमिका है। अगर गंगा की रक्षा करनी है तो केंद्र सरकार को जल्द एक कानून बनाने की जरूरत है। इसको लेकर मैं जल्द प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलेंगी। इसके अलावा अक्टूबर में दिल्ली में गंगा सम्मेलन का भी आयोजन करेंगी ,जिसमें देश-विदेश से सैकड़ों वैज्ञानिक व प्रोफेसर भाग लेंगे। साथ ही गंगा बचाओ अभियान के तहत नवंबर में गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक मानव बंधन का आयोजन किया जाएगा?
००सुना है मिशन पूरा नहीं होने तक आप अन्न ग्रहण नहीं करेंगी?
--सही सुना है आप ने। जब तक इस काम में कामयाब नहीं हो जाती, अन्न नहीं खाऊंगी। एक बात और बता देती हूं मालपुआ मुझे बहुत पसंद है। अब मालपुआ तभी खाऊंगी, जबिक गंगा के पानी पीने लायक हो जाएगा।
०० इस बार कई लोगों को 15 अगस्त तो नेताओं को 16 अगस्त का इंतजार है। क्योंकि 16 अगस्त से अण्णा हजारे ने अनशन का एलान किया है। आपको क्या लगता है कि हजारे का अनशन पर बैठना जायज है?
-- अगस्त हम देश को अंग्रेजों के हाथों ने मुक्त कराने के लिए मनाते हैं और इस बार का 16 अगस्त देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की मुहिम के लिए याद किया जाएगा। मेरा मानना है कि केंद्र सरकार के 16 अगस्त से पहले ही अण्णा हजारे की बात मान लेनी चाहिए, ताकि अनशन पर बैठने की नौबत ही न आए।
००आप पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं और अभी हाल ही में बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ, बंगाल की नई मुख्यमंत्री और कभी राजग के साथ रही ममता बनर्जी के बारे में आपकी क्या राय है?
--तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की यह खासियत रही है कि वे जिनके सहारे से आगे बढ़ती हैं उन्हें ही नीचे गिरा देती हैं। मैं विश्वास के साथ कह सकती हूं कि राज्य की नई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कांग्रेस का विनाश कर देंगी। इतिहास गवाह है ममता ने जिसका भी हाथ थामा है, केन्द्र की सत्ता से उसका सफाया हो गया है। जब वह राजग में शामिल थीं तो केन्द्र की सत्ता से भाजपा को भी हाथ धोना पड़ा था। उसी तरह अब कांग्रेस का भी पतन हो जाएगा।
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