Sunday, June 14, 2009
हाईस्कूलों की चौखट से मायूस लौट रहे विद्यार्थी
बढ़ती विद्यार्थियों की संख्या व स्कूलों में सीमित सीटों के चलते प्रतिवर्ष डुवार्स के हजारों छात्र-छात्राओं को बीच में ही पढ़ाई छोड़ना पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष दस हजार छात्र शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। नामांकन के लिए विद्यार्थी व अभिभावकों को उच्च विद्यालय का चक्कर काटना पड़ता है फिर भी निश्चितता नहीं। यह स्थिति है उदलाबाड़ी हाईस्कूल, मालबाजार हाईस्कूल, नागरकाटा हाईस्कूल, बानारहाट हाईस्कूल, भती पाठशाला न्यु-डुवार्स, महावीर हाईस्कूल वीरपाड़ा का। इन स्कूलों के साथ-साथ जुनियर हाईस्कूलों की स्थिति भी यही है। दिन व दिन बढ़ती छात्रों की संख्या व स्कूलों में सीमित सीटों के चलते बच्चों को जुनियर हाईस्कूल व उच्च विद्यालय में प्रवेश के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें मायूस होकर लौटना पड़ता है। गौरतलब है कि बानारहाट थाने के अंतर्गत बिन्नागुड़ी जूनियर हाईस्कूल में पिछले वर्ष 2008 में बिन्नागुड़ी जुनियर हाईस्कूल के छात्रों का नामांकन बानारहाट आदर्श विद्या मंदिर में हुई और वहां छात्रों को बैठने का स्थान न मिलने पर इन्हें बिन्नागुड़ी जुनियर हाईस्कूल में पढ़ाई करनी पड़ी पर इसबार बानारहाट आदर्श विद्या मंदिर हाईस्कूल एवं बालका परिमल हिन्दी हाईस्कूल में सीटे खाली ही नहीं है जिससे इसबार बाहरी स्कूलों के छात्रों का नामांकन करना मुश्किल है। ज्ञात हो कि विद्यालय में तीन-तीन सेक्शन होने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है। वहीं बानारहाट बालका परिमल हिन्दी हाईस्कूल के प्रधानाध्यापक चंद्रशेखर प्रसाद ने बताया कि यदि बानारहाट में हिन्दी गर्ल्स हाईस्कूल बन जाने पर बानारहाट स्थित आदर्श विद्या मंदिर हाईस्कूल व बालका परिमल हाईस्कूल पर विद्यार्थियों का बोझ कम हो जायेगा। दूसरी तरफ डुवार्स इलाके में चाय बागानों में केवल प्राथमिक विद्यालय ही है। पंचायरत स्तर पर केवल एक ही जुनियर हाईस्कूल है, कहीं कहीं तो वो भी नहीं है। इस वजह से चाय बागानों में रहने ावाले बच्चों के लिए उच्च शिक्षा मिलना मुश्किल हो रहा है। दैनिक मजदूरी करने वाले लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के भलिए दर-दर की ठोकरें खा रहे है। कहां अपनी गरीबी से जूझते ये लोग अपने बच्चों को शिक्षा देकर बेहतर भविष्य का सापना देख रहे हैं वहीं इनके बच्चों को सरकार की ओर से मदद न मिलने से पढ़ाई छोड़ना पड़ रहा है।(साभार)
Thursday, June 4, 2009
मेट्रो शहरों पर फिर फिदा हो रहे रिटेलर
व्यावसायिक परिसरों के किराए में गिरावट को देखते हुए रिटेल कंपनियां-आदित्य बिडला रिटेल, रिलायंस रिटेल और शॉपर्स स्टॉप के अलावा, फूड चेन कंपनियां मेट्रो और मिनी मेट्रो में विस्तार की योजना बना रही है।
रिटेलरों और सलाहकार संस्थाओं का कहना है कि पिछले 6 माह के दौरान रिटेल किराए में करीब 40 फीसदी की कमी आई है। इससे रिटेल कंपनियों को विस्तार योजनाएं पूरा करने में आसानी होगी।
किराए में इजाफा होने से जहां रिटेल कंपनियां मेट्रो को छोड़कर मैसूर, इंदौर, विजयवाड़ा आदि शहरों का रुख कर रही थीं, वह अब दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में आक्रामक विस्तार की योजना बना रही है।
आदित्य बिड़ला रिटेल चालू वित्त वर्ष में 60 सुपरमार्केट और वर्ष 2011 तक 12 हाइपरमार्केट खोलने की योजना बना है। कंपनी इसके लिए दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई में जगह तलाश रही है। आदित्य बिड़ला रिटेल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 25 रुपये प्रति वर्गफीट मासिक किराया होने पर ही हमें फायदा हो सकता है, लेकिन दो साल से मेट्रो में किराया इतना ज्यादा बढ़ गया था कि रिटेल कंपनियों को बहुत फायदा नहीं हो रहा था।
हालांकि बदले हालात में सभी मॉल मालिक अपने मॉल में हाइपमार्केट खोलना चाहते हैं, जिसके लिए वे मार्केट रेट से भी कम किराया लेने को राजी हैं। उन्होंने बताया कि कंपनी वित्त्त वर्ष 2011 में फिर 2 टीयर शहरों का रुख करेगी। मुकेश अंबानी की रिलायंस रिटेल भी मेट्रो शहरों में रिलायंस फ्रेश और रिलायंस मार्ट खोलने की तैयारी कर रही है।
स्पेंसर रिटेल बेंगलुरु में दो हाइपरमार्केट, जबकि चेन्नई और कोलकाता में एक-एक हाइपरमार्केट खोलने की तैयारी कर रही है। कंपनी पुणे और हैदराबाद में भी दो हाइपरमार्केट खोलने की योजना बना रही है। स्पेंसर के उपाध्यक्ष, मार्केटिंग समर शेखावत का कहना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार आने से हमारे स्टोरों की मांग में इजाफा हो रहा है। कंपनी प्रतिमाह विकास कर रही है।
रहेजा ग्रुप का शॉपर्स स्टॉप भी बेंगलुरु, अहमादाबाद और हैदराबाद में चार स्टोर खोलने की तैयारी कर रही है। कंपनी का कहना है कि रेंटल में आई गिरावट से कंपनी के स्टोर को खोलने में सुविधा होगी। फूड चेन मैकडॉनल्ड भी चालू वित्त वर्ष में 40 नए आउटलेट खोलने की तैयारी कर रही है, जिन पर करीब 120 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।(साभार)
रिटेलरों और सलाहकार संस्थाओं का कहना है कि पिछले 6 माह के दौरान रिटेल किराए में करीब 40 फीसदी की कमी आई है। इससे रिटेल कंपनियों को विस्तार योजनाएं पूरा करने में आसानी होगी।
किराए में इजाफा होने से जहां रिटेल कंपनियां मेट्रो को छोड़कर मैसूर, इंदौर, विजयवाड़ा आदि शहरों का रुख कर रही थीं, वह अब दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता में आक्रामक विस्तार की योजना बना रही है।
आदित्य बिड़ला रिटेल चालू वित्त वर्ष में 60 सुपरमार्केट और वर्ष 2011 तक 12 हाइपरमार्केट खोलने की योजना बना है। कंपनी इसके लिए दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई में जगह तलाश रही है। आदित्य बिड़ला रिटेल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 25 रुपये प्रति वर्गफीट मासिक किराया होने पर ही हमें फायदा हो सकता है, लेकिन दो साल से मेट्रो में किराया इतना ज्यादा बढ़ गया था कि रिटेल कंपनियों को बहुत फायदा नहीं हो रहा था।
हालांकि बदले हालात में सभी मॉल मालिक अपने मॉल में हाइपमार्केट खोलना चाहते हैं, जिसके लिए वे मार्केट रेट से भी कम किराया लेने को राजी हैं। उन्होंने बताया कि कंपनी वित्त्त वर्ष 2011 में फिर 2 टीयर शहरों का रुख करेगी। मुकेश अंबानी की रिलायंस रिटेल भी मेट्रो शहरों में रिलायंस फ्रेश और रिलायंस मार्ट खोलने की तैयारी कर रही है।
स्पेंसर रिटेल बेंगलुरु में दो हाइपरमार्केट, जबकि चेन्नई और कोलकाता में एक-एक हाइपरमार्केट खोलने की तैयारी कर रही है। कंपनी पुणे और हैदराबाद में भी दो हाइपरमार्केट खोलने की योजना बना रही है। स्पेंसर के उपाध्यक्ष, मार्केटिंग समर शेखावत का कहना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार आने से हमारे स्टोरों की मांग में इजाफा हो रहा है। कंपनी प्रतिमाह विकास कर रही है।
रहेजा ग्रुप का शॉपर्स स्टॉप भी बेंगलुरु, अहमादाबाद और हैदराबाद में चार स्टोर खोलने की तैयारी कर रही है। कंपनी का कहना है कि रेंटल में आई गिरावट से कंपनी के स्टोर को खोलने में सुविधा होगी। फूड चेन मैकडॉनल्ड भी चालू वित्त वर्ष में 40 नए आउटलेट खोलने की तैयारी कर रही है, जिन पर करीब 120 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा।(साभार)
भूमि अधिग्रहण मामले में पड़ सकता है उलटा दांव
कोलकाता. रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चलाया गया आंदोलन अब उनके मंत्रालय की आगामी योजनाओं पर ही भारी पड़ सकता है। बर्दवान जिले में ब्रॉड गैज रेललाइन के विस्तार के लिए हाल में एक विज्ञापन दिया गया है।
केंद्रीय रेल विभाग ने इस विस्तार के लिए राज्य के भूमि एवं भूमि सुधार विभाग को विभिन्न चरणों में 55 एकड़ भूमि अधिगृहीत करने की अनुमति दी है। लेकिन जिन जमीनों को अधिगृहीत करने का प्रस्ताव है, वे एक से अधिक फसल देने वाली उपजाऊ जमीनें हैं। जबकि ममता की मांग रही है कि केवल सूखी और एक फसल देने वाली जमीनों को ही अधिगृहीत किया जाना चाहिए।
संविधान के तहत राज्य सरकार किसी भी केंद्रीय परियोजना को लागू करवाने के लिए बाध्य है, इसलिए भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के यह विस्तृत विज्ञापन जारी करना जरूरी था। लेकिन विभाग ने भी परियोजना की पूरी जिम्मेदारी रेल विभाग डाल दी है। विज्ञापन में कहा गया, ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के तहत राज्य सरकार को केंद्र सरकार के लिए जमीन अधिगृहीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है..।’
रोचक बात यह है कि पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने सिंगूर में नैनो परियोजना के लिए इसी कानून के तहत भूमि अधिगृहीत की थी। ममता ने इस परियोजना का जमकर विरोध किया था।
विज्ञापन में विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण के लिए जबरदस्ती के बजाय लोगों की राय को तवज्जो दी जाएगी। विभाग ने अधिग्रहण के बारे में लोगों की आपत्तियां मंगाई हैं।(साभार)
केंद्रीय रेल विभाग ने इस विस्तार के लिए राज्य के भूमि एवं भूमि सुधार विभाग को विभिन्न चरणों में 55 एकड़ भूमि अधिगृहीत करने की अनुमति दी है। लेकिन जिन जमीनों को अधिगृहीत करने का प्रस्ताव है, वे एक से अधिक फसल देने वाली उपजाऊ जमीनें हैं। जबकि ममता की मांग रही है कि केवल सूखी और एक फसल देने वाली जमीनों को ही अधिगृहीत किया जाना चाहिए।
संविधान के तहत राज्य सरकार किसी भी केंद्रीय परियोजना को लागू करवाने के लिए बाध्य है, इसलिए भूमि एवं भूमि सुधार विभाग के यह विस्तृत विज्ञापन जारी करना जरूरी था। लेकिन विभाग ने भी परियोजना की पूरी जिम्मेदारी रेल विभाग डाल दी है। विज्ञापन में कहा गया, ‘भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के तहत राज्य सरकार को केंद्र सरकार के लिए जमीन अधिगृहीत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है..।’
रोचक बात यह है कि पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने सिंगूर में नैनो परियोजना के लिए इसी कानून के तहत भूमि अधिगृहीत की थी। ममता ने इस परियोजना का जमकर विरोध किया था।
विज्ञापन में विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण के लिए जबरदस्ती के बजाय लोगों की राय को तवज्जो दी जाएगी। विभाग ने अधिग्रहण के बारे में लोगों की आपत्तियां मंगाई हैं।(साभार)
कोलकाता के बच्चों की सहायता करेगा रोटरी इंटरनेशनल
कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय संगठन रोटरी इंटरनेशनल ने कोलकाता में फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की सहायता के लिए विश्व भर में श्रृंखलाबद्ध तरीके से संगीत कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है।श्रृंखला का पहला कार्यक्रम छह जून को जर्मनी की ऐतिहासिक सेंट जॉन चर्च में आयोजित किया जाएगा। यह जानकारी संतूर वादक तरुण भट्टाचार्य ने दी। वह रोटरी के संगीत कार्यक्रम में शामिल हैं।भट्टाचार्य ने कहा कि बेघर बच्चों की सहायता करने की उनकी हमेशा इच्छा रही है। उन्होंने कहा कि रोटरी संगीत दौरे का हिस्सा बनकर उन्हें खुशी है। संगीत कार्यक्रमों से मिलने वाली राशि बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था 'फोरम' को दी जाएगी।(साभार)
Wednesday, June 3, 2009
कोलकाता से ही देश भर में रेल चलाएंगी ममता
कोलकाता। नई रेलमंत्री ममता बनर्जी के लिए रेल मंत्रालय से ज्यादा अहम बंगाल की राजनीति है। इसलिए उन्होंने रेल मंत्रालय को कोलकाता से ही चलाने का फैसला कर लिया है। रेल विभाग उनकी मंशा को समझते हुए कोलकाता में एक अत्याधुनिक ऑफिस तैयार कर रहा है ताकि ममता ज्यादा से ज्यादा वक्त बंगाल को दे सकें।कोलकाता के मान्झेर हाट रेलवे स्टेशन के ठीक सामने वर्षों से उपेक्षित पड़ी जर्जर इमारत की किस्मत बदलने वाली है। सियालदह सब डिविजन के तहत आने वाली रेल विभाग की इस इमारत की तरफ कल तक कोई झांकता भी नहीं था, लेकिन अब रेलवे के तमाम आला अफसर यहां हो रहे काम की पल-पल की जानकारी ले रहे हैं। उनके लिए इससे महत्वपूर्ण काम कोई दूसरा हो भी नहीं सकता क्योंकि ममता बनर्जी यहीं बैठकर रेल की कमान संभालेंगी।हालांकि यह सबको पता है कि इतने युद्ध स्तर पर चल रहा काम ममता के ऑफिस के लिए ही है लेकिन अधिकारी कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है कि कहीं लेने के देने न पड़ जायें।पता चला है कि इस ऑफिस को तैयार होने में लगभग एक हफ्ते का वक़्त लगेगा। यहां ममता के चैम्बर के अलावा कांफ्रेंस रूम भी बनाया जा रहा है जहां से वीडियो कांफ्रेंसिंग भी हो सकेगी। ऐसे तमाम उपकरण लगाए जा रहे हैं जिससे रेलवे की सभी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। कोशिश ये है कि ममता बनर्जी कोलकाता में रहते हुए ही रेल मंत्रालय का कामकाज देख सकें। विशेष परिस्थितियों में ही उन्हें दिल्ली जाना पड़े।वैसे कभी लालू ने भी रेल को पटना से चलाने की कोशिश की थी। लेकिन वो बिहार के ऑफिस को समय नहीं दे पाए और दिल्ली से ही रेल चलाते रहे। अब बिहार से दूरी का दंड वो भुगत रहे हैं। ममता वो गलती नहीं दोहराना चाहती हैं। उन्हें पता है कि दिल्ली में उनका जलवा तभी तक है जब तक बंगाल उनके साथ है। डेढ़ साल बाद वहां चुनाव होने हैं। कहीं ऐसा न हो कि दिल्ली की हवा उनसे बंगाल की जमीन छीन ले। और ममता इस बार चूकना नहीं चाहतीं।(साभार
लोकसभा में भाई भतीजावाद की झालाक
नयी दिल्ली। लोकसभा में आज परिवारवाद की झलक देखने को मिली जब कई बेटे बेटियों और नाते रिश्तेदारों ने सदन की सदस्यता की शपथ ली। कांग्रेस और भाजपा के दो युवा गांधी राहुल और वरूण ने भी आज ही शपथ ग्रहण की।जहां विपक्षी सदस्यों की मेजों की थपथपाहट के बीच वरूण और उनकी मां मेनका गांधी ने शपथ ली वहीं सत्ता पक्ष की ओर से उससे जोरदार मेजों की थपथपाहट के बीच राहुल गांधी ने भी शपथ ली। उनकी मां सोनिया गांधी कल शपथ ले चुकी हैं। राहुल को शपथ लेते देखने बहन प्रियंका पति राबर्ट वाडेरा के साथ सदन की विशिष्ट दीर्घा में मौजूद थीं।रालोद प्रमुख अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी ने भी आज ही शपथ ली। जयंत पहली बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए हैं। वह मथुरा से चुनाव लडे थे।पिता पुत्र की कड़ी में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव ने भी शपथ ली। मुलायम मैनपुरी से तो अखिलेश कन्नौज से जीते हैं। अखिलेश फिरोजाबाद सीट पर भी चुनाव जीते थे लेकिन उन्होंने 21 मई को वहां से इस्तीफा दे दिया। मुलायम के भतीजे धर्मेन्द्र यादव ने भी शपथ ली जो बदायूं से सांसद चुने गये हैं।पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर ने सदन की सदस्यता की शपथ ली। वह अपने पिता की परंपरागत सीट बलिया से जीतकर आये हैं।अन्य जिन मंत्रियों ने आज शपथ ली उनमें प्रतीक पाटिल श्रीप्रकाश जायसवाल ,हरीश रावत और रेल मंत्री ममता बनर्जी प्रमुख रहीं। कल ममता कोलकाता में थी। क्रिकेटर से नेता बने अजहरूददीन के शपथ ग्रहण के समय उनकी पत्नी संगीता बिजलानी दर्शक दीर्घा में मौजूद थीं। सदस्यों के शपथ लेने की प्रक्रिया आज लगभग पूरी हो गयी। 543 सदस्यीय लोकसभा के 335 सदस्यों ने कल शपथ ली थी। शेष में से अधिकांश ने आज शपथ ली। जिन सदस्यों की शपथ अभी नहीं हो सकी है वे आने वाले दिनों में सदस्यता की शपथ लेंगे।वरूण आज जब शपथ ले रहे थे उनकी ताई सोनिया और चचेरी बहन प्रियंका मुस्कुराते देखी गयीं। उन्होंने सोनिया को नमस्कार भी किया जबकि उनकी मां मेनका ने सत्ता पक्ष की ओर नहीं देखा।पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की परंपरागत सीट लखनऊ से जीतकर आये लालजी टंडन का उनके पार्टी सहयोगियों ने शपथ लेते समय जबर्दस्त स्वागत किया। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत कुमार ने भी आज शपथ ली। अन्नाद्रमुक के सभी नौ सांसदों ने ईश्वर के नाम पर शपथ ली जबकि द्रमुक सांसदों ने सत्यनिष्ठा के नाम पर शपथ ली। तमिलनाडु के सभी सांसदों में हालांकि एक समानता रही कि उन्होंने तमिल में शपथ ली।भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और सपा के समर्थन से निर्दलीय चुनाव जीते कल्याण सिंह ने भी आज ही शपथ ग्रहण की।शपथ लेने वालों में कई बालीवुड, टालीवुड और कालीवुड सितारे शामिल थे। इनमें सपा की जयाप्रदा, बिहारी बाबू के नाम से मशहूर भाजपा के शत्रुघन सिन्हा, दक्षिण भारतीय फिल्मों की लेडी अमिताभ के नाम से मशहूर विजया शांति, बांग्ला फिल्मों की अभिनेत्री शताब्दी राय और अभिनेता तापस पाल तमिल फिल्म स्टार शिवकुमार प्रमुख थे।
Tuesday, June 2, 2009
नजारे कंचनजंघा के
सिक्किम प्रकृति प्रेमियों का पसंदीदा स्थान तो है ही, ट्रेकिंग के लिए रोमांच भरे अनेक क्षेत्रों के कारण ट्रेकर्स को भी विशेष रूप से आकर्षित करता है। विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी कंचनजंघा भी यहीं है जिसकी सूर्योदय की सुनहरी आभा दिल-दिमाग पर गहरी छाप छोड जाती है। जाहिर है ऐसे पर्वत के साये में साधारण से लेकर ऊंचाई वाली ट्रेकिंग के लिए अनेक क्षेत्र मौजूद है जिनमें पैदल सैलानियों के दमखम का जोरदार इम्तिहान होता है। यूं तो प्रकृति का अपना बगीचा और फूल का प्रदेश कहलाने वाले सिक्किम में अन्य साहसिक गतिविधियों के लिए चारों दिशाओं में अनेक स्थान नदियां और बर्फीले इलाके मौजूद हैं परंतु पश्चिम सिक्किम में ऊंचाई वाली ट्रेकिंग का रोमांच अलग ही है। युकसम सिक्किम की पहली राजधानी रही है, जिसकी समुद्रतल से ऊंचाई 5600 फुट है। जोगरी जेमाथांग जैसे ट्रेक और कंचनजंघा पर चढाई के लिए आधार शिविर यहीं लगाए जाते हैं जिससे पश्चिम सिक्किम के इस क्षेत्र का महत्व और बढ जाता है। कई अन्य ट्रेक भी यहां से प्रारंभ होते हैं। थोडी संजीदा ट्रेकिंग के लिए यहां से एक सरकुलर ट्रैक आयोजित किया जाता है जिसके मुख्य पडाव हैं- युकसम-सोका जोंगरी-थानजिंग- सुमिति झील (मिनी मानसरोवर) जेमाथांग-गोछा ला-थानजिंग- लामपोखरी-कस्तूरी ओराल-युकसम। कुछ समय पहले सिक्किम सरकार के पर्यटन विभाग ने नेशनल हाई एल्टीट्यूड ट्रेकिंग प्रोग्राम का आयोजन किया था जिसमें देश के अनेक भागों से आए ट्रेकिंग दलों ने भाग लिया। दिल्ली से हमारा दल जब चला तो दो दिन दार्जीलिंग में रुका जहां इंटरनेशनल हिमालयन माउंटेनियरिंग मीट आयोजित की गई थी। हम उसमें सम्मिलित हुए। सर एडमंड हिलेरी व उनकी धर्मपत्नी, उनके पर्वतारोही पुत्र पीटर हिलेरी, तेनजिंग नोर्गे, नवागं गोम्बू, उनकी बेटी रीटा गोम्बू, फू दौरजी जैसे महान पर्वतारोहियों के अतिरिक्त इटली और स्पेन के कुछ पर्वतारोहियों से यहां हमारी भेंट हुई। दार्जीलिंग से हम सिक्किम की ओर बढे। हमारी बस ने रंगित नदी को पार किया जो पश्चिमी बंगाल और सिक्किम की सीमा निर्धारित करती है। पेलिंग में हम एक रात रुके। रक्षित नामक स्थानीय मादक पेय का अधिकतर साथियों ने सेवन कर आनंद लिया। अगले दिन हम युकसम में थे। जैसा कि आम तौर पर किसी भी ऊंचाई वाले इलाके (13-14 हजार फुट से ऊपर) में जाने के लिए जरूरी होता है, अपने शरीर को यहां के मौसम के हिसाब से ढालने (एक्लीमेटाइजेशन) के लिए हमें यहां दो दिन रुकना था। सीलन और नमी भरे इस क्षेत्र में जोंकों का जबरदस्त बोलबाला है। खुली जगह से लेकर आपके बिस्तर तक में भी वे आपको मिल सकती हैं। इनसे बचने के लिए हमें जूतों में नमक डालने के लिए दिया गया। फिर भी इनके आक्रमण से शायद ही कोई अछूता बचता हो। पास ही में ऊंचे स्थान पर एक प्राचीन बौद्ध मठ (मोनेस्ट्री) है। दूसरे दिन हम वहां गए और लौटकर अगले दिन ट्रेकिंग पर जाने की तैयारी में जुट गए।सोका (10 हजार फुट) : जूतों में नमक डालकर हम अपने पहले पडाव सोका के लिए चल पडे। कुछ साथियों को जोंको ने काटने से नहीं छोडा। बुरांश (रोडोडेंड्रोन) के सुंदर पौधों पर कई जगह फूल थे जिनके बीच से हम आगे बढते रहे। कहीं जंगल और कहीं पानी के बहाव देखकर हम कुछ क्षण के लिए अपनी थकान भूल जाते थे। रास्ते में याक भी मिले। शाम होने से पहले हम सोका पहुंच चुके थे। जोंगरी (12800 फुट) : अगले पडाव जोंगरी के लिए हम चले तो कुछ देर बाद वर्षा ने आ घेरा। काफी तेज बारिश ने हमारी समस्याएं बढा दी। ज्यों-ज्यों हम आगे बढ रहे थे वनस्पति कम होती जा रही थी। केवल बुरांश के फूल अधिक दिखाई दे रहे थे। दोपहर बाद हम जोंगरी पहुंच चुके थे। वहां हिमपात हुआ था। चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी और ठंड भी अधिक थी। चाय और भोजन का प्रबंध तो हर स्थान पर सरकारी था और हमको भोजन बनाने की आवश्यकता नहीं थी परंतु ऊंचाई के प्रभाव के कारण कुछ भी खाने को मन नहीं कर रहा था। सिर दर्द और मितली इसके असल की निशानी हैं। रात को सोना भी मुश्किल हो जाता है। अगली सुबह कुछ सदस्य आगे बढने से कतरा रहे थे। लेकिन हिम्मत करके सब साथ चल पडे।थानजिंग (12400 फुट) : ऊंचाई वाले ट्रैक का अभ्यास न होने के कारण ऑक्सीजन की कमी कैसे पूरी की जाए, इस बात का ज्ञान मुझे नहीं था। थानजिंग की ओर बढते हुए हमें नरसिंह पर्वत और पंडिम शिखर के भव्य दर्शन हुए। खिली धूप में दोनों पर्वतों पर पडी बर्फ की चमक ज्यादा देर अपनी ओर निहारने नहीं दे रही थी। गंतव्य स्थान तक पहुंचने में हमें ज्यादा समय नहीं लगा क्योंकि जोंगरी की ऊंचाई से हम कुछ नीचे की ओर जा रहे थे और दूरी भी अधिक नहीं थी। सुमति झील (14130 फुट) और जेमाथांग : सुमिति झील को सिक्किम में मिनी मानसरोवर भी कहते हैं। समय-समय पर यहां काले हंस भी दिखाई देते हैं। जेमाथांग भी झील के साथ ही है। अद्भुत नजारा था। प्रकृति ने मानो हम पर कृपा करके मौसम खुशगवार रखा परंतु दोपहर से पहले ही मौसम खराब होने लगा। हमने झील के किनारे अच्छा खासा समय बिताया। 16200 फुट की ऊंचाई पर स्थित गोछा शिखर का प्रतिबिंब झील में पड रहा था। गोछा ला तक शायद ही कोई गया था। दोपहर को हम थानजिंग वापिस लौट आए। युकसम की ओर वापसी शुरू हो चुकी थी। हालांकि झील की खूबसूरती को छोडकर लौटने का किसी का मन नहीं कर रहा था। थानजिंग से सुमति झील के सफर में ही ओंगलाथांग से कंचनजंघा का शानदार नजारा देखा जा सकता है।लामपोखरी (13890 फुट) : अगली सुबह हमने नाश्ता किया तथा फिर कुछ आराम करके ट्रेकिंग शुरू की। दुर्भाग्य से मुझे ऊंचाई का असर महसूस होने लगा था। मुझसे एक कदम भी आगे चला नहीं जा रहा था। कुछ साथियों ने सहारा देने की कोशिश तो की लेकिन मुझसे चला नहीं जा रहा था। मैं बैठा रहा और पहले दल के सदस्य और फिर दल के उपनेता और नेता भी चुपचाप आगे निकल गए। अंत में सबसे धीमे चलने वाले दो सदस्य डाक्टर यादव और प्रोफेसर शेखर मेरे पास आए। मेरी हालत को गंभीरता से लेते हुए वे दोनों वहीं रुक गए। उनके साथ एक पोर्टर भी था। पहले तो डाक्टर यादव ने मुझे मीठा पेयजल खूब पिलाया ताकि पानी से मेरे अंदर आक्सीजन की मात्रा बढाई जाय। फिर मुझे सुला दिया। लगभग डेढ घंटा मैं सोया रहा और वे तीनों भी मेरे समीप बैठे रहे। अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि मुझे थानजिंग वापिस ले जाया जाए। डाक्टर यादव और पोर्टर ने कष्ट उठाते हुए सहारा दे देकर कैंप तक पहुंचाया। प्रोफेसर शेखर धीरे-धीरे आगे बढते रहे ताकि डाक्टर यादव उनसे वापिस आ मिलें। रात हो चुकी थी। डाक्टर और पोर्टर मुझे कैंप में पहुंचाकर लामपोखरी की तरफ चल पडे। कैंप लीडर ने वायरलेस सेट से इधर-उधर सूचना देकर पांच पोर्टरों का प्रबंध किया और अगले दिन मुझे वे पोर्टर बारी-बारी से पीठ पर उठाकर किसी छोटे रास्ते से सोका कैंप पर ले गए। यहां पर कम ऊंचाई के चलते मेरी स्थिति सुधरने लगी। मैं उन पोर्टरों का आभारी था जिन्होंने ऐसी स्थिति में मेरी सहायता की। पहाड के लोग ऐसे ही मददगार स्वभाव के लिए जाने भी जाते हैं।कस्तूरी ओराल (9880 फुट) : लामपोखरी में रात बिताकर मेरे साथी कस्तूरी ओराल आए और मैं सोका से युकसम पहुंच गया। अगले दिन सभी साथी भी आ मिले। सबने अपनी-अपनी कथा-व्यथा सुनाई और ट्रेकिंग अभियान पूरा होने की खुशी मनाई।ट्रेकिंग शुरू करने से पहले हमने मुंबई से आए दल की एक महिला सदस्य को बीमार होते देखा था। वह आगे नहीं जा सकी थी। उसकी एक साथी लडकी ने उसे अकेला नहीं छोडा और बिना ट्रेकिंग किए अपनी सहेली को लेकर मुंबई लौट गई थी। आयोजकों ने उस लडकी की सराहना तो की ही साथ ही डाक्टर यादव और प्रोफेसर शेखर की भी भूरी-भूरी प्रशंसा की। अगले दिन हमें सिक्किम सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से प्रमाणपत्र देकर विदा किया गया। हम गंगटोक होते हुए दिल्ली लौट चले।सिक्किम एक नजर में कैसे : सिक्किम में न तो कोई रेलवे स्टेशन है और न ही हवाई अड्डा। लेकिन बावजूद इसके वहां पहुंचने में कोई मुश्किल नहीं। पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग में बागडोगरा हवाई अड्डा सिक्किम के लिए सबसे समीप है। गुवाहाटी, कोलकाता और दिल्ली से रोजाना बागडोगरा के लिए उडानें हैं। हवाई अड्डे से सिक्किम की राजधानी गंगटोक 124 किमी दूर है। यह रास्ता आप सडक मार्ग से भी तय कर सकते हैं और चाहें तो सिक्किम पर्यटन विभाग की बागडोगरा और गंगटोक के बीच हेलीकॉप्टर सेवा का भी फायदा उठा सकते हैं। सिक्किम के लिए सबसे समीप के दो स्टेशन सिलीगुडी और न्यू जलपाईगुडी हैं। गंगटोक से इनकी दूरी क्रमश: 114 व 125 किलोमीटर है। सिक्किम में सडकें अच्छी हैं और दूर-दराज के भी ज्यादातर हिस्से अच्छी सडक से जुडे हैं।परमिट : सीमांत प्रांत होने के कारण विदेशी नागरिकों को यहां आने के लिए इनर लाइन परमिट (आईएलपी) लेना होता है जो उन्हें वीजा के आधार पर मिल जाता है। परमिट सिक्किम पहुंच कर भी मिल जाता है जिसकी अवधि 15 दिन होती है। यह अवधि बढवाई जा सकती है।ठहरने के लिए स्थान: सिक्किम में होटलों और लॉज की कमी नहीं है। प्रत्येक आय वर्ग के अनुकूल रहने के लिए उचित स्थान मिल जाता है। चाहे सरकारी क्षेत्र में या फिर निजी क्षेत्र में।मौसम एवं तापमान : हिमालय की तलहटी में होने के कारण यहां का मौसम अन्य हिमालयी राज्यों जैसा ही है। सर्दियां काफी ठंडी और गरमियां सुहानी। बस बारिश से बचें क्योंकि बारिश में पहाड घूमने का मजा किरकिरा हो जाता है। मार्च से जून और फिर अक्टूबर से दिसंबर तक का समय यहां जाने के लिए सबसे दुरुस्त है।(साभार)
Subscribe to:
Posts (Atom)