कोलकाता। पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार को जमीन अधिग्रहण मामले में एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बुधवार (८ जुलाई) को राज्य सरकार की उस नोटिस को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सरकार ने ४७ कट्टा में फैले रवींद्र सरणी स्थित गणेश गढ़ को अधिग्रहण करने की बात कही थी। विगत दो सालों से लटके मामले में बुधवार को उस वक्त विराम लग गया, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ज्योतिर्मय भट्टाचार्य ने राज्य सरकार की अपील को खरिज करते हुए यशोदा देवी लाखोटिया व अन्य के पक्ष में फैसला सुना दिया।
मालूम हो कि १९ जुलाई २००८ को महानगर के कुछ अखबारों में राज्य सरकार की ओर से एक अधिसूचना प्रकाशित कारई गई थी। जिसके अनुसार रवींद्र सरणी स्थित (रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के विपरीत) गणेश गढ़ की खाली हुई जमीन को अधिग्रहण करने की पेशकश की गई थी। अधिसूचना में इस बात का जिक्र किया गया था कि यहां (गणेश गढ़) बैथून कॉलेज के कुछ विभागों का स्थानांतरण किया जाएगा। इसलिए राज्य सरकार इसका अधिग्रहण करना चाहती है। इस अधिग्रहण के खिलाफ यशोदा देवी लाखोटिया ने ७ अगस्त २००८ को अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसका फैसला ७ जुलाई २००९ को उनके पक्ष में आया।
उल्लेखनीय है कि १९९५ में लाखोटिया परिवार ने गणेश गढ़ खरीदा था। उसके बाद सालों तक न्यायालय के चक्कर काटने और कई जद्दोजेहद झेलने के बाद उन्होंने यह मकान खाली करवाया था। तत्कालीन सांसद और माकपा नेता सुधांशु शील की इस खाली पड़े भूखंड पर नजर पड़ी और जब उनका निजी स्वार्थ पूरा नहीं हुआ तो उन्होंने इसकी अधिग्रहण की बात उछाल दी। इस बाबत शील की सह पर राज्य सरकार ने २००६ में माहेश्वरी विद्यालय के विस्तार के लिए गणेश गढ़ के अधिग्रहण बाबत अधिसूचना जारी की थी, जिसे लाखोटिया परिवार ने चुनौती दी और न्यायालय ने चुनौती पर गौर करते हुए राज्य सरकार की नोटिस को खारिज कर दिया।
बुधवार को न्यायाधीश ज्योतिर्मय भट्टाचार्य ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इस अधिग्रहण के पीछे गलत मंशा है। अदालत में पेश किए गए कागजात के मद्देनजर यह समझ में आ गया है कि कॉलेज का विस्तार महज एक बहाना है यहां मुख्य मुद्दा जमीन के मालिक को परेशान करना हैं।
ध्यान देने वाली बात है कि रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के विपरीत बने गणेश गढ़ की जमीन पर जहां राज्य सरकार शिक्षण संस्थान बनाना चाह रही थी वहां के माहौल को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग शिक्षा के लिए प्रतिकुल बताया है इसीलिए अनुदान की सिफारिश पर रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग को रवींद्र सरणी से बीटी रोड स्थानांतरित कर दिया गया है।
मजे की बात यह है कि जिस बैथून कॉलेज की विस्तार की बात की जा रही थी उसकी प्रभारी भी मानती है कि बड़ाबाजार का भीड़भाड़ वाला इलाका उच्च शिक्षण संस्थान के निर्माण के नजिरए से अनुकूल नहीं है। लाखोटिया परिवार की तरफ से इस मामले की पैरवी एडवोकेट बीके बच्छावच, गौरीशंकर मित्रा, एस. पाल कर रहे थे, जबकि राज्य सरकार की ओर से बलाई राय और सुधांशु शील की तरफ से अशोक बनर्जी अपनी बात रख रहे थे।
Sunday, July 12, 2009
Friday, June 26, 2009
वंदेमातरम स्वतंत्रता सेनानियों का कंठहार
देश के आजादी आंदोलन में स्वतंत्रता सेनानियों का कंठहार बनी बांग्ला रचनाकार बंकिमचंद चटर्जी की कालजई रचना 'वंदेमातरम' बेहद सामान्य परिस्थितियों में पहली बार प्रकाशित हुई थी और उस समय शायद इसके लेखक को भी यह अनुमान न होगा कि आने वाले दिनों में यह गीत एक मंत्र की तरह सारे देश में गूंजेगा। वंदेमातरम के प्रकाशन का एक दिलचस्प इतिहास है।
बंकिम एक पत्रिका 'बंगदर्शन' निकालते थे और इसकी अधिकतर रचनाएं वह स्वयं ही लिखते थे। एक बार पत्रिका छपने के समय कंपोजीटर बंकिम के पास आया और कहा कि उसे थोड़े से बचे स्थान के लिए कुछ सामग्री चाहिए। बंकिम ने अपनी दराज खोली और सामने पड़ा अपना गीत वंदेमातरम का एक अंश छपने को दे दिया। यह घटना 1875 की है। यह जानकारी अमलेश भट्टाचार्य की पुस्तक 'वंदेमातरम' में दी गई है। इस तरह पहली बार वंदेमातरम गीत छपा। जाहिर सी बात है लोगों की नजर में उस समय यह गीत नहीं चढ़ा। बाद में बंकिम ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को जब शामिल किया तो लोगों ने इसे गौर से पढ़ा। आनंदमठ में छपने के बाद बंकिम को अपनी इस रचना की प्रभावोत्पादकता का कुछ-कुछ अनुमान तो होने लगा था, लेकिन उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि आने वाले दिनों में यह रचना जादुई असर करेगी और महान रचना के रूप में इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगी। वर्ष 1886 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार वंदेमातरम गाया गया था।
बंकिम की मृत्यु के दो साल बाद 1896 में कोलकाता में ही आयोजित कांग्रेस के एक अन्य अधिवेशन में स्वयं गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता प्रेमियों में उत्साह का संचार करने वाली इस रचना का वास्तविक उत्कर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान हुआ। वंदेमातरम जब पूरे देश में आजादी का नारा फूंकने वाला मंत्र बना तो उस समय बंकिम जीवित नहीं थे।
आजादी के बाद भारत में इसे राष्ट्रगीत का गौरव हासिल हुआ। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बांग्ला विभाग में रीडर पी के मैती के अनुसार वंदेमातरम बंकिम की सर्वाधिक लोकप्रिय कृति है जो विभिन्न कारणों से आजादी का नारा बन गई। मैती ने कहा कि बांग्ला में सिर्फ बंकिम और शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएं हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती है। लोकप्रियता के मामले में बंकिम और शरद रविन्द्र नाथ टैगोर से भी आगे हैं। उन्होंने कहा कि बंकिम बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनाकार थे। उनके कथा साहित्य के अधिकतर पात्र शहरी मध्यम वर्ग के लोग हैं। इनके पात्र आधुनिक जीवन की त्रासदियों और प्राचीन काल की परंपराओं से जुड़ी दिक्कतों से साथ साथ जूझते हैं। यह समस्या भारत भर के किसी भी प्रांत के शहरी मध्यम वर्ग के समक्ष आती है। लिहाजा मध्यम वर्ग का पाठक बंकिम के उपन्यासों में अपनी छवि देखता है।
बंकिमचंद्र चटर्जी की पहचान बांग्ला कवि, उपन्यासकार, लेखक और पत्रकार के रूप में है। चटर्जी का जन्म 26 जून 1838 को एक रूढि़वादी परिवार में हुआ था। आठ अप्रैल 1894 को उनका निधन हो गया था। बंकिमचंद्र के उपन्यासों का भारत की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया गया। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना राजमोहन्स वाइफ थी। इसकी रचना अंग्रेजी में की गई थी। बांग्ला में प्रकाशित उनकी प्रथम रचना दुर्गेश नंदिनी [1865] थी, जो एक रूमानी रचना है। उनकी अगली रचना का नाम कपालकुंडला [1866] है। इसे उनकी सबसे अधिक रूमानी रचनाओं में से एक माना जाता है। उन्होंने 1872 में मासिक पत्रिका बंगदर्शन का भी प्रकाशन किया। अपनी इस पत्रिका में उन्होंने विषवृक्ष [1873] उपन्यास का क्रमिक रूप से प्रकाशन किया। कृष्णकांतेर विल में चटर्जी ने अंग्रेजी शासकों पर तीखा व्यंग्य किया है।
आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है। चटर्जी का अंतिम उपन्यास सीताराम [1886] है। इसमें मुस्लिम सत्ता के प्रति एक हिंदू शासक का विरोध दर्शाया गया है। उनके अन्य उपन्यासों में दुर्गेशनंदिनी, मृणालिनी, इंदिरा, राधारानी, कृष्णकांतेर दफ्तर, देवी चौधरानी और मोचीराम गौरेर जीवनचरित शामिल है। उनकी कविताएं ललिता ओ मानस नामक संग्रह में प्रकाशित हुई। उन्होंने धर्म, सामाजिक और समसामायिक मुद्दों पर आधारित कई निबंध भी लिखे।
साभार
बंकिम एक पत्रिका 'बंगदर्शन' निकालते थे और इसकी अधिकतर रचनाएं वह स्वयं ही लिखते थे। एक बार पत्रिका छपने के समय कंपोजीटर बंकिम के पास आया और कहा कि उसे थोड़े से बचे स्थान के लिए कुछ सामग्री चाहिए। बंकिम ने अपनी दराज खोली और सामने पड़ा अपना गीत वंदेमातरम का एक अंश छपने को दे दिया। यह घटना 1875 की है। यह जानकारी अमलेश भट्टाचार्य की पुस्तक 'वंदेमातरम' में दी गई है। इस तरह पहली बार वंदेमातरम गीत छपा। जाहिर सी बात है लोगों की नजर में उस समय यह गीत नहीं चढ़ा। बाद में बंकिम ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में इस गीत को जब शामिल किया तो लोगों ने इसे गौर से पढ़ा। आनंदमठ में छपने के बाद बंकिम को अपनी इस रचना की प्रभावोत्पादकता का कुछ-कुछ अनुमान तो होने लगा था, लेकिन उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि आने वाले दिनों में यह रचना जादुई असर करेगी और महान रचना के रूप में इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगी। वर्ष 1886 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार वंदेमातरम गाया गया था।
बंकिम की मृत्यु के दो साल बाद 1896 में कोलकाता में ही आयोजित कांग्रेस के एक अन्य अधिवेशन में स्वयं गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे गाया था। स्वतंत्रता प्रेमियों में उत्साह का संचार करने वाली इस रचना का वास्तविक उत्कर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान हुआ। वंदेमातरम जब पूरे देश में आजादी का नारा फूंकने वाला मंत्र बना तो उस समय बंकिम जीवित नहीं थे।
आजादी के बाद भारत में इसे राष्ट्रगीत का गौरव हासिल हुआ। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बांग्ला विभाग में रीडर पी के मैती के अनुसार वंदेमातरम बंकिम की सर्वाधिक लोकप्रिय कृति है जो विभिन्न कारणों से आजादी का नारा बन गई। मैती ने कहा कि बांग्ला में सिर्फ बंकिम और शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय को यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएं हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं में आज भी चाव से पढ़ी जाती है। लोकप्रियता के मामले में बंकिम और शरद रविन्द्र नाथ टैगोर से भी आगे हैं। उन्होंने कहा कि बंकिम बहुमुखी प्रतिभा वाले रचनाकार थे। उनके कथा साहित्य के अधिकतर पात्र शहरी मध्यम वर्ग के लोग हैं। इनके पात्र आधुनिक जीवन की त्रासदियों और प्राचीन काल की परंपराओं से जुड़ी दिक्कतों से साथ साथ जूझते हैं। यह समस्या भारत भर के किसी भी प्रांत के शहरी मध्यम वर्ग के समक्ष आती है। लिहाजा मध्यम वर्ग का पाठक बंकिम के उपन्यासों में अपनी छवि देखता है।
बंकिमचंद्र चटर्जी की पहचान बांग्ला कवि, उपन्यासकार, लेखक और पत्रकार के रूप में है। चटर्जी का जन्म 26 जून 1838 को एक रूढि़वादी परिवार में हुआ था। आठ अप्रैल 1894 को उनका निधन हो गया था। बंकिमचंद्र के उपन्यासों का भारत की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया गया। उनकी प्रथम प्रकाशित रचना राजमोहन्स वाइफ थी। इसकी रचना अंग्रेजी में की गई थी। बांग्ला में प्रकाशित उनकी प्रथम रचना दुर्गेश नंदिनी [1865] थी, जो एक रूमानी रचना है। उनकी अगली रचना का नाम कपालकुंडला [1866] है। इसे उनकी सबसे अधिक रूमानी रचनाओं में से एक माना जाता है। उन्होंने 1872 में मासिक पत्रिका बंगदर्शन का भी प्रकाशन किया। अपनी इस पत्रिका में उन्होंने विषवृक्ष [1873] उपन्यास का क्रमिक रूप से प्रकाशन किया। कृष्णकांतेर विल में चटर्जी ने अंग्रेजी शासकों पर तीखा व्यंग्य किया है।
आनंदमठ राजनीतिक उपन्यास है। इस उपन्यास में उत्तर बंगाल में 1773 के संन्यासी विद्रोह का वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में देशभक्ति की भावना है। चटर्जी का अंतिम उपन्यास सीताराम [1886] है। इसमें मुस्लिम सत्ता के प्रति एक हिंदू शासक का विरोध दर्शाया गया है। उनके अन्य उपन्यासों में दुर्गेशनंदिनी, मृणालिनी, इंदिरा, राधारानी, कृष्णकांतेर दफ्तर, देवी चौधरानी और मोचीराम गौरेर जीवनचरित शामिल है। उनकी कविताएं ललिता ओ मानस नामक संग्रह में प्रकाशित हुई। उन्होंने धर्म, सामाजिक और समसामायिक मुद्दों पर आधारित कई निबंध भी लिखे।
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जूट उद्योग गुमनामी के कगार पर, बजट से आस
कोलकाता। जूट ईकोफ्रेंडली होने का साथ-साथ आजकल फैशन में भी है। फिर भी जूट इंडस्ट्री मंदी की आगोश में है। लोग जूट के बने ड्रेस, जूट के खिलौने, जूट का बैग, जूट के पर्दे और न जाने क्या-क्या इस्तेमाल करते हैं।दुनिया भर में मशहूर कोलकाता की जूट इंडस्ट्री आज बर्बादी की कगार पर है।
दुनिया भर में मशहूर कोलकाता की जूट इंडस्ट्री आज बर्बादी की कगार पर है। कभी चांदी काटने वाले यहां के जूट व्यापारियों और मजदूरों के सामने आज रोजी-रोटी के लाले हैं। ये इंडस्ट्री आज अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है। पिछले तीन सालों में जूट की हर एक मिल को करीब 25 से 50 लाख का घाटा हो चुका है।
दरअसल कच्चे जूट की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। जिसकी वजह से जूट से बने सामानों की लागत ज्यादा हो गई है और मांग में कमी आई है। जानकारों की मानें तो साल भर में कच्चे जूट की कीमत 60 फीसदी तक बढ़ गई है। बाकी का कसर सूखे और आर्थिक मंदी ने पूरी कर दी।
जूट इंडस्ट्री की दुर्दशा के लिए अकेले मंदी ही नहीं बल्कि लोगों की बदलती लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार है। लोग जूट की जगह प्लास्टिक बैग को ज्यादा तरजीह देते हैं। एक तो प्लास्टिक के बैग जूट के मुकाबले सस्ते हैं और देश के हर कोने में आसानी से उपलब्ध हैं। यही वजह है कि सीमेंट और फर्टिलाइजर की तर्ज पर दूसरी इंडस्ट्रीज़ भी जूट की जगह प्लास्टिक बैग का धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हैं। पिछले साल के मुकाबले इस साल जूट की गैर सरकारी खरीददारी करीब 30 फीसदी घटी है।
कोलकाता में जूट की कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। सालों पुराना कारोबार मंदी की भेंट चढ़ रहा है। लेकिन कारोबारियों की उम्मीद बरकरार है। वो चाहते हैं कि सरकार कुछ दिनों के लिए जूट की फॉर्वर्ड मार्केट में ट्रेडिंग करके उनके व्यापार को बचा ले। साथ ही जूट इंडस्ट्री की अब आने वाले बजट पर आस टिकी है।
साभार
दुनिया भर में मशहूर कोलकाता की जूट इंडस्ट्री आज बर्बादी की कगार पर है। कभी चांदी काटने वाले यहां के जूट व्यापारियों और मजदूरों के सामने आज रोजी-रोटी के लाले हैं। ये इंडस्ट्री आज अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है। पिछले तीन सालों में जूट की हर एक मिल को करीब 25 से 50 लाख का घाटा हो चुका है।
दरअसल कच्चे जूट की कीमत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। जिसकी वजह से जूट से बने सामानों की लागत ज्यादा हो गई है और मांग में कमी आई है। जानकारों की मानें तो साल भर में कच्चे जूट की कीमत 60 फीसदी तक बढ़ गई है। बाकी का कसर सूखे और आर्थिक मंदी ने पूरी कर दी।
जूट इंडस्ट्री की दुर्दशा के लिए अकेले मंदी ही नहीं बल्कि लोगों की बदलती लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार है। लोग जूट की जगह प्लास्टिक बैग को ज्यादा तरजीह देते हैं। एक तो प्लास्टिक के बैग जूट के मुकाबले सस्ते हैं और देश के हर कोने में आसानी से उपलब्ध हैं। यही वजह है कि सीमेंट और फर्टिलाइजर की तर्ज पर दूसरी इंडस्ट्रीज़ भी जूट की जगह प्लास्टिक बैग का धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हैं। पिछले साल के मुकाबले इस साल जूट की गैर सरकारी खरीददारी करीब 30 फीसदी घटी है।
कोलकाता में जूट की कई फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं। सालों पुराना कारोबार मंदी की भेंट चढ़ रहा है। लेकिन कारोबारियों की उम्मीद बरकरार है। वो चाहते हैं कि सरकार कुछ दिनों के लिए जूट की फॉर्वर्ड मार्केट में ट्रेडिंग करके उनके व्यापार को बचा ले। साथ ही जूट इंडस्ट्री की अब आने वाले बजट पर आस टिकी है।
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Saturday, June 20, 2009
कोलकाता का मशहूर काली मंदिर
कोलकाता। यहां दक्षिणेश्वर काली मंदिर है। इस मंदिर से नाता है विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस का।
इस मंदिर में देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। लंबी-लंबी कतारों में घंटो खड़े होकर मां के दर्शन का इंतजार करते हैं।
इसी मंदिर में रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर काली ने दर्शन दिया था। आज पूरी दुनिया में रामकृष्ण मिशन के लोग शांति और सुख का संदेश देते हैं। लेकिन रामकृष्ण परमहंस की खुद की मौत कैंसर से हुई थी।
जिस गुरु की कृपा से विवेकानंद पूरी दुनिया में मशहूर हुए उस गुरु के आखिरी दिन इतने संकट से क्यों गुजरे।
जिन्होंने लाखों लोगों को अध्यात्मिक रास्ता दिखाया उनकी मौत कैंसर की वजह से क्यों हुई। कहानी बड़ी विचित्र है। लेकिन एक ऐसे सच के दायरे में है जिसे जानकर रुह तक कांप जाती है।
इस मंदिर में देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। लंबी-लंबी कतारों में घंटो खड़े होकर मां के दर्शन का इंतजार करते हैं।
इसी मंदिर में रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर काली ने दर्शन दिया था। आज पूरी दुनिया में रामकृष्ण मिशन के लोग शांति और सुख का संदेश देते हैं। लेकिन रामकृष्ण परमहंस की खुद की मौत कैंसर से हुई थी।
जिस गुरु की कृपा से विवेकानंद पूरी दुनिया में मशहूर हुए उस गुरु के आखिरी दिन इतने संकट से क्यों गुजरे।
जिन्होंने लाखों लोगों को अध्यात्मिक रास्ता दिखाया उनकी मौत कैंसर की वजह से क्यों हुई। कहानी बड़ी विचित्र है। लेकिन एक ऐसे सच के दायरे में है जिसे जानकर रुह तक कांप जाती है।
क्या है इस काली मंदिर का रहस्य
1847 की बात है। देश में अंग्रेजों का शासन था। पश्चिम बंगाल में रानी रासमनी नाम की एक बहुत ही अमीर विधवा थी।
उनकी जिंदगी में सबकुछ था लेकिन पति का सुख नहीं था। रानी रासमनी जब उम्र के चौथे पहर में आ गई तो उनके मन में सभी तीर्थों के दर्शन करने का खयाल आया। रानी रासमनी देवी माता की बहुत बड़ी उपासक थी।
उन्होंने सोचा कि वो अपनी तीर्थ यात्रा की शुरुआत वराणसी से करेंगी और वहीं रहकर देवी का कुछ दिनों तक ध्यान करेंगी। उन दिनों वाराणसी और कोलकाता के बीच कोई रेल लाइन नहीं थी।
कोलकाता से वाराणसी जाने के लिए अमीर लोग नाव का सहारा लेते थे। दोनों ही शहर से गंगा गुजरती हैं इसलिए लोग गंगा के रास्ते ही वाराणसी तक जाना चाहते थे।
रानी रासमनी ने भी यही फैसला किया। उनका काफिला वाराणसी जाने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जाने के ठीक एक रात पहले रानी के साथ एक अजीब वाकया हुआ।
मन में देवी का ध्यान कर के वो सोई थी। रात में एक सपना आया। सपने में देवी काली प्रकट हुई और उनसे कहा कि वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं है। आप गंगा के किनारे मेरी प्रतिमा को स्थापित करिए। एक खूबसूरत मंदिर बनाइए। मैं उस मंदिर की प्रतिमा में खुद प्रकट होकर श्रद्धालुओं की पूजा को स्वीकार करुंगी।
रानी की आंख खुली। सुबह होते ही वाराणसी जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया और गंगा के किनारे मां काली के मंदिर के लिए जगह की तलाश शुरू कर दी गई।
कहते हैं कि जब रानी इस घाट पर गंगा के किनारे जगह की तलाश करते करते आईं तो उनके अंदर से एक आवाज आई कि हां इसी जगह पर मंदिर का निर्माण होना चाहिए।
फिर ये जगह खरीद ली गई और मंदिर का काम तेजी से शुरु हो गया। ये बात 1847 की है और मंदिर का काम पूरा हुआ 1855 यानी कुल आठ सालों में।साभार)
1847 की बात है। देश में अंग्रेजों का शासन था। पश्चिम बंगाल में रानी रासमनी नाम की एक बहुत ही अमीर विधवा थी।
उनकी जिंदगी में सबकुछ था लेकिन पति का सुख नहीं था। रानी रासमनी जब उम्र के चौथे पहर में आ गई तो उनके मन में सभी तीर्थों के दर्शन करने का खयाल आया। रानी रासमनी देवी माता की बहुत बड़ी उपासक थी।
उन्होंने सोचा कि वो अपनी तीर्थ यात्रा की शुरुआत वराणसी से करेंगी और वहीं रहकर देवी का कुछ दिनों तक ध्यान करेंगी। उन दिनों वाराणसी और कोलकाता के बीच कोई रेल लाइन नहीं थी।
कोलकाता से वाराणसी जाने के लिए अमीर लोग नाव का सहारा लेते थे। दोनों ही शहर से गंगा गुजरती हैं इसलिए लोग गंगा के रास्ते ही वाराणसी तक जाना चाहते थे।
रानी रासमनी ने भी यही फैसला किया। उनका काफिला वाराणसी जाने के लिए तैयार हुआ। लेकिन जाने के ठीक एक रात पहले रानी के साथ एक अजीब वाकया हुआ।
मन में देवी का ध्यान कर के वो सोई थी। रात में एक सपना आया। सपने में देवी काली प्रकट हुई और उनसे कहा कि वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं है। आप गंगा के किनारे मेरी प्रतिमा को स्थापित करिए। एक खूबसूरत मंदिर बनाइए। मैं उस मंदिर की प्रतिमा में खुद प्रकट होकर श्रद्धालुओं की पूजा को स्वीकार करुंगी।
रानी की आंख खुली। सुबह होते ही वाराणसी जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया और गंगा के किनारे मां काली के मंदिर के लिए जगह की तलाश शुरू कर दी गई।
कहते हैं कि जब रानी इस घाट पर गंगा के किनारे जगह की तलाश करते करते आईं तो उनके अंदर से एक आवाज आई कि हां इसी जगह पर मंदिर का निर्माण होना चाहिए।
फिर ये जगह खरीद ली गई और मंदिर का काम तेजी से शुरु हो गया। ये बात 1847 की है और मंदिर का काम पूरा हुआ 1855 यानी कुल आठ सालों में।साभार)
Friday, June 19, 2009
बंदरगाहों पर कारोबार बढ़ने के संकेत
भारत के बड़े बंदरगाहों पर कंटेनर ट्रैफिक वाल्यूम में कुल मिलाकर गिरावट का दौर चल रहा है।
हालांकि अप्रैल महीने की तुलना में मई के दौरान कुल लदान में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग जगत के विश्लेषकों का कहना है कि अब कारोबार में गिरावट के संकेत मिलने बंद हो गए हैं।
इंडियन पोर्ट एसोसिएशन (आईपीए) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश के12 बड़े बंदरगाहों ने चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों के दौरान कुल 10.5 लाख टीईयू माल की ढुलाई की।
केवल मई महीने में ही सभी बंदरगाहों ने मिलकर कुल 5.38 लाख टीईयू माल की ढुलाई की, जिसमें सालाना आधार पर 10.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन पिछले महीने- अप्रैल की तुलना में कारोबार में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के निदेशक एसके मंडल ने कहा, 'सभी बंदरगाहों पर गिरावट की एक प्रमुख वजह यह है कि पिछले साल अप्रैल से सितंबर के बीच कारोबार बहुत ज्यादा हुआ है। जहां संपूर्ण कारगो में 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई वहीं इस अवधि के दौरान कंटेनर ट्रैफिक में 10.16 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।'
देश के कुल कंटेनर वाल्यूम में जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से ज्यादा है। यहां सालाना आधार पर मात्रा के मुताबिक मई 2009 में 9.4 प्रतिशत की गिरावट रही और कुल कारोबार 3.29 लाख टीईयू का रहा। लेकिन यह पिछले महीने की तुलना में 4.4 प्रतिशत ज्यादा रहा।
भारत के कुल कंटेनर वाल्यूम में चेन्नई की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत है, जहां सालाना आधार पर 16.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यहां कुल कारोबार 88,000 टीईयू का रहा, जबकि मात्रा का स्तर समान ही बना रहा। सबसे ज्यादा गिरावट मुंबई पोर्ट पर रही।
मंडल ने कहा कि इस वित्त वर्ष में वहां से केवल 10,000 टीईयू का काम हुआ, जो पिछले साल की समान अवधि से 54 प्रतिशत कम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट ने तुलनात्मक रूप से बेहतर कारोबार किया। कोलकाता डॉक सिस्टम (केडीएस) के कंटेनर वाल्यूम में 11 प्रतिशत की उछाल आई और यह 57,000 टीईयू रहा।
हल्दिया डॉक सिस्टम (एचडीएस) पर बहरहाल 32 प्रतिशत की गिरावट रही और यहां कुल 18,000 टीईयू कारोबार हुआ। एंजेल ब्रोकिंग के एक विश्लेषक परम देसाई का कहना है कि पिछले साल की पहली छमाही में विकास दर बेहतर थी, जिसके चलते आधार मजबूत है और जब उसकी तुलना चालू वित्त वर्ष से करते हैं तो स्थिति खराब आती है।
लेकिन पिछले साल की दूसरी छमाही से तुलना करने पर स्थिति में सुधार नजर आता है। उन्होंने कहा कि जनवरी और फरवरी -09 बहुत खराब महीने थे। अप्रैल-मई के दौरान जो ट्रेंड मिले हैं वह जून तक जारी रहेगा। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में मात्रा के हिसाब से कारोबार गति पकड़ लेगा। (साभार)
हालांकि अप्रैल महीने की तुलना में मई के दौरान कुल लदान में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग जगत के विश्लेषकों का कहना है कि अब कारोबार में गिरावट के संकेत मिलने बंद हो गए हैं।
इंडियन पोर्ट एसोसिएशन (आईपीए) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश के12 बड़े बंदरगाहों ने चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों के दौरान कुल 10.5 लाख टीईयू माल की ढुलाई की।
केवल मई महीने में ही सभी बंदरगाहों ने मिलकर कुल 5.38 लाख टीईयू माल की ढुलाई की, जिसमें सालाना आधार पर 10.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन पिछले महीने- अप्रैल की तुलना में कारोबार में 3.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के निदेशक एसके मंडल ने कहा, 'सभी बंदरगाहों पर गिरावट की एक प्रमुख वजह यह है कि पिछले साल अप्रैल से सितंबर के बीच कारोबार बहुत ज्यादा हुआ है। जहां संपूर्ण कारगो में 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई वहीं इस अवधि के दौरान कंटेनर ट्रैफिक में 10.16 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।'
देश के कुल कंटेनर वाल्यूम में जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से ज्यादा है। यहां सालाना आधार पर मात्रा के मुताबिक मई 2009 में 9.4 प्रतिशत की गिरावट रही और कुल कारोबार 3.29 लाख टीईयू का रहा। लेकिन यह पिछले महीने की तुलना में 4.4 प्रतिशत ज्यादा रहा।
भारत के कुल कंटेनर वाल्यूम में चेन्नई की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत है, जहां सालाना आधार पर 16.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यहां कुल कारोबार 88,000 टीईयू का रहा, जबकि मात्रा का स्तर समान ही बना रहा। सबसे ज्यादा गिरावट मुंबई पोर्ट पर रही।
मंडल ने कहा कि इस वित्त वर्ष में वहां से केवल 10,000 टीईयू का काम हुआ, जो पिछले साल की समान अवधि से 54 प्रतिशत कम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट ने तुलनात्मक रूप से बेहतर कारोबार किया। कोलकाता डॉक सिस्टम (केडीएस) के कंटेनर वाल्यूम में 11 प्रतिशत की उछाल आई और यह 57,000 टीईयू रहा।
हल्दिया डॉक सिस्टम (एचडीएस) पर बहरहाल 32 प्रतिशत की गिरावट रही और यहां कुल 18,000 टीईयू कारोबार हुआ। एंजेल ब्रोकिंग के एक विश्लेषक परम देसाई का कहना है कि पिछले साल की पहली छमाही में विकास दर बेहतर थी, जिसके चलते आधार मजबूत है और जब उसकी तुलना चालू वित्त वर्ष से करते हैं तो स्थिति खराब आती है।
लेकिन पिछले साल की दूसरी छमाही से तुलना करने पर स्थिति में सुधार नजर आता है। उन्होंने कहा कि जनवरी और फरवरी -09 बहुत खराब महीने थे। अप्रैल-मई के दौरान जो ट्रेंड मिले हैं वह जून तक जारी रहेगा। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में मात्रा के हिसाब से कारोबार गति पकड़ लेगा। (साभार)
बुद्धदेव की काबिलियत पर उठने लगे सवाल
नंदीग्राम की तरह अब लालगढ़ को लेकर भी पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की प्रशासनिक काबिलियत पर सवालिया निशान लगाया जाने लगा है। ऐसा करने वाले कोई और नहीं बल्कि वाममोर्चा में माकपा के ही सहयोगी दल हैं।
लालगढ़ में माओवादियों पर सख्त पुलिस कार्रवाई के लिए सहयोगी वामदलों ने बुद्धदेव को भले ही सहमति दे दी हो लेकिन उन्होंने वहां के हालात इस कदर बिगड़ने के लिए मुख्यमंत्री को कठघरे में भी खड़ा करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि सूबे के मुखिया में कहीं न कहीं प्रशासनिक क्षमता की कमी जरूर है।
नंदीग्राम संग्राम को लेकर तो बुद्धदेव में यह कमी तो भाकपा नेता ए.बी. बर्धन समेत दूसरे कामरेड खुलकर बताते रहे हैं, लेकिन लालगढ़ कांड के आधार उनकी आलोचना फिलहाल बंद कमरे तक सीमित रखे हुए हैं। हां, अगर लालगढ़ भी नंदीग्राम का दूसरा पार्ट बन जाए तो बुद्धदेव की खिंचाई सार्वजनिक तौर पर करने से कोई नहीं चूकेगा। वहीं माकपा केंद्रीय समिति की यहां शुक्रवार से शुरू हो रही तीन दिन की बैठक में इस मसले पर भी विस्तृत चर्चा होगी।
तीसरा मोर्चा और परमाणु करार से समर्थन वापसी के अपने फैसले की समीक्षा तो माकपा नेतृत्व करेगा ही, लेकिन साथ ही बुद्धदेव को भी लालगढ़ पर जवाब देना होगा।
सूत्रों के मुताबिक कोलकाता में वाममोर्चा की बैठक के दौरान आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक के वरिष्ठ नेताओं ने लालगढ़ के हालात बेकाबू होने के पीछे बुद्धदेव की कमजोरी ही बताई। वाममोर्चा के संयोजक व माकपा सचिव बिमान बोस को अपनी भावना से अवगत कराते हुए कामरेडों ने कह दिया कि वक्त रहते ठोस कार्रवाई कर ली जाती तो माओवादी लालगढ़ को अपने कब्जे में नहीं कर पाते।
यानी सीधे-सीधे वाममोर्चा के घटक दलों ने मुख्यमंत्री की प्रशानिक काबिलियत पर निशाना साधा है। सूत्रों की माने तो कुछ कामरेड तो किसी भी मामले को संभाल पाने में उनकी नाकामी को भी रेखांकित करने सुने गए हैं।
जाहिर है भाकपा समेत सभी वामदलों को बुद्धदेव के कामकाज का तरीका कतई पसंद नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों की हार के बाद तो बुद्धदेव के खिलाफ उनका गुस्सा बढ़ा ही है। इस मोर्चे पर बर्धन ने तो भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद माकपा महासचिव प्रकाश करात के साथ बुद्धदेव को भी लपेट लिया था। उनका कहना था कि इसे दोनों की तरफ से हुई लापरवाही का खामियाजा सभी वामदलों ने भुगता।
जाहिर है उस समय उन्होंने यह बात नंदीग्राम के संदर्भ में ही कही थी। अब लालगढ़ एक नई समस्या के रूप में सामने है। परिस्थितियां भी बदली हुई हैं। केंद्र में वामदलों का दबदबा समाप्त हो चुका है और उनके धुर विरोधी दल तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव बढ़ गया है। ऐसे में सहयोगी वामदल कदम फूंक-फूंक कर उठाने की सलाह ही बुद्धदेव को दे रहे हैं। यही वजह है कि पुलिस कार्रवाई के लिए सहमत होते हुए उन्होंने चेतावनी दे दी है कि नंदीग्राम दोबारा न हो। वहीं बुद्धदेव भी इस बार सहयोगी घटक दलों को विश्वास में लेकर चल रहे हैं, ताकि उन पर एकतरफा फैसला करने की तोहमत फिर न मढ़ी जाए।(साभार)
लालगढ़ में माओवादियों पर सख्त पुलिस कार्रवाई के लिए सहयोगी वामदलों ने बुद्धदेव को भले ही सहमति दे दी हो लेकिन उन्होंने वहां के हालात इस कदर बिगड़ने के लिए मुख्यमंत्री को कठघरे में भी खड़ा करना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि सूबे के मुखिया में कहीं न कहीं प्रशासनिक क्षमता की कमी जरूर है।
नंदीग्राम संग्राम को लेकर तो बुद्धदेव में यह कमी तो भाकपा नेता ए.बी. बर्धन समेत दूसरे कामरेड खुलकर बताते रहे हैं, लेकिन लालगढ़ कांड के आधार उनकी आलोचना फिलहाल बंद कमरे तक सीमित रखे हुए हैं। हां, अगर लालगढ़ भी नंदीग्राम का दूसरा पार्ट बन जाए तो बुद्धदेव की खिंचाई सार्वजनिक तौर पर करने से कोई नहीं चूकेगा। वहीं माकपा केंद्रीय समिति की यहां शुक्रवार से शुरू हो रही तीन दिन की बैठक में इस मसले पर भी विस्तृत चर्चा होगी।
तीसरा मोर्चा और परमाणु करार से समर्थन वापसी के अपने फैसले की समीक्षा तो माकपा नेतृत्व करेगा ही, लेकिन साथ ही बुद्धदेव को भी लालगढ़ पर जवाब देना होगा।
सूत्रों के मुताबिक कोलकाता में वाममोर्चा की बैठक के दौरान आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक के वरिष्ठ नेताओं ने लालगढ़ के हालात बेकाबू होने के पीछे बुद्धदेव की कमजोरी ही बताई। वाममोर्चा के संयोजक व माकपा सचिव बिमान बोस को अपनी भावना से अवगत कराते हुए कामरेडों ने कह दिया कि वक्त रहते ठोस कार्रवाई कर ली जाती तो माओवादी लालगढ़ को अपने कब्जे में नहीं कर पाते।
यानी सीधे-सीधे वाममोर्चा के घटक दलों ने मुख्यमंत्री की प्रशानिक काबिलियत पर निशाना साधा है। सूत्रों की माने तो कुछ कामरेड तो किसी भी मामले को संभाल पाने में उनकी नाकामी को भी रेखांकित करने सुने गए हैं।
जाहिर है भाकपा समेत सभी वामदलों को बुद्धदेव के कामकाज का तरीका कतई पसंद नहीं रहा है। लोकसभा चुनाव में अपने उम्मीदवारों की हार के बाद तो बुद्धदेव के खिलाफ उनका गुस्सा बढ़ा ही है। इस मोर्चे पर बर्धन ने तो भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद माकपा महासचिव प्रकाश करात के साथ बुद्धदेव को भी लपेट लिया था। उनका कहना था कि इसे दोनों की तरफ से हुई लापरवाही का खामियाजा सभी वामदलों ने भुगता।
जाहिर है उस समय उन्होंने यह बात नंदीग्राम के संदर्भ में ही कही थी। अब लालगढ़ एक नई समस्या के रूप में सामने है। परिस्थितियां भी बदली हुई हैं। केंद्र में वामदलों का दबदबा समाप्त हो चुका है और उनके धुर विरोधी दल तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव बढ़ गया है। ऐसे में सहयोगी वामदल कदम फूंक-फूंक कर उठाने की सलाह ही बुद्धदेव को दे रहे हैं। यही वजह है कि पुलिस कार्रवाई के लिए सहमत होते हुए उन्होंने चेतावनी दे दी है कि नंदीग्राम दोबारा न हो। वहीं बुद्धदेव भी इस बार सहयोगी घटक दलों को विश्वास में लेकर चल रहे हैं, ताकि उन पर एकतरफा फैसला करने की तोहमत फिर न मढ़ी जाए।(साभार)
ट्रैफिक मैनिजमंट में पैदल चलने वालों की अनदेखी
आजादी के बाद पैदल चलने वालों की जैसी दुर्गति हमारे देश में हुई ह ै, उसकी दूसरी मिसाल मिल पाना मुश्किल है। भारतीय नगर नियोजकों की नजर में पैदल चलने वाले और साइकल सवारों की हैसियत कीड़े-मकोड़े जैसी है, जबकि आज भी शहरों का बहुसंख्य वर्ग कहीं आने-जाने के लिए अपने पैरों पर ही निर्भर है।
दिल्ली आईआईटी की प्रफेसर गीतम तिवारी पैदल चलने वालों का आंकड़ा प्राप्त करने का असफल प्रयास कर चुकी हैं। उन्हें 1994 के पहले का ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मिला, जबकि वाहनों के आंकड़े 1950 से ही उपलब्ध हैं। इससे पता चलता है कि शहर की योजनाओं और यातायात संरचना में पैदल चलना किसी प्राथमिकता में नहीं आता।
वर्ष 2008 में 30 शहरों के अध्ययन से पता चला कि 16 से 57 प्रतिशत तक यात्राओं में किसी भी वाहन का इस्तेमाल नहीं होता। छोटे शहरों और पर्वतीय स्थानों के लोग अधिक पैदल चलते हैं। बड़े शहरों में पैदल चलने की स्थितियों को लेकर भी एक अध्ययन हुआ है। सर्वेक्षण में बताया गया कि दिल्ली में 21 प्रतिशत यात्राएं पैदल ही की जाती हैं। रिट्स लिमिटेड नामक एक सरकारी सलाहकार कंपनी द्वारा 2008 के एक सर्वेक्षण के अनुसार यह 34 प्रतिशत है। मुंबई में और अधिक लोग पैदल चलते हैं। वर्ष 2005 में विश्व बैंक द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार वहां 43 प्रतिशत लोग पैदल चलते हैं जो कि निजी वाहनों द्वारा यात्रा करने वालों से चार गुना अधिक है। मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकारी के सर्वेक्षण के अनुसार यह आंकड़ा 52 प्रतिशत है। अहमदाबाद में 2005 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार यहां 54 प्रतिशत यात्राएं पैदल या साइकल से होती हैं। भारतीय शहरों में वाहनों से चलने की बजाय लोग पैदल ज्यादा चलते हैं।
अगर इन आंकड़ों में सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करने वालों को शामिल करें तो वस्तुस्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कोलकाता में पैदल चलने वालों का प्रतिशत वैसे तो 19 ही है, परंतु यहां सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करने वाले 54 प्रतिशत हैं। हमारे शहरों में सड़कें पहले से तो बेहतर हुई हैं, परंतु वे साइकल चालकों के लिए अधिक खतरनाक होती जा रही हैं। अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय और आईआईटी, दिल्ली के संयुक्त अध्ययन से पता चला है कि पिछले दशक में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में प्रतिवर्ष आठ प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। शहरी क्षेत्रों में इस दौरान दुर्घटना से हुई 80 हजार मौतों में से 60 प्रतिशत पैदल चलने वालों की हुई थी।
त्रुटिपूर्ण डिजाइन और शहरी भू-उपयोग नीतियां भारत में पैदल चलने के वातावरण को बर्बाद कर रही हैं। सड़कों को चौड़ा करने के दौरान फुटपाथों को समाप्त करने और फ्लाईओवर बनाने से पैदल चलने वालों के रास्ते में बाधा पड़ती है। समय बचाने की कोशिश में काबू से बाहर हुए वाहन हरेक छह मिनट में एक व्यक्ति को मार डालते हैं। इंडियन सड़क कांग्रेस के अनुसार फुटपाथ की चौड़ाई कम से कम 1.5 मीटर से चार मीटर के बीच होनी चाहिए, परंतु कोई भी शहरी इकाई इन मानकों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। मुंबई में तो जेबरा क्रॉसिंग से भी सड़क पार करने पर तेज दौड़ लगानी पड़ती है। मुंबई के कई उपनगरों में सड़कों के किनारे फुटपाथ ही नहीं हैं। यहां विकास प्राधिकरण अरबों रुपये की लागत से मेट्रो, मोनो रेल, समुद्री लिंक, एक्सप्रेस व फ्लाईओवर बनाने में जुटा है, परंतु फुटपाथ निर्माण की ओर उसका ध्यान ही नहीं है।
एक यातायात विशेषज्ञ अशोक दातार का मानना है कि देश के कुल 55 प्रतिशत लोग प्रतिदिन पैदल चलते हैं, परंतु उनकी सुविधा के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है। अब तो लगने लगा है कि विकास प्राधिकरण चाहते हैं कि जनता सिर्फ कारों का ही प्रयोग करें। अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों पैदल चलने वालों के लिए ऐसे 'स्काई वॉकर' या फुटओवर ब्रिज बनाए जा रहे हैं जिनका बहुत कम लोग इस्तेमाल करते हैं? अगर सड़कों पर सबका अधिकार है तो फिर पैदल चलने वालों को ही क्यों सताया जा रहा है? कारें समस्या का निराकरण इसलिए नहीं कर सकतीं, क्योंकि वे ही समस्या का कारण हैं। सरकारों पर इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि वे ऐसे ट्रैक बनाएं, जो सिर्फ साइकल व पैदल चलने वालों के लिए ही हों।
अमेरिका के उलट भारत अति सघन बसाहट वाला देश है। ऐसे में यहां पैदल चलना एक बेहतर विकल्प भी है। पर वर्ष 2008 के सर्वेक्षण से यह निराशाजनक तस्वीर उभरी कि दिल्ली में बसों में सफर करने वालों की संख्या में जबर्दस्त गिरावट आई है। यह 2001 में 60 प्रतिशत से घटकर 2008 में 41 प्रतिशत रह गई है, जबकि इसी अवधि में कार से सफर करने वाले तीन प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गए। नगर नियोजकों का मानना है कि मुंबई में मेट्रो रेल परियोजना व अन्य यातायात सुविधाओं पर 20 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की बजाय सड़कों को पैदल चलने के अनुकूल बनाना अधिक सस्ता व पर्यावरण के हित में होगा।
इस सुधार हेतु बहुत बड़ी योजनाओं या बड़े स्तर के प्रयासों की जरूरत नहीं है। जेब्रा क्रॉसिंग बनाने व ट्रैफिक सिग्नल की अवधि बढ़ाने से इस समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जबकि अभी तो पैदल चलने वालों को हतोत्साहित किया जा रहा है। असल में नीति नियंताओं की नजर सार्वजनिक यातायात में होने वाले निवेश पर रहती है, जबकि दिल्ली जैसे शहरों में सार्वजनिक यातायात की मांग में कमी आई है। पैदल चलने वालों के आंदोलन का उद्देश्य वाहनों पर निर्भरता कम करना है, इसलिए नगर नियोजकों को ऐसे वातावरण निर्माण में मदद करनी चाहिए। इसका एक उदाहरण हॉलैंड ने 'वुर्नेफ' के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है सड़कों का ऐसा समूह जहां पैदल चलने वालों एवं साइकल चालकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
इस लिहाज से भारतीय शहरों में अभी भी संभावना बाकी है। नगर निकायों को चाहिए कि वे पैदल और साइकल चालकों की समस्याओं से निपटने के लिए एक पूर्णकालिक इकाई बनाएं, ताकि उनका सफर भी सुहाना हो सके। (साभार)
दिल्ली आईआईटी की प्रफेसर गीतम तिवारी पैदल चलने वालों का आंकड़ा प्राप्त करने का असफल प्रयास कर चुकी हैं। उन्हें 1994 के पहले का ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मिला, जबकि वाहनों के आंकड़े 1950 से ही उपलब्ध हैं। इससे पता चलता है कि शहर की योजनाओं और यातायात संरचना में पैदल चलना किसी प्राथमिकता में नहीं आता।
वर्ष 2008 में 30 शहरों के अध्ययन से पता चला कि 16 से 57 प्रतिशत तक यात्राओं में किसी भी वाहन का इस्तेमाल नहीं होता। छोटे शहरों और पर्वतीय स्थानों के लोग अधिक पैदल चलते हैं। बड़े शहरों में पैदल चलने की स्थितियों को लेकर भी एक अध्ययन हुआ है। सर्वेक्षण में बताया गया कि दिल्ली में 21 प्रतिशत यात्राएं पैदल ही की जाती हैं। रिट्स लिमिटेड नामक एक सरकारी सलाहकार कंपनी द्वारा 2008 के एक सर्वेक्षण के अनुसार यह 34 प्रतिशत है। मुंबई में और अधिक लोग पैदल चलते हैं। वर्ष 2005 में विश्व बैंक द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार वहां 43 प्रतिशत लोग पैदल चलते हैं जो कि निजी वाहनों द्वारा यात्रा करने वालों से चार गुना अधिक है। मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकारी के सर्वेक्षण के अनुसार यह आंकड़ा 52 प्रतिशत है। अहमदाबाद में 2005 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार यहां 54 प्रतिशत यात्राएं पैदल या साइकल से होती हैं। भारतीय शहरों में वाहनों से चलने की बजाय लोग पैदल ज्यादा चलते हैं।
अगर इन आंकड़ों में सार्वजनिक यातायात का प्रयोग करने वालों को शामिल करें तो वस्तुस्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। कोलकाता में पैदल चलने वालों का प्रतिशत वैसे तो 19 ही है, परंतु यहां सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करने वाले 54 प्रतिशत हैं। हमारे शहरों में सड़कें पहले से तो बेहतर हुई हैं, परंतु वे साइकल चालकों के लिए अधिक खतरनाक होती जा रही हैं। अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय और आईआईटी, दिल्ली के संयुक्त अध्ययन से पता चला है कि पिछले दशक में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में प्रतिवर्ष आठ प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। शहरी क्षेत्रों में इस दौरान दुर्घटना से हुई 80 हजार मौतों में से 60 प्रतिशत पैदल चलने वालों की हुई थी।
त्रुटिपूर्ण डिजाइन और शहरी भू-उपयोग नीतियां भारत में पैदल चलने के वातावरण को बर्बाद कर रही हैं। सड़कों को चौड़ा करने के दौरान फुटपाथों को समाप्त करने और फ्लाईओवर बनाने से पैदल चलने वालों के रास्ते में बाधा पड़ती है। समय बचाने की कोशिश में काबू से बाहर हुए वाहन हरेक छह मिनट में एक व्यक्ति को मार डालते हैं। इंडियन सड़क कांग्रेस के अनुसार फुटपाथ की चौड़ाई कम से कम 1.5 मीटर से चार मीटर के बीच होनी चाहिए, परंतु कोई भी शहरी इकाई इन मानकों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। मुंबई में तो जेबरा क्रॉसिंग से भी सड़क पार करने पर तेज दौड़ लगानी पड़ती है। मुंबई के कई उपनगरों में सड़कों के किनारे फुटपाथ ही नहीं हैं। यहां विकास प्राधिकरण अरबों रुपये की लागत से मेट्रो, मोनो रेल, समुद्री लिंक, एक्सप्रेस व फ्लाईओवर बनाने में जुटा है, परंतु फुटपाथ निर्माण की ओर उसका ध्यान ही नहीं है।
एक यातायात विशेषज्ञ अशोक दातार का मानना है कि देश के कुल 55 प्रतिशत लोग प्रतिदिन पैदल चलते हैं, परंतु उनकी सुविधा के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है। अब तो लगने लगा है कि विकास प्राधिकरण चाहते हैं कि जनता सिर्फ कारों का ही प्रयोग करें। अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों पैदल चलने वालों के लिए ऐसे 'स्काई वॉकर' या फुटओवर ब्रिज बनाए जा रहे हैं जिनका बहुत कम लोग इस्तेमाल करते हैं? अगर सड़कों पर सबका अधिकार है तो फिर पैदल चलने वालों को ही क्यों सताया जा रहा है? कारें समस्या का निराकरण इसलिए नहीं कर सकतीं, क्योंकि वे ही समस्या का कारण हैं। सरकारों पर इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि वे ऐसे ट्रैक बनाएं, जो सिर्फ साइकल व पैदल चलने वालों के लिए ही हों।
अमेरिका के उलट भारत अति सघन बसाहट वाला देश है। ऐसे में यहां पैदल चलना एक बेहतर विकल्प भी है। पर वर्ष 2008 के सर्वेक्षण से यह निराशाजनक तस्वीर उभरी कि दिल्ली में बसों में सफर करने वालों की संख्या में जबर्दस्त गिरावट आई है। यह 2001 में 60 प्रतिशत से घटकर 2008 में 41 प्रतिशत रह गई है, जबकि इसी अवधि में कार से सफर करने वाले तीन प्रतिशत से बढ़कर 13 प्रतिशत हो गए। नगर नियोजकों का मानना है कि मुंबई में मेट्रो रेल परियोजना व अन्य यातायात सुविधाओं पर 20 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की बजाय सड़कों को पैदल चलने के अनुकूल बनाना अधिक सस्ता व पर्यावरण के हित में होगा।
इस सुधार हेतु बहुत बड़ी योजनाओं या बड़े स्तर के प्रयासों की जरूरत नहीं है। जेब्रा क्रॉसिंग बनाने व ट्रैफिक सिग्नल की अवधि बढ़ाने से इस समस्या से काफी हद तक निपटा जा सकता है। जबकि अभी तो पैदल चलने वालों को हतोत्साहित किया जा रहा है। असल में नीति नियंताओं की नजर सार्वजनिक यातायात में होने वाले निवेश पर रहती है, जबकि दिल्ली जैसे शहरों में सार्वजनिक यातायात की मांग में कमी आई है। पैदल चलने वालों के आंदोलन का उद्देश्य वाहनों पर निर्भरता कम करना है, इसलिए नगर नियोजकों को ऐसे वातावरण निर्माण में मदद करनी चाहिए। इसका एक उदाहरण हॉलैंड ने 'वुर्नेफ' के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है सड़कों का ऐसा समूह जहां पैदल चलने वालों एवं साइकल चालकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
इस लिहाज से भारतीय शहरों में अभी भी संभावना बाकी है। नगर निकायों को चाहिए कि वे पैदल और साइकल चालकों की समस्याओं से निपटने के लिए एक पूर्णकालिक इकाई बनाएं, ताकि उनका सफर भी सुहाना हो सके। (साभार)
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