Sunday, May 31, 2009
शहीद भगत सिंह नगर में बिक रहे हैं उत्तराखंड के
नवकांत भरोमजारा, बंगा केंद्र सरकार एक तरफ आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ रहे बच्चों के खाने-पीने के लिए दलिया, पंजीरी, दूध, बिस्कुट व अन्य पदार्थ निशुल्क उपलब्ध करवाने के दावे कर रही है, वहीं उत्तराखंड प्रशासन द्वारा आंगनबाड़ी के लाभार्थियों के लिए निशुल्क वितरण के लिए बनाए गए बिस्कुट के पैकेट जिला शहीद भगत सिंह नगर के ग्रामीण क्षेत्रों में बिक रहे हैं। इससे केंद्र सरकार की योजनाओं की पोल खुलती नजर आ रही है कि कैसे बच्चों को दी जाने वाली खाद्य सामग्री का गोरखधंधा चल रहा है, जिससे प्रशासन बेखबर है। गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने बिस्कुट के इन पैकेटों पर नि:शुल्क वितरण के बारे में भी लिखा है। इसके बावजूद इन्हें बेचा जा रहा है। सूत्रों से अनुसार 40 रुपये में बिस्कुट के 60 पैकेट बेचे जा रहे हैं। परचून में 75 ग्राम का एक पैकेट एक रुपये में बेचा जा रहा है और उस पर पैकिंग की तारीख अप्रैल, 2008 है। पैकेट कोलकाता व ग्रेटर नोएडा में बनाए गए है। इस संबंध में एक दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ये पैकेट उन्हे एक होल सेलर बेच रहा है। जब इस संबंध में बंगा के सीडीपीओ जीवन कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मामला उनके ध्यान में आ गया है और उन्होंने क्षेत्र की आंगनबाड़ी सुपरवाइजर व आंगनबाड़ी वर्करों की इस संबंध में अधिक जानकारी एकत्रित करने की ड्यूटी लगाई है। इस कार्य में संलिप्त लोगों की धरपकड़ के लिए उचित कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में समाज सेवी संस्थाओं के दिलबाग सिंह बागी, वीपी बेदी, मनधीर सिंह चट्ठा, डा. बलवीर शर्मा, संजीव जैन, रजनीश नैयर ने मांग की है कि इस ओर शीघ्र उचित कदम उठाए जाएं।(साभार)
कैसे रखे जाते हैं तूफानों के नाम?
सिद्र, कैटरीना, टीना, नरगिस, बिजली और अब आइला। ये उन तूफानों के नाम हैं जो समय-समय पर अलग-अलग इलाकों में कहर मचा चुके हैं। आखिर इन्हें यह नाम कैसे मिले? तूफानों के नामकरण का अपना ही फामरूला है। इसमें इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह नाम छोटा हो और उस क्षेत्र विशेष के लिए जाना पहचाना हो। इसके पीछे मकसद यही होता है कि तूफान के दौरान मौसम विभाग के अधिकारियों को स्थानीय लोगों को चेतावनी व राहत अभियानों के बारे में जानकारी देने में दिक्कत नहीं हो। हाल ही में आने वाले तूफान आइला का नामकरण मालदीव के मौसम विभाग ने किया था। तूफानों के नामकरण का भी अपना दिलचस्प इतिहास है। तूफानों के नामकरण की शुरुआत का श्रेय बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में एक आस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञानी को जाता है। उन्होंने तूफानों का नामकरण उन नेताओं के नाम पर किया, जिन्हें वह नापसंद करता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना के जवान तूफानों को अपनी पत्नी या महिला मित्र के नाम से पुकारते थे। आजकल अधिकांश नामकरण फूलों, पशुओं, पक्षियों और खाद्य सामग्री के नाम पर किया जाता है। इसकी भी एक तयशुदा प्रक्रिया है। विश्व मौसम संगठन (डल्ब्यूएमओ) की टाइफून समिति के सदस्य देश स्थानीय शब्दावली के अनुसार तूफानों के नाम रखते हैं। भावी तूफानों का नामकरण पहले ही कर दिया जाता है। उत्तरी हिंद महासागर के आठ देशों के समूह ने आने वाले 64 तूफानों के नामों की सूची बना ली है। इस समूह में भारत भी शामिल है। इस क्षेत्र में आने वाले भावी तूफान का नाम ‘फ्यान’ होगा। यह नाम म्यान्मार ने दिया है।(साभार)
उन्हें चाहिए बस पांच मिनट! अमिताभ बच्चन
जब हमने अपने माता-पिता से उनकी पसंद के बारे में पूछा, तो हमें उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने हमसे कुछ भी स्वीकार नहीं किया। वे तो केवल इतना ही चाहते थे कि हम उनके साथ बैठें, उनसे बातचीत करें और उन्हें बताएं कि दिनभर क्या हुआ। अतिथि x अमिताभ बच्च्नमुझे आज पूर्णता का एहसास हो रहा है। मैं दिन भर अपने पिता की स्मृतियों से गुजरता रहा। मैं एक प्रस्तावना के लिए अंधेरे में ही उन समुचित भावनाओं और शब्दों की तलाश करता रहा, जिनमंे मेरे पिता की शख्यिसत संपूर्णता के साथ अभिव्यक्त हो सके।यह कुछ-कुछ वैसा ही संघर्ष था, जैसा मधुशाला के दौरान करना पड़ा था। मेरी नई फिल्म ‘अलादीन’ की डबिंग और अगली फिल्मों के निर्माताओं व टीवी चैनलों के साथ चर्चा के दौरान अंतिम प्रारूप अब तैयार होने की स्थिति में आ चुका है।पिता ने अपनी भूमिकाओं में जो कहा, मैंने इस प्रस्तावना के लिए बहुत कुछ उसी से लिया है। उन्होंने काफी कुछ लिखा है, लेकिन इसके बावजूद उनकी लिखने की चाहत कम नहीं हुई। उनके प्रति न्याय करना बेहद मुश्किल है। माता-पिता, उनके स्वार्थरहित प्रेम और शर्तविहीन देखभाल के प्रति न्याय करना लगभग असंभव है। जब मैं उनकी उपस्थिति की कल्पना करता हूं तो उनके सामने स्वयं को बौना महसूस करने लगता हूं। मैं जब पुरानी बातों के बारे में सोचता हूं तो महसूस होता है कि उन्होंने अपने सीमित संसाधनों के जरिए कैसे हमारा लालन-पालन किया होगा।अपने लिए तो उनकी कोई चाहत थी ही नहीं। कदम-कदम पर आने वाली आर्थिक परेशानियों का उन्होंने किस तरह से सामना किया होगा। जब वे अपने बच्चों की असीमित और अनगिनत मांगों को पूरा करने में सक्षम नहीं पाते होंगे तो दुनिया का सामना कैसे करते होंगे। हमें जल्दी ही एहसास हो गया था कि हम हमारी कक्षा के अन्य अमीर बच्चों से मुकाबला नहीं कर सकते। उस समय हमारे दिमाग में कितनी उथल-पुथल मची होगी, जब हमें स्वयं के मन को यह समझाकर पीछे बैठना पड़ा कि हमारी आर्थिक स्थिति उन अमीर बच्चों की स्थिति से अलग है।मैं उस समय तो निराशा में लगभग चीख उठा था, जब मेरी मां मुझे दो रुपए नहीं दे पाई। जी हां, केवल दो रुपए। ये दो रुपए मुझे अपनी कक्षा की क्रिकेट टीम में शामिल होने के लिए चाहिए थे। हमें हमारे दोस्त की बर्थ डे पार्टी में साइकिल चलाकर क्यों जाना पड़ता था, जबकि अन्य साथी चमकदार कारों में बैठकर आते थे। यह भी जल्दी ही समझ में आ गया था कि क्यों मेरे ड्रॉइंग रूम में एयरकंडीशनर नहीं लगा था, जो मेरे अमीर दोस्त के कमरे मंे लगा हुआ था।क्यों मेरे पास केवल एक जोड़ी जींस और एक ही कोट था। दिक्कत इसलिए होती थी, क्योंकि मुझे सभी बड़े अवसरों पर यही ड्रेस पहननी पड़ती थी। मुझे अब भी याद है दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में एक कार्यक्रम था। इसमें हर्बर्ट वॉन करंजन प्रस्तुति देने वाले थे।उसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन वहां जाने में मैं बहुत शर्मिदगी महसूस कर रहा था। इसकी वजह यह थी कि मेरे पास केसरिया रंग का एक ही कोट और एक काले रंग का ट्राउजर था। उसे शायद ही कभी ड्राईक्लीन के लिए भेजा गया होगा, क्योंकि उसका खर्च हम वहन नहीं कर सकते थे। यूनिवर्सिटी में मुझे कैसा महसूस हुआ होगा, जब मैं कोका कोला की एक बॉटल नहीं खरीद सका। वह चार आने में मिलती थी और इतना पैसा मेरे पास नहीं था। न ही मैं स्वादिष्ट खीरे के टुकड़े खरीद पाता था। यह खीरा रोजाना मेरे कॉलेज परिसर के दरवाजे पर एक व्यक्ति छोटी-सी ठेलागाड़ी में रखकर बेचता था।सालों के बाद मैं स्थापित हो गया। जिंदगी अच्छे ढंग से चलने लगी। अब मैं कोका कोला के क्रेट्स खरीद सकता था, अत्याधुनिक मॉडलों की लक्जरी कारों में सफर कर सकता था, महंगे से महंगे रेस्टोरेंट में जा सकता था और अच्छे से अच्छा खाना खा सकता था। जब हम कोलकाता में थे तो 10 बाई 10 के छोटे-छोटे कमरों में रहा करते थे। अब हमारे पास अपना स्वयं का भव्य मकान था। जब हमने अपने माता-पिता से उनकी पसंद के बारे में पूछा, उनसे कहा कि जो चाहिए, मांग लीजिए तो हमें उनकी ओर से कोई जवाब क्यों नहीं मिला? उन्होंने हमसे कुछ भी स्वीकार क्यों नहीं किया? ऐसा इसलिए क्योंकि वे तो केवल इतना ही चाहते थे कि हम उनके साथ बैठें, उनसे बातचीत करें और उन्हें बताएं कि दिनभर क्या हुआ। बस वे इतना ही तो चाहते थे!वे मेरे अपने ही थे जिन्होंने हमारे पालन-पोषण और हमारी प्रत्येक इच्छा को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया। आज उन्हें किसी भी चीज की जरूरत नहीं है। वे तो इतना ही चाहते थे कि हम अपने पांच मिनट उन्हें दे दें। वे केवल पांच मिनट ही चाहते थे!मेरे माता-पिता तो आज नहीं रहे, लेकिन आप लोगों में से ऐसे कितने हैं जो अपनी दिनचर्या में से थोड़ा समय निकालकर अपने पिता या माता के साथ बैठते हैं, उनसे बतियाते हैं!(साभार)
प्रकृति के प्रकोप से पर्यटकों का आगमन घटा
दार्जिलिंग आइला के तांडव से पार्वत्य क्षेत्र में पर्यटकों का आगमन प्रभावित हुआ है। उक्त मंतव्य गोर्खा पार्वत्य परिषद के टूरिज्म डाइरेक्टर दीपक लोहार ने शनिवार को व्यक्त किया। वैसे मई माह में पहाड़ पर अत्यधिक संख्या में पर्यटक आते हैं। विगत वर्ष की तुलना में इस वर्ष पर्यटकों के आगमन में 40 प्रतिशत वृद्धि हुई थी परन्तु 26 मई को पार्वत्य क्षेत्र में आइला का जो तांडव मचा उससे पर्यटकों का आगमन काफी प्रभावित हुआ डाइरेक्टर लोहार ने कहा कि इस वजह से परिषद की आय में डेढ़ करोड़ की क्षति हुई है। उन्होंने बताया कि परिषद से जुड़े करीब 22 पर्यटन स्थल व लाज हैं जिससे परिषद को अच्छी आय होती है परन्तु 26 मई को हुए भूस्खलन से पार्वत्य क्षेत्र में पर्यटकों से प्राप्त होने वाली आय पर अच्छा खासा प्रभाव पड़ा है। जिससे डेढ़ करोड़ की आय प्रभावित हुई है। इधर इस संदर्भ में दार्जिलिंग होटल आनर्स एसोसिएशन के पाल्देन लामा ने बताया कि 26 मई को हुए प्राकृतिक प्रकोप की वजह से पर्यटकों का यातायात प्रभावित हुआ था लेकिन स्थानीय प्रशासन व होटल आनर्स एसोसिएशन ने पर्यटकों को यातायात की सुविधा दिलाने में मदद की थी परन्तु राज्य की वामफ्रंट सरकार इसे दूसरे रुप में प्रचारित कर लोगों को भयभीत किया लेकिन फिर भी पहाड़के होटलों में वर्तमान समय में भी पर्यटकों की अच्छी खासी भीड़ है विगत वर्ष की तुलना में पहाड़ पर काफी तादाद में पर्यटक आये। दार्जिलिंग पहाड़ में करीब तीन सौ के आसपास होटल हैं जिनमें पर्यटकों की अत्यधिक भीड़ है।
Saturday, May 30, 2009
अलीपुर पुलिस कोर्ट में साफ-सफाई का अभाव
कोलकाता अलीपुर पुलिस कोर्ट में साफ-सफाई की कमी की वजह से परेशानियां हो रही हैं। यहां व्याप्त गंदगी की समस्या से वकीलों तथा क्लर्क के साथ न्याय की तलाश में आने वाले लोगों को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। गौरतलब है कि अलीपुर पुलिस कोर्ट में महानगरी कोलकाता के साथ ही दक्षिण चौबीस परगना जिले के विभिन्न प्रांतों से रोजाना अनेकों लोग आते हैं। अलीपुर पुलिस कोर्ट की इस समस्या के संबंध में पुलिस कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार दत्त ने बताया कि कोर्ट में स्थित खुले नाले वर्ज्य पदार्थो से भरे हुए हैं। इन ओपन ड्रेन में जमे गंदे पानी से बदबू निकलती है जिससे यहां काम-काज निपटाना बेहद दूभर हो रहा है। इसके साथ जमे गंदे पानी में मच्छर अंडे दे रहे हैं। इससे पुलिस कोर्ट परिसर में मच्छरों का उपद्रव बेहद बढ़ गया है। मच्छरों की भारी संख्या से लोगों को मलेरिया, डेंगू तथा चिकुनगुनिया फैलने का डर सताता रहता है। कोर्ट परिसर में कूड़े-कचरे का अंबार लगाने में यहां के दुकानदार भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते। दस वर्ष पूर्व तक कोर्ट परिसर में जमादारों द्वारा नित्य साफ-सफाई की जाती थी परंतु अब यहां ज्यादातर केवल कुछ सीमित क्षेत्रों की सफाई करते हैं। इधर अलीपुर पुलिस कोर्ट में पेयजल की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। यहां एक ट्यूबवेल है तथा इसके आसपास लोग खुलेआम मूत्र त्यागते हैं। इस स्थिति से ट्यूबवेल से पानी लेना भी यहां के लोगों को अच्छा नहीं लग रहा। दूसरी ओर अलीपुर पुलिस कोर्ट में नित्य साफ-सफाई की मांग तथा खुले नालों को भूमिगत करने जैसी मांगों को लेकर अलीपुर बार एसोसिएशन द्वारा दक्षिण चौबीस परगना जिला के अतिरिक्त जिलाधिकारी को कई बार ज्ञापन सौंपा गया है।
खामियों को दूर करने पर जोर देगी सरकार
कोलकाता वाममोर्चा सरकार अपने 32 वषरें के शासन में उपलब्धियों का बखान करने के बजाय अब खामियों को चिन्हित करेगी और उसे दूर करने पर जोर देगी। त्रुटियों को चिन्हित कर उसे दूर करने पर विशेष जोर देने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भंट्टाचार्य ने अपने सहयोग मंत्रियों को अगले दो वषरें के लिए प्राथमिकता के आधार पर विकास कार्य का खाका तैयार करने का जो दिशा निर्देश दिया है, उसमें उन्होंने कहा है कि भूमि का वितरण, कृषि, पशु संसाधन, मत्स्य पालन, सिंचाई और उन्नत बीज पर विशेष नजर रखनी होगी। उद्योग के लिए राज्य में पूंजी का निवेश बढ़ रहा है। औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के लिए बिजली का उत्पादन बढ़ाना होगा। नये सिरे से बीपीएल कार्ड तैयार करने के लिए गरीबों से संपर्क करना होगा। समाज के पिछड़े वर्ग खास कर अल्पसंख्यकों के लिए रोजगार और शिक्षा के समान अवसर तैयार करने होंगे। उनके लिए आवास योजना को मूर्त रूप देना होगा। संपूर्ण साक्षारता के लिए सभी बच्चों को स्कूल पहुंचाने के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रयासरत होने की जरूरत है। उर्दू भाषियों के लिए विद्यालयों की संख्या बढ़ाने का प्रयास करना होगा। पंचायत, ग्रामीण विकास और नगर विकास को अपनी अतिरिक्त जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। भ्रष्टाचार और जनसेवा के प्रति नाकारात्मक मनोभाव प्रशासन के लिए बड़ी समस्या है। इसे हर हाल में दूर करना होगा। मंत्रियों को सात जून तक मुख्यमंत्री के को अपनी कार्यसूची की रिपोर्ट सौंपनी है।
अब सिगरेट की बिक्री में कमी की चिंता
अगर स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी चित्रों के जरिए दी जाती है तो इससे घरेलू सिगरेट की मांग प्रभावित हो सकती है।
इस महीने की शुरुआत में ही उच्चतम न्यायालय ने यह चेतावनी दी है कि 31 मई से तंबाकू से जुड़े उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी का प्रदर्शन चित्रों के जरिए करना है। ऐसे में इन चित्रों के साथ स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी से इन उत्पादों की मांग तेजी से गिर सकती है।
इस महीने 6 तारीख को न्यायालय ने सिगरेट और तंबाकू से जुड़े दूसरे उत्पादों के लिए यह नियम बनाया गया है कि इन उत्पादों की पैकेजिंग पर चित्रात्मक चेतावनी दी जानी चाहिए।
टोबैको इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया के निदेशक उदयन लाल को भी यह आशंका है कि इस चेतावनी का गंभीर असर उपभोग पर पड़ सकता है और यह ऐसे समय पर हो रहा है जब अर्थव्यवस्था बेहतर नहीं कर रही है। उन्हें यह भी आशंका है कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी चित्रात्मक चेतावनी से तस्करी से लाए गए सिगरेटों की मांग में इजाफा होगा।
इसकी वजह यह भी है कि भारत में तस्करी से लाए गए सिगरेटों का बड़ा बाजार है और दूसरी तरफ घरेलू सिगरेटों पर बहुत ज्यादा कर लगा है। उनका कहना है, 'इस तरह के सिगरेट की मांग बढ़ेगी क्योंकि इन पर स्वास्थ्य की चेतावनी नहीं लिखी होती। ऐसे में इसे कम नुकसानदायक समझा जाएगा।'
तंबाकू संस्थान का कहना है कि घरेलू सिगरेट पर ज्यादा कर लगाए जाने की वजह से वैसे सिगरेटों की मांग बढ़ रही है जो बड़ी संख्या में छोटी इकाइयां बनाती है और कर देने से बचती हैं। लाल का कहना है, 'इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस तरह की इकाइयों द्वारा बनाए गए सिगरेट पर चित्रात्मक स्वास्थ्य चेतावनी लिखी ही हो।
इसी वजह से घरेलू उद्योग जो शुल्क का भुगतान कर रहे हैं उनको ज्यादा नुकसान झेलना पड़ेगा।' लाल ने यह सफाई दी कि टोबैको इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया तंबाकू उत्पादों की बिक्री और उसके निर्माण से जुड़े इस तरह के नियमों हटाने या खत्म करने की वकालत नहीं कर रहा है। उनका कहना है, 'यह नियम समानता और अनुसरण करने लायक बनाया जाना चाहिए।'
भारत तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहां पर खपत का तरीका अनोखा है। दुनिया के अन्य हिस्सों से अलग, जहां तंबाकू के कुल उपभोग में सिगरेट का अनुपात 90 प्रतिशत होता है, भारत में सिगरेट की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है। शेष 85 प्रतिशत हिस्से की खपत अन्य परंपरागत तरीकों जैसे बीड़ी, खैनी और गुटका में होता है, जिसकी हिस्सेदारी बहुत ज्यादा है।
इसका उत्पादन असंगठित क्षेत्रों द्वारा होता है। इस अनोखे तरीके से तंबाकू की खपत के परिणामस्वरूप बहुत बड़ी मात्रा में तंबाकू बगैर ब्रांड के और खुले रूप में बेचा जाता है, जिस पर सचित्र वैधानिक चेतावनी भी नहीं लगाई जा सकती।
आईटीसी के प्रवक्ता नजीब आरिफ का कहना है कि सभी सिगरेट विनिर्माताओं को 31 मई के बाद नए पैक में सिगरेट बेचना होगा, जिस पर बदली हुई स्वास्थ्य चेतावनी होगी। यह कठिन प्रक्रिया है, लेकिन हम इसके लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं।
इस महीने की शुरुआत में ही उच्चतम न्यायालय ने यह चेतावनी दी है कि 31 मई से तंबाकू से जुड़े उत्पादों पर स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी का प्रदर्शन चित्रों के जरिए करना है। ऐसे में इन चित्रों के साथ स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनी से इन उत्पादों की मांग तेजी से गिर सकती है।
इस महीने 6 तारीख को न्यायालय ने सिगरेट और तंबाकू से जुड़े दूसरे उत्पादों के लिए यह नियम बनाया गया है कि इन उत्पादों की पैकेजिंग पर चित्रात्मक चेतावनी दी जानी चाहिए।
टोबैको इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया के निदेशक उदयन लाल को भी यह आशंका है कि इस चेतावनी का गंभीर असर उपभोग पर पड़ सकता है और यह ऐसे समय पर हो रहा है जब अर्थव्यवस्था बेहतर नहीं कर रही है। उन्हें यह भी आशंका है कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी चित्रात्मक चेतावनी से तस्करी से लाए गए सिगरेटों की मांग में इजाफा होगा।
इसकी वजह यह भी है कि भारत में तस्करी से लाए गए सिगरेटों का बड़ा बाजार है और दूसरी तरफ घरेलू सिगरेटों पर बहुत ज्यादा कर लगा है। उनका कहना है, 'इस तरह के सिगरेट की मांग बढ़ेगी क्योंकि इन पर स्वास्थ्य की चेतावनी नहीं लिखी होती। ऐसे में इसे कम नुकसानदायक समझा जाएगा।'
तंबाकू संस्थान का कहना है कि घरेलू सिगरेट पर ज्यादा कर लगाए जाने की वजह से वैसे सिगरेटों की मांग बढ़ रही है जो बड़ी संख्या में छोटी इकाइयां बनाती है और कर देने से बचती हैं। लाल का कहना है, 'इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इस तरह की इकाइयों द्वारा बनाए गए सिगरेट पर चित्रात्मक स्वास्थ्य चेतावनी लिखी ही हो।
इसी वजह से घरेलू उद्योग जो शुल्क का भुगतान कर रहे हैं उनको ज्यादा नुकसान झेलना पड़ेगा।' लाल ने यह सफाई दी कि टोबैको इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया तंबाकू उत्पादों की बिक्री और उसके निर्माण से जुड़े इस तरह के नियमों हटाने या खत्म करने की वकालत नहीं कर रहा है। उनका कहना है, 'यह नियम समानता और अनुसरण करने लायक बनाया जाना चाहिए।'
भारत तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहां पर खपत का तरीका अनोखा है। दुनिया के अन्य हिस्सों से अलग, जहां तंबाकू के कुल उपभोग में सिगरेट का अनुपात 90 प्रतिशत होता है, भारत में सिगरेट की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत है। शेष 85 प्रतिशत हिस्से की खपत अन्य परंपरागत तरीकों जैसे बीड़ी, खैनी और गुटका में होता है, जिसकी हिस्सेदारी बहुत ज्यादा है।
इसका उत्पादन असंगठित क्षेत्रों द्वारा होता है। इस अनोखे तरीके से तंबाकू की खपत के परिणामस्वरूप बहुत बड़ी मात्रा में तंबाकू बगैर ब्रांड के और खुले रूप में बेचा जाता है, जिस पर सचित्र वैधानिक चेतावनी भी नहीं लगाई जा सकती।
आईटीसी के प्रवक्ता नजीब आरिफ का कहना है कि सभी सिगरेट विनिर्माताओं को 31 मई के बाद नए पैक में सिगरेट बेचना होगा, जिस पर बदली हुई स्वास्थ्य चेतावनी होगी। यह कठिन प्रक्रिया है, लेकिन हम इसके लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)